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आँसू (कविता )   1925 - जयशंकर प्रसाद 

इस करुणा कलित ह्रदय में 
अब विकल रागनी बजती 
क्यों हाहाकार स्वरों में 
वेदना असीम गरजती ?

मानस सागर के तट पर 
क्यों लोल लहर की घाते 
कल कल ध्वनि से कहती 
कुछ विस्मृत बीती बातें ?

आती है शून्य क्षितिज से 
क्यों लोट प्रतिध्वनि मेरी 
टकराती बिलखती सी 
पगली सी देती फेरी ? 

जो घनीभूत पीड़ा थी 
मस्तक में स्मृति सी छायी 
दुर्दिन में ऑंसू बनकर 
वह आज बरसने आयी 

रो रोकर सिसक सिसक कर 
कहता में करुण कहानी 
तुम सुमन नोचते सुनते 
करते जानी अनजानी 

झंझा झकोर गर्जन था 
बिजली सी नीरद माला 
पा कर इस शून्य ह्रदय की 
सब ने आ डेरा डाला। 

घिर जाती प्रलय घटाए 
कुटिया पर आ कर मेरी 
तम चूर्ण बरस जाता था 
छा जाती अधिक अँधेरी। 

तुम सत्य रहे चिर सुन्दर !
मेरे इस मिथ्या जग के 
थे केवल जीवन संगी 
कल्याण कलित इस मन के। 

गौरव था , नीचे आये 
प्रियतम मिलने को मेरे 
मैं इठला उठा अकिञ्चन 
देखे जो स्वप्न सबेरे। 

मैं अपलक इन नयनो से 
निरखा करता उस छवि को 
प्रतिभा डाली भर लाता 
कर देता दान सुकवि को। 


देवकांत सिंह 
नेट  जे आर एफ 

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