फणीश्वरनाथ 'रेणु' की प्रसिद्ध कहानी 'रसप्रिया'
1. मुख्य पात्रों का परिचय (Character Profile)
| पात्र | भूमिका | विशेषता |
| मोहना | मुख्य पात्र (बालक) | अत्यंत सुंदर, सुरीला गायक और विद्यापति के पदों का जानकार। |
| मृदंगिया (परमानंद) | मोहना का गुरु/पिता | ढोलक बजाने वाला, अतीत के दुखों से भरा और मोहना का असली रक्षक। |
| रमिआ | मोहना की माँ | परमानंद की पूर्व प्रेमिका, जो अब समाज के डर से सच छुपाती है। |
2. कहानी का घटनाक्रम (Story Flowchart)
आरंभ (Introduction)
मोहना का अद्भुत गायन और परमानंद (मृदंगिया) का गाँव में आगमन।
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मध्य (Conflict)
मृदंगिया और मोहना के बीच का गुरु-शिष्य जैसा गहरा जुड़ाव। समाज में फैली कड़वाहट और गरीबी का चित्रण।
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चरम (Climax)
मृदंगिया को पता चलता है कि मोहना वास्तव में उसका और रमिआ का ही पुत्र है।
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अंत (Conclusion)
रमिआ का डर और मृदंगिया का गाँव छोड़कर चले जाना, ताकि मोहना के भविष्य पर कोई आंच न आए।
3. कहानी के प्रमुख विषय (Core Themes)
लोक संस्कृति: 'रसप्रिया' (विद्यापति के गीत) के माध्यम से मिथिलांचल की कला का जीवंत वर्णन।
अवैधता का दंश: समाज द्वारा ठुकराए गए रिश्तों की पीड़ा।
कला बनाम गरीबी: कलाकार की कला की कद्र और उसके जीवन का संघर्ष।
निस्वार्थ प्रेम: मृदंगिया का अपने पुत्र के भविष्य के लिए चुपचाप दूर चले जाना।
4. प्रतीकात्मक चित्र (Conceptual Visuals)
मृदंग (ढोलक): यह पुराने समय की कला और परमानंद के संघर्ष का प्रतीक है।
विद्यापति के पद: मोहना की आवाज़ में इन पदों का गायन उसकी विरासत और शुद्धता को दर्शाता है।
गाँव का पोखर: ग्रामीण परिवेश और वहाँ की सादगी का प्रतीक।
विशेष टिप्पणी: रेणु जी की यह कहानी मानवीय संवेदनाओं का निचोड़ है। इसमें 'रसप्रिया' सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि उन पात्रों के जीवन का राग है।
फणीश्वरनाथ 'रेणु' की कहानी 'रसप्रिया' ग्रामीण संवेदना, लोक कला और छिपे हुए मानवीय रिश्तों की एक मर्मस्पर्शी कहानी है। यहाँ इसका सारांश मुख्य बिंदुओं में दिया गया है:
कहानी का सारांश (Summary)
1. मोहना का जादुई गायन:
कहानी की शुरुआत एक बालक मोहना से होती है, जो विद्यापति के 'रसप्रिया' पदों को अत्यंत सुरीली आवाज़ में गाता है। उसकी आवाज़ में ऐसा जादू है कि सुनने वाले मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। वह गरीबी में पला-बढ़ा है, लेकिन उसकी कला अद्भुत है।
2. मृदंगिया (परमानंद) का आगमन:
गाँव में एक वृद्ध कलाकार परमानंद आता है, जिसे लोग 'मृदंगिया' कहते हैं। वह मृदंग (ढोलक जैसा वाद्य) बजाने में माहिर है। जब वह मोहना को गाते हुए सुनता है, तो उसे अपनी कला का सच्चा उत्तराधिकारी मिल जाता है। दोनों के बीच एक अनकहा सा गहरा रिश्ता जुड़ जाता है।
3. अतीत का रहस्य:
मृदंगिया का अतीत दुखों से भरा है। जवानी में उसका प्रेम रमिआ नाम की औरत से था। जब मृदंगिया, मोहना की माँ (रमिआ) से मिलता है, तो उसे एहसास होता है कि मोहना वास्तव में उसका अपना ही बेटा है। रमिआ अब विधवा का जीवन जी रही है और समाज के डर से इस सच को दबाए हुए है।
4. आंतरिक द्वंद्व और संघर्ष:
रमिआ को डर है कि यदि मृदंगिया गाँव में रहा, तो समाज मोहना की असलियत जान जाएगा और उसे 'कलंकित' मानकर समाज से बाहर कर देगा। वह मृदंगिया से विनती करती है कि वह वहाँ से चला जाए। मृदंगिया भी मोहना को देखकर भावुक होता है, लेकिन वह नहीं चाहता कि उसकी वजह से बच्चे के भविष्य पर कोई आंच आए।
5. कहानी का मार्मिक अंत:
मृदंगिया अपने मन पर पत्थर रखकर गाँव छोड़ने का फैसला करता है। वह जाते-जाते अपनी सबसे कीमती चीज़ (अपना मृदंग) भी त्याग देता है। कहानी के अंत में वह एक महान त्याग का उदाहरण पेश करता है, जहाँ एक पिता अपनी पहचान को इसलिए मिटा देता है ताकि उसका बेटा समाज में सम्मान के साथ जी सके।
कहानी का मूल संदेश (The Message)
यह कहानी यह दर्शाती है कि:
कला अमर है: गरीबी और तंगी के बावजूद कला एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचती है।
त्याग की पराकाष्ठा: एक कलाकार और एक पिता का अपने बच्चे के सम्मान के लिए खुद को गुमनामी में धकेल देना सबसे बड़ा त्याग है।
ग्रामीण यथार्थ: रेणु जी ने ग्रामीण समाज की रूढ़ियों और वहां की लोक संस्कृति (विद्यापति के पद) का बहुत ही सुंदर चित्रण किया है।
फणीश्वरनाथ 'रेणु' की कहानी 'रसप्रिया' के पात्र बहुत ही गहरे और भावनात्मक हैं। यहाँ मुख्य पात्रों का विस्तृत चरित्र-चित्रण :
1. मृदंगिया (परमानंद)
मृदंगिया कहानी का केंद्रीय और सबसे जटिल पात्र है। उसका चरित्र कला और करुणा का मिश्रण है।
सच्चा कलाकार: वह केवल मनोरंजन के लिए मृदंग नहीं बजाता, बल्कि उसकी रगों में संगीत बहता है। वह 'रसप्रिया' के पदों का मर्म समझता है।
अतीत का मारा: जवानी में रमिआ से प्रेम और फिर समाज द्वारा ठुकराया जाना उसे एक घुमक्कड़ (भिखारी जैसा) बना देता है। उसका जीवन अकेलेपन और अभावों की लंबी दास्तां है।
संवेदनशील पिता: जैसे ही उसे पता चलता है कि मोहना उसका बेटा है, उसके भीतर का पिता जाग उठता है। वह मोहना को अपनी कला सौंपना चाहता है, लेकिन उसके भविष्य की चिंता उसे बेचैन कर देती है।
त्याग की प्रतिमूर्ति: कहानी के अंत में उसका चुपचाप गाँव से चले जाना यह साबित करता है कि वह मोहना के सुख के लिए अपनी खुशी और पहचान की बलि दे सकता है।
2. मोहना
मोहना इस कहानी की मासूमियत और भविष्य की कला का प्रतीक है।
अद्भुत प्रतिभा: वह बहुत छोटा है, लेकिन उसके गले में सरस्वती का वास है। वह विद्यापति के कठिन पदों को भी पूरी भावना के साथ गाता है।
संस्कार और शालीनता: वह गरीब है, लेकिन उसके व्यवहार में एक तरह की गरिमा है। वह मृदंगिया के प्रति तुरंत आकर्षित हो जाता है, जैसे उसे अपने पिता की कमी का अहसास हो।
अज्ञानता: वह इस कड़वे सच से अनजान है कि मृदंगिया ही उसका पिता है। वह उसे केवल एक गुरु या संगीत का जानकार मानकर प्रेम करता है।
3. रमिआ (मोहना की माँ)
रमिआ का पात्र ग्रामीण समाज में महिलाओं की स्थिति और उनके संघर्ष को दर्शाता है।
दुविधा में फंसी स्त्री: वह एक तरफ अपने पुराने प्रेम (मृदंगिया) को देखती है और दूसरी तरफ समाज की लोक-लाज और अपने बेटे का भविष्य। वह इन दोनों के बीच पिस रही है।
मजबूत माँ: वह कठोर निर्णय लेती है। वह मृदंगिया को चले जाने के लिए कहती है, क्योंकि उसे डर है कि "समाज के लोग थूकेंगे"। उसके लिए मोहना का सामाजिक सम्मान उसके निजी प्रेम से ऊपर है।
अपराध बोध: वह अंदर ही अंदर इस सच को दबाए रखने के बोझ से दबी हुई है, जो उसे एक दुखी और गंभीर पात्र बनाता है।
पात्रों का तुलनात्मक चार्ट
| विशेषता | मृदंगिया | मोहना | रमिआ |
| मुख्य गुण | त्याग और कला | प्रतिभा और मासूमियत | ममता और लोक-लाज |
| लक्ष्य | कला की रक्षा | संगीत सीखना | बेटे का सम्मान बचाना |
| दुख का कारण | अधूरा प्रेम और गरीबी | पिता का साया न होना | समाज का डर |
निष्कर्ष
रेणु जी ने इन पात्रों के माध्यम से यह दिखाया है कि ग्रामीण जीवन में कला कितनी गहरी है, लेकिन सामाजिक मर्यादाएँ अक्सर भावनाओं पर भारी पड़ जाती हैं। मृदंगिया का पात्र हमें सिखाता है कि प्रेम का अर्थ पाना नहीं, बल्कि प्रिय व्यक्ति की भलाई के लिए खुद को मिटा देना है।
'रसप्रिया' कहानी के प्रतीकों (Symbols) का विवरण :
'रसप्रिया' कहानी के प्रमुख प्रतीक (Symbols)
| प्रतीक | किसका संकेत है? | अर्थ और महत्व |
| मृदंग (वाद्य यंत्र) | कला और अतीत | यह मृदंगिया की पहचान और उसके संघर्षपूर्ण जीवन का प्रतीक है। अंत में मृदंग का त्याग उसके मोह-भंग और महान त्याग को दर्शाता है। |
| विद्यापति के पद | लोक-संस्कृति | ये पद मिथिला की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और शुद्ध प्रेम के प्रतीक हैं। ये कहानी में 'रस' घोलने का काम करते हैं। |
| मोहना की आवाज़ | भविष्य की आशा | मोहना की सुरीली आवाज़ मृदंगिया के लिए एक नई उम्मीद है। यह दर्शाती है कि कलाकार मर सकता है, पर कला जीवित रहती है। |
| मैला आँचल/फटे कपड़े | गरीबी और अभाव | यह पात्रों की आर्थिक विपन्नता और समाज के उपेक्षित वर्ग की वास्तविक स्थिति का प्रतीक है। |
| गाँव की पगडंडी | जीवन की अनिश्चितता | मृदंगिया का रास्ते पर चलते रहना और अंत में अकेले निकल जाना जीवन के अकेलेपन और निरंतर चलते रहने का प्रतीक है। |
कहानी का वैचारिक ढांचा (Conceptual Framework)
graph TD
A[कला - रसप्रिया गायन] --> B(भावनाओं का मेल)
B --> C{सामाजिक बाधाएँ}
C --> D[लोक-लाज और डर]
C --> E[आर्थिक अभाव]
D --> F(त्याग और विदाई)
E --> F
F --> G[मृदंगिया का मौन प्रस्थान]
प्रमुख निष्कर्ष (Key Insights)
अधूरी चाहत: मृदंगिया और रमिआ का रिश्ता समाज की वेदी पर चढ़ गया, लेकिन उनकी संतान (मोहना) उनकी कला को जीवित रखे हुए है।
मौन त्याग: पिता का पुत्र के प्रति प्रेम यहाँ शब्दों में नहीं, बल्कि 'दूरी' बनाने में दिखता है ताकि पुत्र को कोई 'कलंक' न लगे।
आंचलिकता: रेणु जी ने ग्रामीण शब्दों और गीतों के माध्यम से कहानी को मिट्टी की खुशबू से भर दिया है।
फणीश्वरनाथ 'रेणु' की लेखनी की सबसे बड़ी शक्ति उनके संवाद हैं। 'रसप्रिया' कहानी के संवाद पात्रों के भीतर छिपे दर्द और उनकी मजबूरियों को आइने की तरह साफ कर देते हैं।
कहानी के सबसे प्रभावशाली संवादों का चार्ट और विश्लेषण दिया गया है:
महत्वपूर्ण संवादों का विश्लेषण (Dialogue Analysis)
| संवाद (संभाषण) | किसने, किससे कहा? | भावार्थ/महत्व |
| "विद्यापति के पदों को क्या कोई बिना गुरु के गा सकता है? इसके कंठ में तो सरस्वती वास करती हैं।" | मृदंगिया (स्वयं से/ग्रामीणों से) | यह मोहना की नैसर्गिक प्रतिभा और मृदंगिया के मन में उसके प्रति उमड़ते सम्मान को दर्शाता है। |
| "बाबू साहेब, यह लड़का किसका है? इसके नैन-नक्श और स्वर तो किसी खानदानी कलाकार जैसे हैं।" | मृदंगिया, मुखिया से | यहाँ मृदंगिया को अनजाने में ही अपने और मोहना के खून के रिश्ते का आभास होने लगता है। |
| "तुम यहाँ से चले जाओ परमानंद! अगर गाँव वालों को भनक लगी, तो इस मासूम का जीवन नर्क हो जाएगा।" | रमिआ, मृदंगिया से | यह संवाद एक माँ की लाचारी और सामाजिक डर को दर्शाता है। वह अपने पुराने प्रेम से अधिक अपने बेटे के सम्मान को चुनती है। |
| "मृदंगिया अब मृदंग नहीं बजाएगा। यह लो अपना साज़, अब इसकी आवाज़ बुझ गई है।" | मृदंगिया, कहानी के अंत में | यह संवाद उसके 'मोह-भंग' और 'त्याग' का प्रतीक है। वह अपना सर्वस्व (कला) त्याग कर विदा लेता है। |
संवादों के पीछे का मनोवैज्ञानिक प्रभाव (Psychological Map)
नीचे दिए गए चार्ट से समझें कि संवाद किस तरह पात्रों की मनोदशा बदल रहे हैं:
graph LR
A[मृदंगिया के प्रश्न] -- संदेह और खोज --> B(अतीत का सच)
B -- ममता और डर --> C[रमिआ की विनती]
C -- पीड़ा और त्याग --> D(मौन विदाई)
D -- परिणाम --> E[मोहना का सुरक्षित भविष्य]
इन संवादों से मिलने वाली सीख
सामाजिक मर्यादा: रमिआ के संवाद बताते हैं कि ग्रामीण समाज में एक अकेली औरत के लिए अपने अतीत को स्वीकार करना कितना कठिन है।
कला की विरासत: मृदंगिया के शब्दों में एक कलाकार की वह तड़प दिखती है जो अपनी कला को एक सही 'कंठ' (मोहना) में सुरक्षित देखना चाहता है।
पिता का आत्मसमर्पण: मृदंगिया का चुपचाप चले जाना यह साबित करता है कि कभी-कभी "चुप रहना" और "दूर चले जाना" ही सबसे बड़ा संवाद होता है।
रसप्रिया' कहानी की कुछ और मर्मस्पर्शी और मुख्य पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं।
1. कला और शिष्य के प्रति प्रेम
"मृदंगिया ने अपनी सुखी आँखों से मोहना के चेहरे की ओर देखा। उसे लगा कि वह अपनी खोई हुई बहुमूल्य निधि को फिर से पा गया है।"
महत्व: यह पंक्ति उस पल को दर्शाती है जब मृदंगिया को मोहना के रूप में अपनी कला का असली वारिस मिल जाता है।
2. गरीबी और भूख का यथार्थ
"पेट की आग बुझाने के लिए विद्यापति के रस भरे पदों को बेचना पड़ता है। क्या यही कलाकार की नियति है?"
महत्व: यहाँ रेणु जी ने एक कलाकार की गरीबी पर चोट की है, जिसे अपनी साधना का उपयोग केवल पेट भरने के लिए करना पड़ता है।
3. रमिआ की बेबसी और सामाजिक डर
"परमानंद! तुम चले जाओ। इस लड़के के चेहरे की ओर देखकर चले जाओ। लोग कहते हैं इसकी सूरत तुमसे मिलती है, मेरे मरे हुए पति की आत्मा को शांति लेने दो।"
महत्व: यह रमिआ का सबसे शक्तिशाली संवाद है। वह अपने प्रेम को दुत्कारती है ताकि उसके बेटे को समाज "अवैध" संतान कहकर अपमानित न करे।
4. मृदंगिया का आत्म-बोध
"रसप्रिया अब रस नहीं देती, जहर उगलती है। इस बुझे हुए दीये में अब तेल नहीं रहा।"
महत्व: कहानी के अंत की ओर, जब मृदंगिया अपनी हार और मोह-भंग को स्वीकार करता है, तब वह अपनी ही कला के प्रति यह उदासी व्यक्त करता है।
पंक्यिों का भाव-चित्र (Analysis Chart)
| मुख्य पंक्ति का भाव | पात्र की मनोदशा | मुख्य उद्देश्य |
| "सूरत तुमसे मिलती है" | रमिआ (डर और ममता) | समाज के सामने सच आने का भय। |
| "बहुमूल्य निधि पा गया" | मृदंगिया (हर्ष और स्नेह) | गुरु-शिष्य और पिता-पुत्र का मिलन। |
| "मृदंग अब नहीं बजेगा" | मृदंगिया (त्याग) | अतीत से पूर्ण विच्छेद और विदाई। |
रेणु जी की भाषा की विशेषता
इन पंक्तियों में आप देखेंगे कि उन्होंने 'मैथिली' मिश्रित हिंदी का प्रयोग किया है, जैसे 'विद्यापति के पद' या ग्रामीण मुहावरे। यह पाठकों को सीधा बिहार के ग्रामीण परिवेश से जोड़ देता है।