'गोदान' ग्रामीण यथार्थ और शहरी बौद्धिकता

'गोदान' के इन दो स्तंभों को गहराई से समझते हैं। ये दोनों पक्ष उपन्यास के दो अलग-अलग ध्रुवों—ग्रामीण यथार्थ और शहरी बौद्धिकता—को परिभाषित करते हैं।


1. होरी का चरित्र: भारतीय किसान की त्रासदी

होरी का चरित्र हिंदी साहित्य के सबसे करुण और जीवंत चरित्रों में से एक है। वह कोई नायक (Hero) नहीं, बल्कि एक हारा हुआ इंसान है जो अंत तक संघर्ष करता है।

  • मर्यादा और संस्कार: होरी के जीवन का सबसे बड़ा बोझ उसकी "मर्यादा" है। वह भूखा सो सकता है, लेकिन समाज और बिरादरी की नजरों में गिरना उसे बर्दाश्त नहीं। इसी मर्यादा के चक्कर में वह कर्ज के नीचे दबता चला जाता है।

  • सहनशीलता की पराकाष्ठा: वह अपने भाई हीरा द्वारा गाय को जहर दिए जाने पर भी उसे पुलिस से बचाता है। यहाँ उसकी महानता कम और उसकी पारिवारिक नैतिकता अधिक दिखाई देती है।

  • धार्मिक भीरुता: होरी धर्मभीरु है। पंडित दातादीन जैसे लोग उसका शोषण करते हैं, लेकिन वह उसे अपना भाग्य और धर्म का नियम मानकर स्वीकार कर लेता है।

  • त्रासद अंत: होरी की मृत्यु कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि एक "सामाजिक हत्या" है। वह जीवन भर एक गाय की लालसा रखता है, लेकिन अंत में उसकी मृत्यु के समय उससे 'गोदान' (गाय का दान) करवाया जाता है, जो एक कड़वा व्यंग्य है।


2. मालती और मेहता: प्रेमचंद का वैचारिक दृष्टिकोण

यह जोड़ी उपन्यास के शहरी भाग का नेतृत्व करती है और प्रेमचंद के प्रगतिशील विचारों को सामने रखती है।

मिस मालती (हृदय परिवर्तन का उदाहरण)

  • शुरुआत: मालती शुरू में पश्चिमी सभ्यता में रंगी, शिक्षित और स्वतंत्र महिला है। वह पुरुषों को रिझाना और पार्टियों में जाना पसंद करती है।

  • बदलाव: मेहता के संपर्क में आने और गांव के कष्टों को देखने के बाद उसका हृदय परिवर्तन होता है। वह विलासिता त्यागकर गरीबों की सेवा और सादगी को अपनाती है। वह दिखाती है कि शिक्षा का असली उद्देश्य सेवा है।

प्रोफेसर मेहता (प्रेमचंद का आदर्श पात्र)

  • दार्शनिक व्यक्तित्व: मेहता एक गंभीर विचारक हैं। वे बुद्धि और हृदय के संतुलन पर जोर देते हैं।

  • स्त्री के प्रति दृष्टिकोण: मेहता का मानना है कि स्त्री पुरुष से श्रेष्ठ है क्योंकि उसमें ममता, त्याग और सहनशीलता है। वे विवाह को एक सामाजिक समझौता मानते हैं, न कि कोई दैवीय बंधन।

  • यथार्थवादी: वे किताबी ज्ञान के बजाय जीवन के अनुभवों को महत्व देते हैं। वे राय साहब जैसे जमींदारों की विलासिता और उनके दोहरे चरित्र की तीखी आलोचना करते हैं।


निष्कर्ष  

जहाँ होरी का जीवन दिखाता है कि पुरानी रूढ़ियाँ और गरीबी इंसान को कैसे नष्ट कर देती हैं, वहीं मालती और मेहता का जीवन यह उम्मीद जगाता है कि शिक्षा और सही सोच से समाज में बदलाव लाया जा सकता है।

 


1. होरी और धनिया: वैचारिक मतभेद (Hori vs. Dhania)

होरी और धनिया एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, लेकिन दोनों की सोच में ज़मीन-आसमान का अंतर है। प्रेमचंद ने इनके माध्यम से दिखाया है कि एक ही विपत्ति को पुरुष और स्त्री कैसे अलग-अलग देखते हैं।

  • सहनशीलता बनाम विद्रोह: होरी का मानना है कि जो भाग्य में लिखा है उसे सहना ही धर्म है। वह ज़मींदार और पुरोहितों के सामने झुक जाता है। इसके विपरीत, धनिया विद्रोही है। वह साफ़ कहती है—"जिनके पेट में दाना नहीं, उन्हें कैसा धरम और कैसी बिरादरी?"

  • मर्यादा बनाम यथार्थ: होरी अपनी 'मर्यादा' के लिए घर का अनाज बेचकर जुर्माना भर देता है, जबकि धनिया इसका विरोध करती है क्योंकि उसे अपने बच्चों का पेट दिखाई देता है।

  • पुरोहितों के प्रति नज़रिया: होरी दातादीन के चरणों की धूल लेता है, जबकि धनिया उन्हें "लुटेरा" और "पाखंडी" कहने से नहीं डरती।

  • प्रेम का आधार: इतने मतभेदों के बावजूद, दोनों के बीच गहरा प्रेम है। धनिया होरी को कोसती ज़रूर है, लेकिन वह जानती है कि उसका पति सीधा और भोला है। अंत में वह होरी के लिए ही समाज से लड़ जाती है।


2. 'गोदान' के अंत की समीक्षा (Analysis of the Ending)

'गोदान' का अंत हिंदी साहित्य के सबसे दुखद और प्रभावशाली दृश्यों में से एक है। यह अंत एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं, बल्कि एक पूरी व्यवस्था की हार है।

  • करुण अंत: होरी, जो जीवन भर एक गाय पालने की इच्छा रखता था, अंत में लू और थकान के कारण सड़क पर गिरकर मर जाता है। उसके पास अपनी अंतिम क्रिया के लिए भी पैसे नहीं हैं।

  • व्यंग्यात्मक अंत: सबसे बड़ा कटाक्ष तब होता है जब पंडित दातादीन होरी के मरते समय धनिया से कहते हैं—"सुतली (पैसे) लाओ, होरी से गोदान कराओ।" जिस व्यक्ति के पास खाने को दाना नहीं था, धर्म के ठेकेदार उसकी लाश से भी दान वसूलना चाहते हैं।

  • धनिया की लाचारी: धनिया के पास केवल 20 आने हैं, जो उसने सुतली बेचकर कमाए थे। वह वही पैसे दातादीन के हाथ में रखकर कहती है—"महाराज, घर में न गाय है, न बछिया, न पैसा। यही इनका गोदान है।" यह वाक्य पाठक के कलेजे को चीर देता है।

  • अधूरा सपना: होरी का 'गोदान' का सपना अधूरा रहा, जो यह दर्शाता है कि भारतीय किसान चाहे कितनी भी मेहनत कर ले, व्यवस्था उसे कभी उसका हक और सुकून नहीं लेने देती।


निष्कर्ष  

'गोदान' का अंत यह संदेश देता है कि यथार्थ बहुत कड़वा होता है। प्रेमचंद ने 'आदर्शवाद' का सहारा लेकर होरी को अमीर नहीं बनाया, बल्कि उसे मिट्टी में मिलता हुआ दिखाकर समाज की आँखें खोलने की कोशिश की।

 


 

'गोदान' ग्रामीण यथार्थ और शहरी बौद्धिकता

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