'जनतंत्र का जन्म' रामधारी सिंह 'दिनकर' UPESSC, UPHESC

 रामधारी सिंह 'दिनकर' जी की यह कालजयी रचना 'जनतंत्र का जन्म' शीर्षक से प्रसिद्ध है, जिसकी अंतिम पंक्ति "सिंहासन खाली करो कि जनता आती है" अत्यंत प्रभावशाली है। यहाँ पूरी कविता दी गई है:


जनतंत्र का जन्म


सदियों की ठंडी-बुझी राख सुगबुगा उठी,

मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है,

दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

जनता? हाँ, मिट्टी की अबोध मूरतें वही,

जाड़े-पाले की कसक सदा सहने वाली,

जब अंग-अंग में लगे साँप हो चूस रहे,

तब भी न कभी मुँह खोल दर्द कहने वाली।

जनता? हाँ, लंबी-बड़ी जीभ की वही कसम,

जनता सचमुच ही बड़ी वेदना सहती है,

सो ठीक, मगर आखिर इस पर जनमत क्या है?

प्रश्न गूढ़ जनता ही जिसका उत्तर देती है।

वह जनता? हाँ, जो भी हो, पर जनता ही है,

जो कष्ट, बहुत-से कष्ट, सदा ही सहती है,

जिसने न कभी अपना स्वार्थ ही सोचा है,

वह आज क्या कहती है, उसे सुनना चाहिए!

हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती,

साँसों के बल से ताज हवा में उड़ता है,

जनता की रोके राह समय में ताव कहाँ?

वह जिधर चाहती, काल उधर ही मुड़ता है।

अब देखो, यह है जनतंत्र का उदय,

जन-जन के मन में अब नई ज्योति आती है,

उठो, आज सिंहासन खाली करो जनता का,

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।



इस कविता के बारे में कुछ मुख्य तथ्य:

  • संदर्भ: यह कविता दिनकर जी के 'सामधेनी' संग्रह में ही संकलित है।

  • अर्थ: यह कविता लोकतंत्र की शक्ति को रेखांकित करती है। कवि का मानना है कि सत्ता जनता की धरोहर है, और जब जनता जागरूक हो जाती है, तो निरंकुश शासकों को सत्ता छोड़नी ही पड़ती है।

  • प्रभाव: यह पंक्तियाँ भारतीय लोकतंत्र में 'जनशक्ति' के प्रतीक के रूप में आज भी हर राजनीतिक और सामाजिक चर्चा में उद्धृत की जाती हैं।

 


साहित्यिक नोट्स: जनतंत्र का जन्म

1. रचनाकार:

  • नाम: राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर'।

  • विशेषता: दिनकर जी अपनी ओजस्वी (वीर रस और क्रांति) रचनाओं के लिए प्रसिद्ध हैं। वे 'जनशक्ति' के सबसे प्रमुख कवियों में से एक माने जाते हैं।

2. प्रकाशन और संदर्भ:

  • संग्रह: यह कविता उनके प्रसिद्ध काव्य-संग्रह 'सामधेनी' (1947) में संकलित है।

  • समय: यह रचना भारत की स्वतंत्रता के उस महत्वपूर्ण दौर की है, जब देश में लोकतंत्र की नींव रखी जा रही थी।

3. कविता की संरचना:

  • पंक्तियों की संख्या: इसमें कुल 24 पंक्तियाँ (6 पद/स्तंभ) हैं।

  • शैली: यह कविता 'संबोधन' (Addressing) और 'ओजस्वी' शैली में लिखी गई है। इसमें प्रश्न-उत्तर का प्रवाह है जो इसे एक नाटकीय और प्रभावशाली संवाद बनाता है।

4. मुख्य तथ्य (Key Highlights):

  • विषय-वस्तु: लोकतंत्र में 'जनता' की सर्वोच्चता।

  • प्रतीक (Symbols):

    • सिंहासन: सत्ता और शासन का प्रतीक।

    • जनता: 'मिट्टी की अबोध मूरतें' (सीधे-साधे सामान्य नागरिक)।

    • समय का रथ: परिवर्तन का चक्र, जिसे कोई रोक नहीं सकता।

  • संदेश: यह कविता शासकों को चेतावनी देती है कि जनता अब जागरूक हो चुकी है। जब जनता अपनी शक्ति दिखाती है, तो बड़े-बड़े महलों की नींव भी उखड़ जाती है।

  • सर्वोत्तम पंक्ति: "सिंहासन खाली करो कि जनता आती है" — यह पंक्ति आज भी लोकतंत्र की सबसे सशक्त परिभाषा मानी जाती है।

5. कविता का दर्शन:

  • जनशक्ति: दिनकर जी का स्पष्ट मत है कि शासन का असली मालिक राजा या मंत्री नहीं, बल्कि जनता है।

  • क्रांति का स्वर: कविता में पुरानी व्यवस्था (राजशाही या गुलामी) को खत्म करके नई व्यवस्था (लोकतंत्र) को अपनाने का आह्वान है।


एक नज़र में सारणी

विशेषताविवरण
कविरामधारी सिंह 'दिनकर'
संग्रहसामधेनी
प्रकाशन वर्ष1947
मुख्य रसवीर रस (क्रांति का भाव)
मूल विचारलोकतंत्र में जनता की सर्वोच्चता
 

रामधारी सिंह 'दिनकर' जी की कालजयी रचना 'जनतंत्र का जन्म' की व्याख्या नीचे दी गई है। यह कविता भारतीय लोकतंत्र के उदय और जनता की शक्ति को समर्पित है।


'जनतंत्र का जन्म' की विस्तृत व्याख्या

प्रथम पद: परिवर्तन का आह्वान

"सदियों की ठंडी-बुझी राख सुगबुगा उठी,

मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है,

दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।"

व्याख्या: कवि कहते हैं कि सदियों की गुलामी के बाद अब जनता में चेतना जागृत हो रही है। जो जनता कल तक दबी-कुचली (राख के समान) थी, आज वह शक्ति संपन्न होकर राज करने के लिए तैयार है। समय का पहिया अब बदल चुका है (समय का रथ चल पड़ा है), इसलिए जो शासक जनता के दम पर सत्ता भोग रहे थे, उन्हें चेतावनी दी जा रही है कि अब समय आ गया है कि वे कुर्सी छोड़ दें, क्योंकि अब असली शासक 'जनता' है।

द्वितीय पद: जनता का धैर्य और कष्ट

"जनता? हाँ, मिट्टी की अबोध मूरतें वही,

जाड़े-पाले की कसक सदा सहने वाली,

जब अंग-अंग में लगे साँप हो चूस रहे,

तब भी न कभी मुँह खोल दर्द कहने वाली।"

व्याख्या: यहाँ कवि जनता के स्वरूप का वर्णन करते हैं। वे जनता को 'मिट्टी की अबोध मूरत' कहते हैं क्योंकि वह भोली और सरल है। जनता ने वर्षों से गरीबी, ठंढ, और शोषण (साँपों जैसा कष्ट) को सहते हुए भी कभी कोई शिकायत नहीं की। उनका सहनशक्ति का स्तर बहुत ऊंचा है।

तृतीय पद: जनमत का प्रश्न

"जनता? हाँ, लंबी-बड़ी जीभ की वही कसम,

जनता सचमुच ही बड़ी वेदना सहती है,

सो ठीक, मगर आखिर इस पर जनमत क्या है?

प्रश्न गूढ़ जनता ही जिसका उत्तर देती है।"

व्याख्या: कवि कहते हैं कि जनता के कष्टों के बारे में बहुत बातें (लंबी-बड़ी जीभ) की जाती हैं। यह सच है कि जनता बहुत पीड़ा सहती है। लेकिन इस कष्ट और शोषण के दौर में जनता की अपनी इच्छा (जनमत) क्या है? कवि स्वयं कहते हैं कि इस जटिल प्रश्न का उत्तर केवल जनता ही दे सकती है, क्योंकि अब वह गूंगी नहीं रही।

चतुर्थ पद: जनता का निस्वार्थ समर्पण

"वह जनता? हाँ, जो भी हो, पर जनता ही है,

जो कष्ट, बहुत-से कष्ट, सदा ही सहती है,

जिसने न कभी अपना स्वार्थ ही सोचा है,

वह आज क्या कहती है, उसे सुनना चाहिए!"

व्याख्या: जनता निस्वार्थ है, उसने कभी अपने निजी लाभ के लिए संघर्ष नहीं किया, बल्कि हमेशा दूसरों के लिए बलिदान दिया है। ऐसी महान जनता आज जब अपनी बात कह रही है, तो शासकों को अहंकार त्यागकर उसे ध्यान से सुनना चाहिए।

पंचम पद: जनता की शक्ति

"हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती,

साँसों के बल से ताज हवा में उड़ता है,

जनता की रोके राह समय में ताव कहाँ?

वह जिधर चाहती, काल उधर ही मुड़ता है।"

व्याख्या: यहाँ कवि जनता की अपार शक्ति का वर्णन करते हैं। जनता की एक हुंकार से बड़े-बड़े महलों की नींवें हिल जाती हैं और उनकी साँसों (एकजुटता) के बल से सत्ता का ताज उड़ जाता है। समय के पास भी इतनी ताकत नहीं कि वह जनता के मार्ग को रोक सके। काल का चक्र भी वही मुड़ता है, जहाँ जनता उसे मोड़ना चाहती है।

छठा पद: जनतंत्र का उदय

"अब देखो, यह है जनतंत्र का उदय,

जन-जन के मन में अब नई ज्योति आती है,

उठो, आज सिंहासन खाली करो जनता का,

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।"

व्याख्या: अंत में, कवि देश में जनतंत्र (लोकतंत्र) के आगमन की घोषणा करते हैं। हर व्यक्ति के मन में आजादी और अधिकार की ज्योति जल उठी है। अंततः कवि पुराने शासकों को आदेश देते हैं कि वे सिंहासन खाली कर दें, क्योंकि अब शासन करने का असली अधिकार जनता का है।


निष्कर्ष

यह कविता न केवल भारत की आज़ादी के समय की है, बल्कि यह हर उस युग के लिए प्रेरणा है जहाँ जनता अपने अधिकारों के लिए जागरूक होती है। दिनकर जी ने यहाँ सिद्ध किया है कि लोकतंत्र में जनता ही सबसे बड़ी शक्ति है।

 

1. दिनकर जी का 'जनतंत्र' का दर्शन

दिनकर जी की इस कविता में 'जनतंत्र' केवल चुनाव या वोट देने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह न्याय और समानता की स्थापना है। उनके दर्शन में लोकतंत्र के दो मुख्य स्तंभ हैं:

  • जनता की चेतना: जब तक जनता जागरूक नहीं है, वह 'मिट्टी की अबोध मूरत' है।

  • शासकों का उत्तरदायित्व: जब जनता जागरूक हो जाती है, तो शासक उसे 'प्रजा' नहीं, बल्कि 'स्वामी' मानने पर मजबूर हो जाते हैं।

2. 'सिंहासन खाली करो' का गहरा अर्थ

यह पंक्ति आज भी इतनी लोकप्रिय क्यों है? इसके पीछे दो कारण हैं:

  • अहंकार का नाश: 'सिंहासन' यहाँ केवल एक कुर्सी नहीं है, बल्कि यह सत्ता के अहंकार का प्रतीक है। दिनकर जी का मानना है कि जो शासक जनता की पीड़ा को नहीं सुनता, उसे कुर्सी पर बैठने का नैतिक अधिकार नहीं है।

  • समय की गति: "समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो" - यह पंक्ति यह दर्शाती है कि परिवर्तन एक प्राकृतिक नियम है। जैसे समय को कोई नहीं रोक सकता, वैसे ही जनता के उदय (जागरूकता) को भी कोई नहीं रोक सकता।

3. जनता के प्रति दिनकर जी की दृष्टि

दिनकर जी जनता को 'सहनशीलता की प्रतिमूर्ति' मानते हैं। उन्होंने लिखा है: "जिसने न कभी अपना स्वार्थ ही सोचा है"—यह वाक्य बहुत महत्वपूर्ण है। यह दिखाता है कि जनता की लड़ाई किसी एक व्यक्ति की सत्ता पाने के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के कल्याण के लिए है।

4. आज के परिप्रेक्ष्य में प्रासंगिकता

क्या आज यह कविता प्रासंगिक है? बिल्कुल। आज के दौर में जब भी कोई सरकार जनता की अनदेखी करती है या जब भी समाज के उपेक्षित वर्ग अपनी आवाज उठाते हैं, तो यह पंक्तियाँ स्वतः ही याद आ जाती हैं। यह कविता हमें याद दिलाती है कि लोकतंत्र में जनता ही असली नायक है।


 

रामधारी सिंह 'दिनकर' जी की कविता 'जनतंत्र का जन्म' पर आधारित 30 महत्वपूर्ण बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ) यहाँ दिए गए हैं। ये प्रश्न आपकी परीक्षा और समझ के लिए अत्यंत उपयोगी हैं।


'जनतंत्र का जन्म' - वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQ)

1. 'जनतंत्र का जन्म' कविता के रचयिता कौन हैं?

(क) निराला (ख) दिनकर (ग) पंत (घ) महादेवी

2. यह कविता किस काव्य-संग्रह से ली गई है?

(क) उर्वशी (ख) रश्मिरथी (ग) सामधेनी (घ) हुंकार

3. 'मिट्टी की अबोध मूरतें' किसे कहा गया है?

(क) शासकों को (ख) सैनिकों को (ग) जनता को (घ) कवियों को

4. दिनकर जी के अनुसार समय के रथ का क्या हो रहा है?

(क) रुक रहा है (ख) घर्घर-नाद (ग) पहिये टूट रहे हैं (घ) गति धीमी है

5. कविता में किसे 'सिंहासन खाली करने' की चेतावनी दी गई है?

(क) जनता को (ख) शासकों को (ग) कवियों को (घ) देवताओं को

6. 'मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है' - इसमें कौन सा अलंकार है?

(क) उपमा (ख) मानवीकरण (ग) रूपक (घ) श्लेष

7. जनता के अंग-अंग को कौन चूस रहे थे?

(क) साँप (ख) विदेशी (ग) नेता (घ) शोषक वर्ग

8. जनता को कैसा स्वभाव बताया गया है?

(क) क्रोधी (ख) स्वार्थी (ग) सहनशील (घ) डरपोक

9. 'हुंकारों से' किनकी नींव उखड़ जाती है?

(क) महलों की (ख) झोपड़ियों की (ग) समाज की (घ) देश की

10. जनता के 'साँसों के बल' से क्या उड़ जाता है?

(क) धूल (ख) ताज (ग) पक्षी (घ) बादल

11. जनतंत्र में नई ज्योति किसके मन में आती है?

(क) राजा (ख) जन-जन (ग) विदेशी (घ) मंत्री

12. 'सदियों की ठंडी-बुझी राख' किसका प्रतीक है?

(क) निराशा का (ख) जोश का (ग) जनता की चेतना का (घ) आलस्य का

13. कविता में 'काल' (समय) किधर मुड़ता है?

(क) जिधर शासक चाहते हैं (ख) जिधर जनता चाहती है (ग) जिधर हवा बहती है (घ) कहीं नहीं

14. इस कविता में मुख्य रूप से किस रस का प्रयोग है?

(क) वीर (ख) श्रृंगार (ग) करुण (घ) हास्य

15. 'जनतंत्र का जन्म' कविता का केंद्रीय भाव क्या है?

(क) भक्ति (ख) देशभक्ति और जनचेतना (ग) विरह (घ) प्रकृति प्रेम

16. दिनकर जी किस प्रकार के कवि माने जाते हैं?

(क) छायावादी (ख) प्रगतिवादी/ओजस्वी (ग) रहस्यवादी (घ) प्रयोगवादी

17. जनता के प्रति कवि का क्या दृष्टिकोण है?

(क) तिरस्कारपूर्ण (ख) सहानुभूतिपूर्ण (ग) तटस्थ (घ) व्यंग्यात्मक

18. क्या जनता ने कभी अपने स्वार्थ के बारे में सोचा है?

(क) हाँ (ख) कभी-कभी (ग) नहीं (घ) केवल संकट में

19. 'सामधेनी' संग्रह कब प्रकाशित हुआ था?

(क) 1945 (ख) 1947 (ग) 1950 (घ) 1942

20. जनता की राह रोकने का साहस किसमें नहीं है?

(क) शासक में (ख) समय में (ग) कानून में (घ) सेना में

21. कविता में 'जनमत' को कैसा प्रश्न कहा गया है?

(क) सरल (ख) गूढ़ (ग) बेकार (घ) अनावश्यक

22. जनता किसका ताज पहनकर इठला रही है?

(क) मिट्टी का (ख) सोने का (ग) चांदी का (घ) फूल का

23. 'जाड़े-पाले की कसक' का क्या अर्थ है?

(क) गरीबी और दुखों को सहना (ख) केवल ठण्ड सहना (ग) खेल खेलना (घ) यात्रा करना

24. जनता के पास क्या नहीं है?

(क) सहनशीलता (ख) आवाज (ग) डर (घ) एकता

25. 'सिंहासन खाली करो कि जनता आती है' - यह पंक्ति क्या दर्शाती है?

(क) सत्ता का परिवर्तन (ख) युद्ध का आरम्भ (ग) राजा का स्वागत (घ) मनोरंजन

26. जनता की रोके राह समय में क्या नहीं है?

(क) ताव (ख) शक्ति (ग) गति (घ) धैर्य

27. यह कविता किस युग की रचना है?

(क) भक्ति काल (ख) आधुनिक काल (ग) आदिकाल (घ) रीति काल

28. 'जन-जन के मन में अब नई ज्योति आती है' - यह ज्योति क्या है?

(क) आज़ादी की (ख) रोशनी (ग) दीये की (घ) प्रेम की

29. दिनकर जी ने जनता को क्या माना है?

(क) दास (ख) ईश्वर (ग) स्वामी (घ) सेवक

30. इस कविता का मुख्य संदेश क्या है?

(क) राजतंत्र श्रेष्ठ है (ख) लोकतंत्र ही सर्वोपरि है (ग) कवि श्रेष्ठ है (घ) समाज बेकार है


उत्तर तालिका:

प्रश्नउत्तरप्रश्नउत्तरप्रश्नउत्तर
1(ख)11(ख)21(ख)
2(ग)12(क)22(ख)
3(ग)13(ख)23(क)
4(ख)14(क)24(ग)
5(ख)15(ख)25(क)
6(ग)16(ख)26(क)
7(क)17(ख)27(ख)
8(ग)18(ग)28(क)
9(क)19(ख)29(ग)
10(ख)20(ख)30(ख)

 

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  रामधारी सिंह 'दिनकर' जी की यह कालजयी रचना 'जनतंत्र का जन्म' शीर्षक से प्रसिद्ध है, जिसकी अंतिम पंक्ति "सिंहासन खाली ...