'अपनी खबर' आत्मकथा - पांडेय बेचन शर्मा उग्र 50 MCQ व संपूर्ण समीक्षा,

 पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र' (1900–1967) हिंदी साहित्य में प्रेमचंद युगीन यथार्थवादी और प्रकृतिवादी (Naturalist) धारा के सबसे प्रमुख और विवादास्पद रचनाकार माने जाते हैं। उन्होंने हिंदी साहित्य में पहली बार समाज के उन स्याह और वर्जित पक्षों (taboos) को अपनी रचनाओं का विषय बनाया, जिन पर उस समय बात करना भी अनुचित माना जाता था।


1. प्रमुख उपन्यास:

  • चंद हसीनों के खतूत (1927): यह हिंदी का पहला पत्रात्मक प्रविधि (Epistolary style) में लिखा गया उपन्यास माना जाता है। इसमें हिंदू-मुस्लिम प्रेम विवाह का चित्रण है।

  • दिल्ली का दलाल (1927): युवतियों के क्रय-विक्रय और समाज में पनप रही वेश्यावृत्ति तथा दलाली की समस्या पर केंद्रित।

  • बुधुआ की बेटी (1928): अछूतोद्धार और दलित विमर्श की दृष्टि से महत्वपूर्ण रचना, जिसे बाद में 'मनुष्यानंद' नाम से भी प्रकाशित किया गया।

  • शराबी (1930): वेश्याओं और शराबियों के जीवन के यथार्थ का चित्रण।

  • सरकार तुम्हारी आँखों में (1936): शासन और व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य।

  • जीजीजी (1937): हिंदू समाज की कुरीतियों पर प्रहार।

2. प्रमुख कहानी संग्रह:

  • चिंगारियाँ (1923): यह उनकी राष्ट्रीय और विद्रोही कहानियों का संग्रह था, जिसे ब्रिटिश सरकार द्वारा ज़ब्त (Ban) कर लिया गया था।

  • चॉकलेट (1927): इस संग्रह में समलैंगिकता (विशेषकर बाल-प्रेम या पेडेरास्टी) जैसे अत्यंत वर्जित विषय को उठाया गया, जिस पर उस समय भारी विवाद हुआ था।

  • अन्य संग्रह: शैतान मंडली (1924), इन्द्रधनुष (1932), बलात्कार (1927), निर्लज्जा (1929), पंजाब की महारानी, और रेशमी।

3. आत्मकथा (सर्वाधिक प्रसिद्ध):

  • अपनी खबर (1960): यह हिंदी की सबसे बेबाक, ईमानदार और क्रूर यथार्थ से भरी आत्मकथा मानी जाती है। इसमें उन्होंने अपने जीवन की बुराइयों, पारिवारिक कलह और तत्कालीन साहित्यिक समाज के पाखंडों का बिना किसी लाग-लपेट के वर्णन किया है।

4. नाटक:

  • महात्मा ईसा (1922), चुम्बन (1937), डिक्टेटर (1937)।

साहित्यिक पत्रकारिता:
उग्र जी का संबंध 'मतवाला' और 'स्वदेश' जैसे पत्रों से रहा। 'मतवाला' मंडल के वे प्रमुख सदस्य थे और उनकी शैली का तीखापन इसी पत्र की देन माना जाता है।

'घासलेटी साहित्य' का विवाद:
उग्र जी की रचनाओं ('चॉकलेट' और 'दिल्ली का दलाल' आदि) में चित्रित उघड़े हुए यथार्थ और भाषा के खुलेपन को लेकर बनारसीदास चतुर्वेदी ने विशाल भारत पत्रिका के माध्यम से एक लंबा अभियान चलाया और उग्र के साहित्य को 'घासलेटी साहित्य' (सस्ते दर्जे का या अश्लील साहित्य) कहकर उसकी कड़ी आलोचना की। इसके बचाव में मतवाला मंडल के लेखकों ने उग्र का समर्थन किया था।

साहित्यिक मूल्यांकन:
रामस्वरूप चतुर्वेदी और नामवर सिंह जैसे आलोचकों ने माना है कि जहाँ प्रेमचंद का यथार्थवाद आदर्शोन्मुखी था, वहीं उग्र का यथार्थवाद नग्न और प्रकृतिवादी था। उन्होंने समाज के पाखंड, धार्मिक आडंबर और मध्यवर्गीय खोखलेपन का जो निर्मम पर्दाफाश किया, वह हिंदी गद्य में एक सर्वथा नए और साहसिक युग की शुरुआत थी।
पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र' की आत्मकथा 'अपनी खबर' (1960) 
हिंदी साहित्य की सबसे विशिष्ट, बेबाक और निर्भीक आत्मकथाओं में गिनी जाती है। इसमें उग्र जी ने 15 अध्यायों में अपने जीवन के आरंभिक 21 वर्षों के संघर्ष और क्रूर यथार्थ का सजीव वर्णन किया है।

'अपनी खबर' की प्रमुख विशेषताएँ

  • निर्मम साफगोई और ईमानदारी: इस आत्मकथा की सबसे बड़ी विशेषता लेखक की निर्भीकता है। उग्र जी ने अपने जीवन के काले अध्यायों, जैसे रामलीला मंडली में बिताए दिनों, वहां व्याप्त व्यभिचार और महज 12 वर्ष की उम्र में 17 वर्ष की लड़की के प्रति आकर्षण को बिना किसी लाग-लपेट के प्रस्तुत किया है।

  • पारिवारिक और सामाजिक खोखलेपन पर प्रहार: उन्होंने अपने ही ब्राह्मण परिवार की दुर्दशा, ऐयाश भाइयों द्वारा वेश्यागमन, और माँ की पिटाई जैसे यथार्थ का खुलकर चित्रण किया है। उग्र जी ने स्पष्ट लिखा है कि यह केवल उनके घर का नहीं, बल्कि समाज के घर-घर का नाटक था।

  • स्वयं को 'असाधारण शूद्र' घोषित करना: ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के बावजूद, परिवार के कर्मों को देखकर वे स्वयं को निस्संकोच 'शूद्र' कहते हैं । वे अपनी 'अनगढ़ता' पर गर्व करते हैं क्योंकि उनका मानना था कि अनगढ़ पत्थर में ही विश्व की विराट मूर्ति बनने की संभावना सुरक्षित रहती है।

  • जजमानी प्रथा और धार्मिक पाखंड का विरोध: आत्मकथा में तत्कालीन ब्राह्मण समाज की पतनशील 'जजमानी वृत्ति' को एक हेय और नितांत कमीना धंधा बताया गया है, जहाँ नीच कर्म करने वाले भी दूसरों से चरण पुजवाते थे।

  • दुख और अभावों का जीवन: उग्र जी का जीवन घोर गरीबी और अभावों में बीता, यहाँ तक कि जन्मते ही उन्हें महज एक टके में बेच दिया गया था, जिससे उनका नाम 'बेचन' पड़ा। इसी दुख के कारण वे कहते हैं कि उन्होंने अपना जीवन दर्शन नरक के सिरे से शुरू किया और स्वर्ग उन्हें कभी नज़र नहीं आया।

  • भाषा और शैली: इसकी भाषा-शैली अत्यधिक विशिष्ट है। इसमें देशज और तत्सम शब्दों का मिला-जुला प्रयोग हुआ है और व्यास शैली की अधिकता हैउग्र जी ने अक्खड़पन, फक्कड़पन और अपनी अनुभूतियों की पवित्रता बनाए रखने के लिए शब्दों के चयन में कभी कोताही नहीं बरती।

समीक्षात्मक मूल्यांकन

हिंदी साहित्य में 'अपनी खबर' का मूल्यांकन एक ऐसे दस्तावेज़ के रूप में किया जाता है जिसने आत्मकथा लेखन में नैतिकता और 'सच्चरित्रता' के ढकोसले को तिलांजलि दे दी। आलोचक मानते हैं कि जहाँ हिंदी में लोग अपनी कमियों को छिपाकर खुद को महिमामंडित करते थे, उग्र जी ने मनुष्य के भीतर छिपे पशु को पहचानने की साहसिक कोशिश की।

इस आत्मकथा को पढ़कर समाज और जीवन की तमाम रूमानियतें खारिज हो जाती हैं। गरीबी और विपन्नता व्यक्ति को कितना निष्ठुर बना सकती है, इसका यह प्रामाणिक गवाह है । अपनी इसी बेबाक और कड़वी सच्चाई को बयां करने के कारण पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र' को हिंदी साहित्य का मंटो भी कहा जाता है। आधुनिक साहित्य पर इस किताब का गहरा प्रभाव है और इसे ईमानदार लेखन का एक सटीक उदाहरण माना जाता है।
 
पात्र / व्यक्तिआत्मकथा में भूमिका और विवरण
पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र'स्वयं लेखक। आत्मकथा के केंद्र में, जो अपने जन्म से लेकर 21 वर्ष तक के घोर अभावग्रस्त, विद्रोही और 'अनगढ़' जीवन का बेबाक वर्णन करते हैं।
बैजनाथ पांडेय (पिता)उग्र जी के पिता। उत्तर प्रदेश के चुनार के निवासी, जो पक्के रामलीला प्रेमी थे और पारंपरिक ब्राह्मण जजमानी वृत्ति से जुड़े थे।
माताएक अत्यंत सहनशील, सीधी और दुखियारी स्त्री। आत्मकथा में इन्हें शराबी पति और ऐयाश बेटों द्वारा शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित होते हुए दिखाया गया है।
बड़े भाईउग्र जी के बड़े भाई, जिनका जीवन शराब, वेश्यावृत्ति और दुर्व्यसनों में डूबा हुआ था। परिवार में इन्हीं के अनैतिक कृत्यों को देखकर उग्र जी को ब्राह्मणत्व से वितृष्णा हुई।
एक 17 वर्षीय युवतीआत्मकथा के आरंभिक अध्यायों में उल्लिखित एक अनाम लड़की, जिसके प्रति महज 12 वर्ष की अल्पायु में उग्र जी का तीव्र आकर्षण पैदा हुआ था।
रामलीला मंडली के महन्त व अन्यवे लोग जिनके साथ उग्र जी ने बचपन में रामलीलाओं (सीता आदि के रूप में) में अभिनय किया। इनके माध्यम से उग्र जी ने धर्म के पर्दे के पीछे पनप रहे बाल-शोषण और व्यभिचार का पर्दाफाश किया है।
पं. झाबरमल्ल शर्माकलकत्ता (अब कोलकाता) प्रवास के दौरान उग्र जी को आश्रय देने वाले और उनके साहित्यिक-पत्रकारिता जीवन को दिशा देने वाले प्रमुख व्यक्ति।
बाबूराव विष्णु पराड़कर'आज' समाचार पत्र के ख्यातिप्राप्त संपादक, जिनके सानिध्य में आकर उग्र जी ने पत्रकारिता की बारीकियां सीखीं।
महादेव प्रसाद सेठकलकत्ता से प्रकाशित 'मतवाला' पत्र के संचालक। इन्होंने उग्र जी की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें 'मतवाला' मंडल का प्रमुख हिस्सा बनाया।
सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला''मतवाला' मंडल के प्रमुख सहयोगी और उग्र जी के समकालीन मित्र, जिनका आत्मकथा के अंतिम हिस्सों (साहित्यिक जीवन के आरंभ) में उल्लेख मिलता है।
'अपनी खबर' में मुख्य पारिवारिक और साहित्यिक व्यक्तियों के अलावा उग्र जी के आरंभिक जीवन (जन्म से 21 वर्ष की आयु तक), रामलीला के दिनों, कलकत्ता प्रवास और जेल जीवन से जुड़े कई अन्य महत्वपूर्ण व्यक्ति भी शामिल हैं।

यहाँ उन अन्य (गौण लेकिन महत्वपूर्ण) व्यक्तियों / पात्रों का विवरण है:

पात्र / व्यक्तिआत्मकथा में भूमिका और विवरण
भाभी (बड़े भाई की पत्नी)उग्र जी के घर के क्लेश और यथार्थ की एक और मूक और पीड़ित पात्रा। बड़े भाई के वेश्यागमन और नशे की लत के कारण इनका जीवन भी घोर उपेक्षा और दुख में बीता।
रामलीला के 'व्यास' (निर्देशक)रामलीला मंडली के वे लोग जो उग्र जी और अन्य बच्चों को अभिनय सिखाते थे। इनके माध्यम से उग्र जी ने धर्म की आड़ में चल रहे पाखंड का पर्दाफाश किया है।
मास्टर / स्कूल के शिक्षकउग्र जी की आरंभिक शिक्षा बहुत व्यवस्थित नहीं रही। उनके शुरुआती गुरु और शिक्षक, जिन्होंने उनके अक्खड़ और विद्रोही स्वभाव को करीब से देखा।
आचार्य शिवपूजन सहाय'मतवाला' पत्रिका के संपादक मंडल के एक और प्रमुख स्तंभ और उग्र जी के घनिष्ठ मित्र। उग्र जी की भाषा और शैली को परिष्कृत करने तथा उन्हें साहित्यिक पहचान दिलाने में इनका भी सहयोग रहा।
नवजादिक लाल श्रीवास्तवकलकत्ता में 'मतवाला' मंडल से जुड़े एक अन्य महत्वपूर्ण व्यक्ति, जिनका उग्र जी के शुरुआती पत्रकारीय और साहित्यिक जीवन में उल्लेख आता है।
गाजीपुर और बनारस जेल के साथीआत्मकथा का अंत 1921 के असहयोग आंदोलन और उग्र जी के जेल जाने (21 वर्ष की आयु में) की घटना के साथ होता है। यहाँ जेल में मिले राजनीतिक बंदियों और स्वतंत्रता सेनानियों का भी उन्होंने संस्मरण के रूप में उल्लेख किया है।
समाज के तथाकथित 'भक्त' और 'रईस'चुनार और बनारस के वे रईस और ढोंगी भक्त, जो दिन में धर्म का चोला पहनते थे और रात में अनैतिक कार्यों (वेश्यावृत्ति आदि) में लिप्त रहते थे। उग्र जी ने इन्हें अपनी आत्मकथा में सामूहिक पात्रों के रूप में नंगा किया है।
'अपनी खबर' के अंतिम अध्यायों में पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र' के कलकत्ता प्रवास, 'मतवाला' मंडल से उनके जुड़ाव और 1921 के असहयोग आंदोलन के दौरान उनके जेल जीवन का अत्यंत प्रामाणिक और सजीव वर्णन मिलता है। यह वह दौर था जिसने चुनार के एक अभावग्रस्त और अक्खड़ युवक को हिंदी साहित्य का सबसे विद्रोही रचनाकार बना दिया।

'मतवाला' मंडल और साहित्यिक संघर्ष का यथार्थ:

  • 'उग्र' उपनाम की सार्थकता: कलकत्ता जाकर जब वे महादेव प्रसाद सेठ और आचार्य शिवपूजन सहाय के संपर्क में आए, तो उनके भीतर के विद्रोही लेखक को सही मंच मिला। उनके अक्खड़पन, तीखी भाषा और निर्भीक विचारों को देखते हुए ही 'मतवाला' के दौर में उनका उपनाम 'उग्र' सार्थक हुआ।

  • दिग्गजों का सानिध्य: आत्मकथा में उग्र जी बताते हैं कि बाबूराव विष्णु पराड़कर ('आज' के संपादक) और बाद में सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' जैसे महारथियों के बीच काम करते हुए उनकी साहित्यिक दृष्टि कैसे परिपक्व हुई। मतवाला का माहौल पूरी तरह से बेबाक और रूढ़िभंजक था, जो उग्र जी की अपनी प्रकृति से बिल्कुल मेल खाता था।

  • पाखंड पर साहित्यिक प्रहार: बचपन में रामलीला मंडली और अपने परिवार में उन्होंने धर्म और समाज का जो घिनौना रूप देखा था, उसे 'मतवाला' के माध्यम से अभिव्यक्ति मिली। उन्होंने समाज के तथाकथित भद्रलोक के पीछे छिपे व्यभिचार, दलितों की दुर्दशा और वेश्यावृत्ति जैसे वर्जित विषयों पर अपनी कलम चलानी शुरू की।

  • आर्थिक संघर्ष: कलकत्ता में भी उनका जीवन बहुत सुखमय नहीं था। पत्रकारिता के शुरुआती दिनों में उन्होंने कड़ा आर्थिक संघर्ष किया, लेकिन अपनी वैचारिक स्वतंत्रता और फक्कड़पन के साथ कभी समझौता नहीं किया।

जेल जीवन और राजनीतिक चेतना (21 वर्ष की आयु का पड़ाव):

  • असहयोग आंदोलन में कूदना: आत्मकथा का चरमोत्कर्ष उग्र जी के भीतर छिपी तीव्र राष्ट्रीय भावना के जागृत होने के साथ होता है। 1921 में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर वे स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े।

  • उग्र भाषण और गिरफ्तारी: उनके भाषण और लेख इतने ओजस्वी और 'उग्र' होते थे कि ब्रिटिश सरकार की नज़र उन पर पड़ गई। मात्र 21 वर्ष की आयु में राजद्रोह और भड़काऊ गतिविधियों के आरोप में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

  • गाजीपुर और बनारस जेल के अनुभव: आत्मकथा में उन्होंने बनारस और गाजीपुर जेल की काल कोठरियों में बिताए दिनों का निर्मम चित्रण किया है। उन्होंने जेल के भीतर फैले भ्रष्टाचार, कैदियों के साथ होने वाले अमानवीय व्यवहार और जेलर की क्रूरता को उघाड़ कर रख दिया।

  • देशभक्तों के दोहरे चरित्र का पर्दाफाश: उग्र जी की सबसे बड़ी विशेषता उनकी तटस्थता है। उन्होंने केवल अंग्रेजों की बुराई नहीं की, बल्कि जेल में बंद उन तथाकथित 'देशभक्तों' और 'नेताओं' के खोखलेपन और कायरता का भी भंडाफोड़ किया, जो बाहर तो शेर बनते थे लेकिन जेल के भीतर सुविधा-भोगी और डरपोक थे।

'अपनी खबर' इसी 21 वर्ष की आयु के पड़ाव और जेल यात्रा के साथ समाप्त हो जाती है। यह आत्मकथा स्पष्ट करती है कि उग्र जी का विद्रोही साहित्य कोई कोरी कल्पना नहीं था, बल्कि वह उनके द्वारा जिए गए इसी क्रूर सामाजिक और राजनीतिक यथार्थ की सीधी उपज था।
पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र' की आत्मकथा 'अपनी खबर' मुख्य रूप से 15 अध्यायों में विभाजित है, जिसमें उनके जन्म (1900) से लेकर 1921 (21 वर्ष की आयु) तक के जीवन का क्रमिक विवरण है।

आत्मकथा की विषय-वस्तु के विकास के आधार पर अध्यायवार (चरणबद्ध) विवरण का चार्ट नीचे दिया गया है:
अध्याय / क्रममुख्य घटनाएँ और विषय-वस्तु
अध्याय 1जन्म और 'बेचन' नामकरण: उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के चुनार गाँव में जन्म। घोर दरिद्रता का चित्रण। मृत्यु के भय से जन्मते ही एक टके में बेच दिए जाने की घटना, जिससे उनका नाम 'बेचन' पड़ा।
अध्याय 2पारिवारिक पृष्ठभूमि: पिता बैजनाथ पांडेय का परिचय, जो सीधे-सादे, पक्के रामलीला प्रेमी और जजमानी वृत्ति से जुड़े ब्राह्मण थे। माँ के अत्यंत कष्टप्रद और संघर्षशील जीवन का आरंभिक वर्णन।
अध्याय 3जजमानी प्रथा पर प्रहार: तत्कालीन ब्राह्मण समाज की पतनशील जजमानी प्रथा का यथार्थ। उग्र जी द्वारा इस वृत्ति को 'कमीना धंधा' बताना और समाज के धार्मिक खोखलेपन की आलोचना।
अध्याय 4भाइयों का दुर्व्यसन: बड़े भाइयों के चरित्रहीन होने, शराब और वेश्यागमन की लत का निर्मम चित्रण। घर में कलह का वातावरण।
अध्याय 5घरेलू हिंसा और पीड़ा: भाइयों और शराबी पिता द्वारा माँ और भाभी की पिटाई तथा दुर्दशा का सजीव वर्णन। इसी अध्याय से उग्र जी के मन में ब्राह्मणत्व और पारिवारिक आदर्शों के प्रति घोर वितृष्णा जन्म लेती है।
अध्याय 6स्वयं को 'शूद्र' घोषित करना: परिवार के इन्हीं कुकर्मों और पतनशील आचरण को देखकर उग्र जी द्वारा निडरता से यह घोषणा करना कि वे जन्म से ब्राह्मण होकर भी कर्म से 'शूद्र' हैं।
अध्याय 7रामलीला मंडली का अनुभव: बचपन में रामलीलाओं में सीता और अन्य पात्रों का अभिनय करना। रामलीला के 'व्यास' (निर्देशकों) का परिचय और उस परिवेश का चित्रण।
अध्याय 8धर्म की आड़ में पाखंड: रामलीला के पर्दे के पीछे पनप रहे व्यभिचार, बाल-शोषण और तथाकथित धर्म-ध्वजवाहकों (रईसों और भक्तों) के असली और घिनौने चेहरों का पर्दाफाश।
अध्याय 9बाल-सुलभ आकर्षण और यथार्थ: महज 12 वर्ष की उम्र में एक 17 वर्षीय युवती के प्रति तीव्र शारीरिक और मानसिक आकर्षण का बेबाक और अत्यंत ईमानदार वर्णन। (यह अध्याय हिंदी आत्मकथाओं में अपनी बेबाकी के लिए विशेष चर्चित रहा है)।
अध्याय 10शिक्षा और भटकाव: विधिवत शिक्षा का अभाव, अक्खड़पन का विकास और चुनार से निकलकर बनारस (काशी) के परिवेश में आना।
अध्याय 11कलकत्ता गमन: रोजगार और जीवन की तलाश में कलकत्ता (कोलकाता) की यात्रा। वहाँ का शुरुआती कड़ा संघर्ष।
अध्याय 12पत्रकारिता में प्रवेश: पं. झाबरमल्ल शर्मा का आश्रय मिलना। 'आज' समाचार पत्र से जुड़ना और बाबूराव विष्णु पराड़कर जैसे दिग्गज संपादक से पत्रकारिता की बारीकियां सीखना।
अध्याय 13'मतवाला' मंडल और 'उग्र' का उदय: महादेव प्रसाद सेठ के संपर्क में आना और 'मतवाला' पत्रिका से जुड़ना। यहीं पर विद्रोही तेवर के कारण उनका उपनाम 'उग्र' सार्थक हुआ। शिवपूजन सहाय आदि का सानिध्य।
अध्याय 14राष्ट्रीय चेतना का जागरण: 1921 के महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन का प्रभाव। पत्रकारिता से आगे बढ़कर सीधे स्वतंत्रता संग्राम में कूदना और अपने ओजस्वी भाषणों से जनता को प्रेरित करना।
अध्याय 15गिरफ्तारी और जेल जीवन (21 वर्ष की आयु): भड़काऊ भाषणों (राजद्रोह) के कारण ब्रिटिश सरकार द्वारा गिरफ्तारी। बनारस और गाजीपुर जेल की यातनाएँ, जेल के भीतर के भ्रष्टाचार और तथाकथित 'देशभक्तों' के दोहरे चरित्र और कायरता का नग्न चित्रण। यहीं पर आत्मकथा का अंत होता है।
पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र' की आत्मकथा 'अपनी खबर' की 50 प्रमुख पंक्तियाँ और वैचारिक अभिव्यक्तियाँ:

जन्म, परिवार और गरीबी का यथार्थ

  1. "मैं जन्मना ब्राह्मण हूँ, किंतु कर्मणा शूद्र।"

  2. "जिस बाप ने मुझे पैदा किया, उसी ने मृत्यु के अंधविश्वास में मुझे महज एक टके में बेच भी दिया।"

  3. "मेरे जीवन का आरंभ ही नरक से हुआ, स्वर्ग की मैंने कभी कल्पना भी नहीं की।"

  4. "अनगढ़ पत्थरों में ही प्रतिमा बनने की संभावना सुरक्षित रहती है।"

  5. "मेरी आत्मकथा किसी पुण्यात्मा की रामकहानी नहीं, बल्कि एक पापी का कच्चा चिट्ठा है।"

  6. "जजमानी वृत्ति से नीच, पतित और कमीना पेशा मेरी नज़र में दूसरा कोई नहीं है।"

  7. "मेरे घर का वातावरण ऐसा था कि कोई देवता भी वहाँ जन्म लेता तो शैतान ही बनता।"

  8. "माँ चुपचाप मार खाती थी, मानो मार खाना ही उसका जन्मसिद्ध अधिकार हो।"

  9. "बड़े भाई के लिए शराब की बोतल और वेश्या का कोठा ही जीवन का परम सत्य था।"

  10. "ब्राह्मण के घर पैदा होकर भी मैंने जनेऊ के धागों में अपना ज़मीर कभी नहीं बाँधा।"

समाज, धर्म और रामलीला का पाखंड
11. "चुनार के पंडे दिन में राम-नाम जपते थे और रात में वेश्याओं के मुजरे में डूब जाते थे।"
12. "रामलीला के पर्दे के पीछे जो 'रावणलीला' होती थी, उसे मैंने अपनी कच्ची उम्र में ही देख लिया था।"
13. "धर्म के ठेकेदारों के असली और घिनौने चेहरों को मैंने उनके करीब रहकर पहचाना है।"
14. "रामलीला के व्यास (निर्देशक) मंच पर राम का चरित्र सिखाते थे, लेकिन स्वयं रावण से भी गिरे हुए थे।"
15. "जो लोग दिन में छुआछूत मानते हैं, रात के अंधेरे में वे ही सबसे बड़े व्यभिचारी होते हैं।"
16. "समाज की जिस सड़ांध पर लोग इत्र छिड़कते हैं, मैंने उसी सड़ांध को उघाड़ने का काम किया है।"
17. "मैं तो समाज का वह नंगा यथार्थ लिख रहा था, जिसे लोग 'अश्लीलता' कहकर खारिज करना चाहते थे।"
18. "गरीबी और विपन्नता व्यक्ति को कितना निष्ठुर बना सकती है, मैं इसका जीता-जागता उदाहरण हूँ।"
19. "समाज के तथाकथित 'सच्चरित्र' लोगों के वस्त्र उतारना ही मेरी लेखनी का मुख्य धर्म रहा है।"
20. "जिस समाज में औरत को केवल भोग्या समझा जाता हो, वहां नैतिकता की बातें बेमानी हैं।"

आकर्षण, यौवन और भटकाव
21. "बारह वर्ष की उम्र में सत्रह वर्ष की युवती के प्रति मेरा आकर्षण वासना नहीं, बल्कि एक विस्मय था।"
22. "चुनार की गलियों में मैंने बचपन नहीं जिया, बल्कि समय से पहले बुढ़ापा देखा है।"
23. "मेरे भीतर एक ऐसा अक्खड़पन था, जो किसी भी नियम और अनुशासन को मानने के लिए तैयार नहीं था।"
24. "मैंने अपने जीवन में कभी किसी आदर्श का लबादा नहीं ओढ़ा, मैं जैसा था, वैसा ही समाज के सामने आ गया।"
25. "सुख और ऐश्वर्य का जीवन कैसा होता है, यह मैं नहीं जानता, मैंने केवल अभाव और अपमान जिया है।"
26. "मेरी 'अपनी खबर' पढ़कर लोगों की रूमानियत टूटती है, क्योंकि इसमें केवल नंगा यथार्थ है।"
27. "मैं उस अनगढ़ पत्थर की तरह हूँ, जिसे किसी मूर्तिकार ने नहीं, बल्कि समय की चोटों ने तराशा है।"
28. "मैंने जीवन को किताबों से नहीं, बल्कि भूख, मार और गालियों से सीखा है।"
29. "मेरे लेखन में जो कड़वाहट है, वह मेरे जीवन के अनुभवों का ही निचोड़ है।"
30. "मैं उन लेखकों में से नहीं हूँ जो अपनी बुराइयों को छिपाकर खुद को देवता साबित करते हैं।"

कलकत्ता प्रवास, पत्रकारिता और 'मतवाला'
31. "कलकत्ता की सड़कों ने मुझे भूखा जरूर रखा, लेकिन मेरे स्वाभिमान को कभी झुकने नहीं दिया।"
32. "कलकत्ता में मैंने जाना कि महानगरीय जीवन की चकाचौंध के पीछे कितना भयानक अँधेरा छिपा है।"
33. "बाबूराव विष्णु पराड़कर जी ने मुझे केवल शब्द गढ़ना नहीं, बल्कि उन शब्दों को जीना सिखाया।"
34. "शांति से यह दुनिया बात नहीं सुनती, इसलिए 'मतवाला' के परिवेश ने मुझे उग्र बना दिया।"
35. "निराला और शिवपूजन सहाय जैसे मित्रों ने मेरे अक्खड़पन को एक साहित्यिक दिशा दी।"
36. "मैं साहित्यकार होने का दंभ नहीं पालता, मैं तो बस समाज का एक क्रूर फोटोग्राफर हूँ।"
37. "मेरी कलम किसी की चाटुकारिता के लिए नहीं, बल्कि समाज के पाखंड को चीरने के लिए बनी है।"
38. "मेरी भाषा में जो देशज और गँवारू शब्द हैं, वे मेरे परिवेश की सबसे सच्ची अभिव्यक्ति हैं।"
39. "मैंने जो कुछ लिखा, अपनी अनुभूतियों की पवित्रता और सच्चाई को बरकरार रखते हुए लिखा।"
40. "जब तक समाज में पाखंड और दोहरापन रहेगा, तब तक मेरी रचनाएँ प्रासंगिक रहेंगी।"

राष्ट्रीय आंदोलन, जेल जीवन और देशभक्ति का यथार्थ
41. "गांधी जी के असहयोग आंदोलन ने मेरे भीतर के विद्रोही को एक राष्ट्रीय मकसद दे दिया।"
42. "मैंने भाषण इसलिए नहीं दिए कि मुझे नेता बनना था, बल्कि इसलिए दिए क्योंकि मेरे सीने में आग जल रही थी।"
43. "राजद्रोह का मुकदमा मेरे लिए कोई सज़ा नहीं, बल्कि मेरे विचारों की जीत का प्रमाण पत्र था।"
44. "जेल की चहारदीवारी के भीतर मैंने उन तथाकथित 'देशभक्तों' को रोते और गिड़गिड़ाते देखा, जो बाहर मंचों पर शेर थे।"
45. "अंग्रेजों की लाठियों और यातनाओं से ज्यादा मुझे अपनों के दोहरे चरित्र ने गहरी चोट पहुँचाई।"
46. "जेल के भीतर के भ्रष्टाचार को देखकर मेरा मोहभंग हो गया कि ये स्वार्थी लोग देश क्या आज़ाद कराएँगे।"
47. "बनारस और गाजीपुर की जेलों ने मुझे सिखाया कि गुलामी केवल अंग्रेजों की नहीं, हमारी अपनी कायरता की भी है।"
48. "जेलर की क्रूरता के सामने मैंने कभी सिर नहीं झुकाया, क्योंकि मेरे पास खोने के लिए कुछ था ही नहीं।"
49. "मैं सत्य को उसके सबसे वीभत्स रूप में स्वीकार करने का साहस रखता हूँ।"
50. "यह 'अपनी खबर' केवल मेरी कहानी नहीं है, यह मेरे युग के उस नंगे सच की कहानी है जिसे सब जानते थे पर कोई बोलता नहीं था।"

1. 'अपनी खबर' किसकी आत्मकथा है?
(A) मुंशी प्रेमचंद
(B) पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र'
(C) सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
(D) बनारसीदास चतुर्वेदी

2. 'अपनी खबर' आत्मकथा का प्रकाशन वर्ष क्या है?
(A) 1950
(B) 1955
(C) 1960
(D) 1965

3. इस आत्मकथा में उग्र जी ने अपने जीवन के आरंभिक कितने वर्षों का वर्णन किया है?
(A) 18 वर्ष
(B) 21 वर्ष
(C) 25 वर्ष
(D) 30 वर्ष

4. 'अपनी खबर' कुल कितने अध्यायों में विभक्त है?
(A) 10
(B) 12
(C) 15
(D) 21

5. उग्र जी का जन्म उत्तर प्रदेश के किस गाँव/कस्बे में हुआ था?
(A) लमही, बनारस
(B) अगौना, बस्ती
(C) चुनार, मिर्जापुर
(D) मेदनीपुर, बलिया

6. आत्मकथा के अनुसार, जन्मते ही मृत्यु के भय से उग्र जी को कितने में बेच दिया गया था?
(A) एक टके में
(B) एक रुपये में
(C) पाँच पैसे में
(D) मुफ्त में

7. एक टके में बेच दिए जाने के कारण उनका क्या नाम पड़ा?
(A) बिकाऊ
(B) टका
(C) बेचन
(D) उग्र

8. उग्र जी के पिता का क्या नाम था जो पक्के रामलीला प्रेमी थे?
(A) रामनाथ पांडेय
(B) बैजनाथ पांडेय
(C) दीनानाथ पांडेय
(D) केदारनाथ पांडेय

9. आत्मकथा में उग्र जी ने तत्कालीन ब्राह्मण समाज की किस प्रथा को 'कमीना धंधा' कहा है?
(A) कर्मकांड
(B) भिक्षाटन
(C) जजमानी प्रथा
(D) सूतक प्रथा

10. "मैं जन्मना ब्राह्मण हूँ, किंतु कर्मणा शूद्र।" यह कथन किसका है?
(A) पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र'
(B) महात्मा गांधी
(C) डॉ. बी.आर. अंबेडकर
(D) मुंशी प्रेमचंद

11. बचपन में उग्र जी रामलीला में मुख्य रूप से किस पात्र का अभिनय करते थे?
(A) राम
(B) लक्ष्मण
(C) हनुमान
(D) सीता

12. रामलीला मंडली के निर्देशकों को आत्मकथा में क्या कहकर संबोधित किया गया है?
(A) महन्त
(B) व्यास
(C) गुरु
(D) सूत्रधार

13. उग्र जी ने रामलीला के पर्दे के पीछे पनप रहे किस यथार्थ का पर्दाफाश किया है?
(A) देशभक्ति
(B) धार्मिक पाखंड और बाल-शोषण
(C) कला का सम्मान
(D) आर्थिक विपन्नता

14. आत्मकथा में उग्र जी के बड़े भाइयों को किस चीज़ की बुरी लत दर्शाई गई है?
(A) जुआ
(B) अफीम
(C) शराब और वेश्यागमन
(D) चोरी

15. घर में हो रहे दुर्व्यसनों और कलह को देखकर उग्र जी के मन में किसके प्रति वितृष्णा पैदा हुई?
(A) ब्राह्मणत्व और पारिवारिक आदर्शों के प्रति
(B) साहित्य के प्रति
(C) देश के प्रति
(D) रामलीला के प्रति

16. मात्र 12 वर्ष की आयु में उग्र जी का तीव्र आकर्षण कितनी आयु की युवती के प्रति हुआ था?
(A) 14 वर्ष
(B) 17 वर्ष
(C) 20 वर्ष
(D) 25 वर्ष

17. रोजगार की तलाश में उग्र जी बनारस से कहाँ गए थे?
(A) दिल्ली
(B) मुंबई
(C) कलकत्ता
(D) लखनऊ

18. कलकत्ता में उग्र जी को आरंभिक आश्रय किसने प्रदान किया था?
(A) पं. झाबरमल्ल शर्मा
(B) महावीर प्रसाद द्विवेदी
(C) माधवराव सप्रे
(D) शिवपूजन सहाय

19. उग्र जी ने पत्रकारिता के गुर किस प्रसिद्ध संपादक से सीखे?
(A) गणेश शंकर विद्यार्थी
(B) बाबूराव विष्णु पराड़कर
(C) भारतेंदु हरिश्चंद्र
(D) बालकृष्ण भट्ट

20. बाबूराव विष्णु पराड़कर कलकत्ता से प्रकाशित किस समाचार पत्र से जुड़े थे?
(A) मतवाला
(B) स्वदेश
(C) आज
(D) प्रताप

21. पांडेय बेचन शर्मा कलकत्ता में किस प्रसिद्ध साहित्यिक मंडल से जुड़े?
(A) सरस्वती मंडल
(B) मतवाला मंडल
(C) आनंद कादंबिनी मंडल
(D) विशाल भारत मंडल

22. 'मतवाला' पत्रिका के संचालक कौन थे?
(A) महादेव प्रसाद सेठ
(B) निराला
(C) शिवपूजन सहाय
(D) नवजादिक लाल श्रीवास्तव

23. पांडेय बेचन शर्मा को 'उग्र' उपनाम किस पत्रिका के परिवेश में मिला?
(A) आज
(B) मतवाला
(C) जागरण
(D) हंस

24. 'मतवाला' मंडल में उग्र जी के प्रमुख सहयोगी और अभिन्न मित्र कौन थे?
(A) मुंशी प्रेमचंद
(B) जयशंकर प्रसाद
(C) सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
(D) सुमित्रानंदन पंत

25. "अनगढ़ पत्थरों में ही प्रतिमा बनने की संभावना सुरक्षित रहती है।" यह विचार 'अपनी खबर' में किसने व्यक्त किया है?
(A) पिता बैजनाथ ने
(B) निराला ने
(C) उग्र जी ने
(D) व्यास ने

26. आत्मकथा के अंतिम भाग में उग्र जी किस राष्ट्रीय आंदोलन में कूद पड़ते हैं?
(A) स्वदेशी आंदोलन (1905)
(B) असहयोग आंदोलन (1921)
(C) सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930)
(D) भारत छोड़ो आंदोलन (1942)

27. 21 वर्ष की आयु में उग्र जी को ब्रिटिश सरकार ने किस आरोप में गिरफ्तार किया था?
(A) चोरी
(B) हत्या का प्रयास
(C) राजद्रोह और भड़काऊ भाषण
(D) कर न चुकाना

28. गिरफ्तारी के बाद उग्र जी को किन जेलों की यातनाएँ सहनी पड़ीं?
(A) बनारस और गाजीपुर जेल
(B) नैनी और यरवदा जेल
(C) तिहाड़ जेल
(D) सेल्युलर जेल (अंडमान)

29. जेल में उग्र जी ने किन लोगों के 'दोहरे चरित्र' और कायरता का नग्न चित्रण किया है?
(A) अंग्रेजों का
(B) तथाकथित नेताओं और देशभक्तों का
(C) पुलिसकर्मियों का
(D) आम कैदियों का

30. 'अपनी खबर' में उग्र जी की माँ का चित्रण किस रूप में हुआ है?
(A) विद्रोही स्त्री
(B) अत्यंत सहनशील और दुखियारी स्त्री
(C) शिक्षित महिला
(D) क्रूर माता

31. हिंदी साहित्य में अपनी बेबाक और कड़वी सच्चाई बयां करने के कारण उग्र जी को क्या कहा जाता है?
(A) हिंदी का शेक्सपियर
(B) हिंदी का मंटो
(C) हिंदी का शरतचंद्र
(D) हिंदी का बायरन

32. 'अपनी खबर' का अंत उग्र जी के जीवन की किस घटना के साथ होता है?
(A) विवाह
(B) कलकत्ता वापसी
(C) 21 वर्ष की आयु में जेल यात्रा
(D) 'मतवाला' का संपादन छोड़ना

33. उग्र जी के साहित्य को बनारसीदास चतुर्वेदी ने क्या नाम देकर उसकी आलोचना की थी?
(A) विद्रोही साहित्य
(B) घासलेटी साहित्य
(C) नग्न साहित्य
(D) अश्लील साहित्य

34. उग्र जी की भाषा-शैली में किन शब्दों का सर्वाधिक प्रयोग मिलता है?
(A) केवल तत्सम
(B) केवल उर्दू-फारसी
(C) देशज और तत्सम का अक्खड़ मिश्रण
(D) केवल अवधी

35. आत्मकथा में उग्र जी ने ब्राह्मणत्व के किस प्रतीक चिह्न में अपना ज़मीर न बाँधने की बात कही है?
(A) चंदन
(B) शिखा (चोटी)
(C) जनेऊ
(D) धोती

36. उग्र जी ने अपनी आत्मकथा को क्या कहा है?
(A) पुण्यात्मा की रामकहानी
(B) पापी का कच्चा चिट्ठा
(C) स्वर्ग की सैर
(D) आदर्श जीवन का दर्पण

37. आत्मकथा में उग्र जी ने समाज के किस वर्ग के खोखलेपन पर सबसे तीखा प्रहार किया है?
(A) निम्न वर्ग
(B) किसान वर्ग
(C) मध्यवर्गीय भद्रलोक और रईस
(D) मजदूर वर्ग

38. 'अपनी खबर' किस दृष्टि से हिंदी की अन्य आत्मकथाओं से सर्वथा भिन्न है?
(A) इसमें बहुत अधिक कल्पना है
(B) इसमें अपनी कमियों और बुराइयों की निर्मम साफगोई है
(C) यह पद्य (कविता) में लिखी गई है
(D) यह डायरी शैली में है

39. उग्र जी किस युग के प्रमुख गद्यकार माने जाते हैं?
(A) भारतेंदु युग
(B) द्विवेदी युग
(C) प्रेमचंद युग
(D) शुक्लोत्तर युग

40. आत्मकथा के अनुसार, समाज में व्याप्त किस सड़ांध को उघाड़ना उग्र जी का लक्ष्य था?
(A) अशिक्षा
(B) अंधविश्वास
(C) नैतिकता के नाम पर छिपा व्यभिचार
(D) विदेशी शासन

41. उग्र जी ने अपने अक्खड़पन और विद्रोही स्वभाव का श्रेय किसे दिया है?
(A) अपने गुरुओं को
(B) जीवन के कटु अनुभवों और भूख को
(C) कलकत्ता के माहौल को
(D) जेल जीवन को

42. चुनार के पंडों और रईसों के चरित्र के बारे में उग्र जी का क्या मत था?
(A) वे अत्यंत धर्मपरायण थे
(B) वे दिन में भक्त और रात में व्यभिचारी थे
(C) वे समाज सुधारक थे
(D) वे गरीबों के मसीहा थे

43. जेलर की क्रूरता के सामने उग्र जी ने सिर क्यों नहीं झुकाया?
(A) क्योंकि वे बहुत बलवान थे
(B) क्योंकि उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं था
(C) क्योंकि उन्हें अन्य कैदियों का समर्थन था
(D) क्योंकि उन्हें कानून का ज्ञान था

44. कलकत्ता की सड़कों ने उग्र जी को भूखा तो रखा लेकिन किसे झुकने नहीं दिया?
(A) उनके स्वाभिमान को
(B) उनके शरीर को
(C) उनके क्रोध को
(D) उनकी कलम को

45. आत्मकथा में उग्र जी ने किस भावना को अपनी लेखनी का मूल धर्म बताया है?
(A) राजाओं की स्तुति
(B) तथाकथित 'सच्चरित्र' लोगों के वस्त्र उतारना (यथार्थ दिखाना)
(C) प्रेम का आदर्श चित्रण
(D) प्रकृति का मानवीकरण

46. उग्र जी के अनुसार, शांति से यह दुनिया बात नहीं सुनती, इसलिए 'मतवाला' के परिवेश ने उन्हें क्या बना दिया?
(A) शांत
(B) दार्शनिक
(C) उग्र
(D) संन्यासी

47. 'अपनी खबर' को पढ़कर समाज की क्या टूटती है?
(A) अज्ञानता
(B) रूमानियत (आदर्शवादी कल्पना)
(C) परंपरा
(D) आर्थिक विषमता

48. 'मतवाला' के संपादक मंडल में उग्र जी को वैचारिक रूप से परिष्कृत करने में किसने मदद की?
(A) आचार्य रामचंद्र शुक्ल
(B) आचार्य शिवपूजन सहाय
(C) नंददुलारे वाजपेयी
(D) हजारी प्रसाद द्विवेदी

49. पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र' का यथार्थवाद किस कोटि का माना जाता है?
(A) आदर्शोन्मुखी यथार्थवाद
(B) प्रकृतिवादी और नग्न यथार्थवाद
(C) समाजवादी यथार्थवाद
(D) जादुई यथार्थवाद

50. पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र' का देहावसान (निधन) किस वर्ष हुआ?
(A) 1960
(B) 1965
(C) 1967
(D) 1970

उत्तर माला (Answer Key):

  1. (B) पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र'

  2. (C) 1960

  3. (B) 21 वर्ष

  4. (C) 15

  5. (C) चुनार, मिर्जापुर

  6. (A) एक टके में

  7. (C) बेचन

  8. (B) बैजनाथ पांडेय

  9. (C) जजमानी प्रथा

  10. (A) पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र'

  11. (D) सीता

  12. (B) व्यास

  13. (B) धार्मिक पाखंड और बाल-शोषण

  14. (C) शराब और वेश्यागमन

  15. (A) ब्राह्मणत्व और पारिवारिक आदर्शों के प्रति

  16. (B) 17 वर्ष

  17. (C) कलकत्ता

  18. (A) पं. झाबरमल्ल शर्मा

  19. (B) बाबूराव विष्णु पराड़कर

  20. (C) आज

  21. (B) मतवाला मंडल

  22. (A) महादेव प्रसाद सेठ

  23. (B) मतवाला

  24. (C) सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

  25. (C) उग्र जी ने

  26. (B) असहयोग आंदोलन (1921)

  27. (C) राजद्रोह और भड़काऊ भाषण

  28. (A) बनारस और गाजीपुर जेल

  29. (B) तथाकथित नेताओं और देशभक्तों का

  30. (B) अत्यंत सहनशील और दुखियारी स्त्री

  31. (B) हिंदी का मंटो

  32. (C) 21 वर्ष की आयु में जेल यात्रा

  33. (B) घासलेटी साहित्य

  34. (C) देशज और तत्सम का अक्खड़ मिश्रण

  35. (C) जनेऊ

  36. (B) पापी का कच्चा चिट्ठा

  37. (C) मध्यवर्गीय भद्रलोक और रईस

  38. (B) इसमें अपनी कमियों और बुराइयों की निर्मम साफगोई है

  39. (C) प्रेमचंद युग

  40. (C) नैतिकता के नाम पर छिपा व्यभिचार

  41. (B) जीवन के कटु अनुभवों और भूख को

  42. (B) वे दिन में भक्त और रात में व्यभिचारी थे

  43. (B) क्योंकि उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं था

  44. (A) उनके स्वाभिमान को

  45. (B) तथाकथित 'सच्चरित्र' लोगों के वस्त्र उतारना (यथार्थ दिखाना)

  46. (C) उग्र

  47. (B) रूमानियत (आदर्शवादी कल्पना)

  48. (B) आचार्य शिवपूजन सहाय

  49. (B) प्रकृतिवादी और नग्न यथार्थवाद

  50. (C) 1967
 

'अपनी खबर' आत्मकथा - पांडेय बेचन शर्मा उग्र 50 MCQ व संपूर्ण समीक्षा,

  पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र' (1900–1967) हिंदी साहित्य में प्रेमचंद युगीन यथार्थवादी और प्रकृतिवादी (Naturalist) धारा के सबसे प्रमुख...