सिंघलदीप खंड

सिंघलदीप  खंड 

राजै कहा दरस जौ पावौं । परबत काह, गगन कहँ धाावौं॥
जेहि परबत पर दरसन लहना । सिर सौं चढ़ौं, पाँव का कहना॥
मोहूँ भावै ऊँचै ठाऊँ । ऊँचै लेउँ पिरीतम नाऊँ॥
पुरुषहि चाहिय ऊँच हियाऊ । दिन दिन ऊँचे राखै पाऊ॥
सदा ऊँच पै सेइय बारा । ऊँचै सौं कीजिय बेवहारा॥
ऊँचे चढ़ै, ऊँच खंड सूझा । ऊँचै पास ऊँच मति बूझा॥
ऊँचे सँग संगति नित कीजै । ऊँचे काज जीउ पुनि दीजै॥

दिन दिन ऊँच होइ सो, झेहि ऊँचे पर चाउ।

ऊँचे चढ़त जो सखि परै, ऊँच न छाड़िय काउ॥5॥


सन्दर्भ -प्रस्तुत पंक्तियाँ पद्मावत के सिंघल द्वीप खंड से लिया गया है। इसके रचनाकार मालिक मोहम्मद जायसी  है। इसका रचनाकाल 1540 ई है। 

प्रसंग -इसमें कवि ने तोते द्वारा रत्नसेन को सिंघल द्वीप की राजकुमारी की सुंदरता का वर्णन किया है। हिरामन तोता रत्नसेन को  पद्मावती से मिलने के बारे में बताता है। 

व्याख्या -पद्मावती सिंघल द्वीप की राजकुमारी है। राजा रत्नसेन उस पर मोहित हो गया है। हिरामन ने उसके बारे में ऐसा वर्णन किया की वह अपना राज्य छोड़ कर उसके लिए यहाँ पर आ गया। हिरामन राजा से कहता है। की अगर आपको उसका दरसन करना है तो पर्वत पर जाना होगा। वह उच्चाई से आप दर्शन कर सकोगे। पुरुष को उच्च होना चाहिए।  व्यक्ति को अच्छा व्यव्हार भी करना चाहिए। उच्चा  संगती करनी चाहिए। उच्चे विचार रखने चाहिए। 
जो हमेशा दिन प्रतिदिन उच्चा होता है। अथार्थ अपने को उस योग्य बनाता है। वही अपने कार्यों में सदा सफल होता है। अगर उच्चै चढ़ने में गिर भी जाते है तो हमे फिर से पर्यटन करना चाहिए। उस से भागना नहीं चाहिए

काव्यगत विशेषता -
  •  नायक का नायिका के प्रति पूर्वानुराग 
  • अवधी भाषा  का प्रयोग 
  • दोहा -चौपाई   शैली का प्रयोग 
  • नीति की बातो का प्रयोग 
रजनीकांत सिंह 

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