नाखून क्यों बढ़ते हैं


                                       नाखून क्यों बढ़ते हैं

 विधा - निबंध

रचनाकार- हजारी प्रसाद द्विवेदी

  निबंध संग्रह कल्पलता से निबंध लिया गया है। 

 निबंध की मुख्य पंक्तियाँ 

 नाखून क्यों बढ़ते हैं निबंध में हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने मनुष्य के हिंसात्मक प्रवृत्ति के बढ़ने तथा प्रेम संबंधों के कटु होने का वर्णन व्यंग्यात्मक तथा ललित ढंग से किया है निबंध के शुरुआत में ही द्विवेदी जी ने रचनात्मक ढंग से इस निबंध की शुरुआत करते हैं कि बच्चे के पूछने पर के नाखून क्यों बढ़ते हैं एक पुत्र द्वारा पूछे जाने पर पिता इसका उत्तर देने में लोग असमर्थ दिखाई देता है। प्राचीन काल में नाखून रखने का महत्व भी वे दिखाते हैं कि पहले मनुष्य जानवर था उसे अपनी रक्षा के लिए अपने नाखूनों का इस्तेमाल करना होता था मगर आज वह अपने बाहरी नाखूनों को तो काट लेता है लेकिन जो उसके अंदर हिंसात्मक प्रवृत्ति है उसे नहीं मिटाता नाखूनों का स्थान अब हथियारों  ने ले लिया है।  हथियार दिन- प्रतिदिन बढ़ते ही जा रहे हैं यह मनुष्य को पशुता की ओर ही अग्रेषित करना है। 

इंडिपेंडेंस का अर्थ है अनधीनता या किसी अधीनता का अभाव स्वाधीनता शब्द का अर्थ है अपने अधीन रहना। 

  सोचना तो क्या उसे इतना भी पता नहीं चलता कि उसके भीतर नख  बढ़ा लेने की जो सहजात प्रवृत्ति है, वह उसके पशुत्व का प्रमाण है उन्हें काटने की जो प्रवृत्ति है, वह उसकी मनुष्यता की निशानी है और यद्यपि पशुत्व  के चिन्ह उसके भीतर रह गए हैं, पर वह पशुत्व को छोड़ चुका है पशु बनकर आगे नहीं बढ़ सकता। उसे कोई रास्ता खोजना चाहिए अस्त्र बढ़ाने की प्रवृत्ति मनुष्यता की विरोधिनी है

  मैं ऐसा तो नहीं मानता कि जो कुछ हमारा पुराना है, जो कुछ हमारा विशेष है, उससे हम चिपटे ही रहे।  पुराने का मोह सब समय वांछनीय ही नहीं होता। मरे बच्चे को गोद में दबाए रहने वाली बंदरिया मनुष्य का आदर्श नहीं बन सकती परंतु ऐसा भी नहीं सोचा जा सकता कि हम नई अनुसन्धित्सा के नशे में चूर होकर अपना  सर्वस्व खो  दें। 

  कालिदास ने कहा था कि सब पुराने अच्छे नहीं होते, सब नए खराब नहीं होते।भले लोग दोनों की जांच कर लेते हैं ,जो हितकर होता है, उसे ग्रहण करते हैं और मूढ़ लोग दूसरों के इशारे पर भटकते रहते हैं। सो हमें परीक्षा करके हितकर वस्तु निकल आए, तो इससे बढ़कर और क्या हो सकता है। 

  मनुष्य पशु से किस बात में भिन्न है ,आहार- निद्रा आदि पशु- सुलभ स्वभाव उससे ठीक वैसे ही है, जैसे अन्य प्राणियों के लेकिन वह फिर भी पशु से भिन्न है उसमें संयम है, दूसरे के सुख-दुख के प्रति संवेदना है श्रद्धा है तब है त्याग है।  यह मनुष्य के स्वयं के उद्बभावित बंधन है। इसलिए मनुष्य झगड़े टंटे को अपना आदर्श नहीं मानता, गुस्से में आकर चढ़ दौड़ने वाली अविवेकी को बुरा समझता है और वचन , मन और शरीर से किए गए असत्याचरण को गलत आचरण मानता है। 

 बृहत्तर जीवन में अस्त्र -शस्त्रों का बढ़ने देना मनुष्य की पशुता की निशानी है और उसे नहीं बढ़ने देना मनुष्यत्व का तकाजा है।  मनुष्य में जो घृणा  है, वह अनायास बिना सिखाया जाती है वह सतपुरा  अशोक तंवर का घोतक है और अपने को संयत रखना दूसरे के मनोभाव का आदर करना मनुष्य का स्वधर्म है

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