अकाल और उसके बाद' नागार्जुन

 नागार्जुन जी की कविताएँ अपनी सादगी और गहराई के लिए जानी जाती हैं। उनकी एक  अत्यंत प्रभावशाली और छोटी कविता है 'अकाल और उसके बाद'

यह कविता केवल 8 पंक्तियों की है, लेकिन इसमें अकाल (भूख) की विभीषिका और फिर घर में अनाज आने की खुशी को जिस तरह चित्रित किया गया है, वह बेजोड़ है।


अकाल और उसके बाद

नागार्जुन

कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास

कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास

कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त

कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त

दाने आए घर के भीतर कई दिनों के बाद

धुआँ उठा आँगन के ऊपर कई दिनों के बाद

चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद

कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद


इस कविता की खास बातें:

  1. सजीव चित्रण: पहले चार पंक्तियों में 'चूल्हा रोना' और 'चक्की का उदास होना' भूखे घर की शांति को दर्शाते हैं। यहाँ तक कि चूहे और छिपकलियाँ भी भूख से बेहाल हैं।

  2. उम्मीद की किरण: बाद की चार पंक्तियाँ उत्सव जैसी हैं। घर में अनाज (दाने) आने पर न केवल इंसान, बल्कि जीव-जंतु (कौआ) भी प्रसन्न हैं।

  3. यथार्थवाद: नागार्जुन ने यहाँ किसी बड़े उपदेश के बजाय सीधे पेट की आग और उससे जुड़ी संवेदना को पकड़ा है।

 

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