'गुलाबी चूड़ियाँ' कविता नागार्जुन UPHESC

नागार्जुन जी की यह प्रसिद्ध कविता 'गुलाबी चूड़ियाँ' । यह कविता एक साधारण बस ड्राइवर की पितृसुलभ भावनाओं का बहुत ही कोमल चित्रण है।


गुलाबी चूड़ियाँ

नागार्जुन

सर्वत्र फैली थी हरियाली

पर, उस हरियाली के बीच-बीच में

दिख रही थी कहीं-कहीं सूखी धरती भी।

अपनी-अपनी जगहें सँवारने लगे थे वे भी...

झुककर मैंने देखा तो

सामने वाले शीशे में

साफ झलक रही थी भीतर की हर चीज़!

वहाँ टँगी थी—

काँच की चार गुलाबी चूड़ियाँ

किसी नन्हीं कलाई की याद दिलातीं!

बस-ड्राइवर ने

बड़े चाव से टाँग रखी थीं वे

स्टेयरिंग के ठीक ऊपर...

वे गुलाबी चूड़ियाँ—

उछलती-कूदती सड़कों पर

खटर-पटर करती बस के भीतर

हर पल याद दिलाती थीं उसे

अपनी उस नन्हीं-सी बिटिया की

जो अभी स्कूल जाने लायक भी नहीं हुई थी!

बीच-बीच में—

जब कभी बस रुकती

और सवारी उतरती या चढ़ती

बस-ड्राइवर अपनी उन उंगलियों से

सहला लेता था उन गुलाबी चूड़ियों को

जैसे वह सहला रहा हो

अपनी उस नन्हीं बिटिया के कोमल गालों को!


विशेषताएँ

  • सरलता: नागार्जुन (जिन्हें 'जनकवि' कहा जाता है) ने बहुत ही साधारण बिंब (चूड़ियों) के जरिए पिता-पुत्री के प्रेम को दर्शाया है।

  • मानवीय पक्ष: एक ड्राइवर जो दिन भर धूल, धुएँ और शोर में रहता है, उसके भीतर भी एक कोमल हृदय धड़कता है।

  • प्रतीक: 'गुलाबी रंग' यहाँ मासूमियत और प्यार का प्रतीक है।

 

कविता का सार

यह कविता मानवीय संवेदनाओं का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इसमें कवि ने एक कठोर दिखने वाले बस ड्राइवर के भीतर छिपे कोमल पिता को उभारा है:

  • पिता का प्रेम: बस के रूखे-सूखे माहौल और भागदौड़ भरी जिंदगी के बीच, वे चार गुलाबी चूड़ियाँ ड्राइवर की अपनी बेटी के प्रति अगाध प्रेम का प्रतीक हैं।

  • याद और संबल: ड्राइवर ने उन चूड़ियों को अपनी नज़रों के सामने (स्टेयरिंग के पास) इसलिए रखा है ताकि काम के तनाव के बीच अपनी बेटी का चेहरा याद करके उसे खुशी मिल सके।

  • सादगी: नागार्जुन जी ने बहुत ही सरल शब्दों में यह बताया है कि एक गरीब या साधारण काम करने वाले व्यक्ति के लिए उसकी संतान की छोटी-सी निशानी भी कितनी अनमोल होती है।

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