'पत्नी' हिंदी के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक कथाकार जैनेंद्र कुमार की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और बहुचर्चित कहानी है। यह कहानी भारतीय समाज में पति-पत्नी के संबंधों, विशेषकर एक पारंपरिक मध्यवर्गीय नारी के अंतर्द्वंद्व, उसकी मूक पीड़ा और पति के प्रति उसके असीम समर्पण का अत्यंत सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करती है।
पात्र परिचय
| पात्र का नाम | भूमिका और स्वभाव |
| सुनंदा | कहानी की मुख्य पात्रा (पत्नी)। वह एक पारंपरिक, पतिव्रता और सहिष्णु भारतीय नारी है। पति की उपेक्षा और उसकी राजनीतिक व्यस्तताओं के कारण वह भीतर ही भीतर घुटती है, लेकिन अपना कर्तव्य नहीं भूलती। उसकी पूरी दुनिया उसके पति तक ही सीमित है। |
| कालीचरण | सुनंदा का पति। वह स्वदेशी आंदोलन और राजनीति से जुड़ा एक आदर्शवादी व्यक्ति है। वह अपने मित्रों और देश-समाज की चर्चाओं में इतना मग्न रहता है कि उसे अपनी पत्नी की तकलीफों, भूख और उसकी भावनात्मक ज़रूरतों का कोई अहसास नहीं है। |
| कालीचरण के मित्र | गौण पात्र। ये वे लोग हैं जो कालीचरण के साथ बैठक करते हैं, राजनीतिक बहसें करते हैं और जिनके कारण सुनंदा को रात-रात भर जागकर इंतज़ार करना पड़ता है। |
कहानी का मूल कथ्य और सारांश
- प्रतीक्षा और उपेक्षा: कहानी की शुरुआत सुनंदा की प्रतीक्षा से होती है। जाड़े की रात है, रात के ग्यारह बज चुके हैं और अंगीठी बुझने वाली है। सुनंदा भूखी-प्यासी अपने पति कालीचरण का इंतज़ार कर रही है कि वह आए तो उसे खाना परोसे।
- पति की उदासीनता: कालीचरण घर में अपने राजनीतिक मित्रों के साथ लंबी बहसों में उलझा है। उसे इस बात की बिल्कुल चिंता नहीं है कि अंदर उसकी पत्नी भूखी बैठी है। वह बाहर से ही आदेश देता है और मित्रों के साथ चाय-नाश्ते में व्यस्त रहता है।
- सुनंदा का मानसिक अंतर्द्वंद्व: इंतज़ार करते हुए सुनंदा के मन में कई विचार आते हैं। उसे पति की इस उदासीनता पर क्रोध भी आता है और वह सोचती है कि वह जाकर कह दे कि वह सोने जा रही है। उसे लगता है कि इन राजनीतिक बहसों का क्या फायदा जब घर की स्त्री ही दुखी हो। वह विद्रोह करने की सोचती है।
- समर्पण और मूक वेदना: जब देर रात मित्र चले जाते हैं, तो कालीचरण अंदर आता है। वह सुनंदा की तकलीफ को समझे बिना, बिना कुछ खाये-पीये थकावट के कारण सो जाता है। सुनंदा का सारा क्रोध, सारी शिकायतें अपने पति को देखते ही पिघल जाती हैं। वह उसे जगाकर खाना खिलाने की हिम्मत नहीं जुटा पाती और अपनी भूख मारकर स्वयं भी चुपचाप जाकर सो जाती है।
साहित्यिक मूल्यांकन
- विमर्श: यह कहानी राष्ट्रीय आंदोलन के दौर में घर की चारदीवारी में कैद स्त्री की त्रासदी और उसकी उपेक्षा को रेखांकित करती है। जैनेंद्र ने सवाल उठाया है कि जो पुरुष अपने घर की स्त्री को न्याय और सम्मान नहीं दे सकता, वह देश को क्या न्याय दिलाएगा?
- शैली: कहानी पूरी तरह से मनोवैज्ञानिक यथार्थवाद पर आधारित है। इसमें बाहरी घटनाओं से ज़्यादा सुनंदा के मन के भीतर चल रहे तूफ़ान (चेतना-प्रवाह) को दर्शाया गया है।
- स्त्री-विमर्श: सुनंदा भारतीय नारी के उस रूप का प्रतीक है जो 'स्व' (अपना वजूद) मिटाकर केवल पति के सुख में अपना सुख खोजती है।
- प्रतीक्षा और उपेक्षा का चित्रण:"रात के ग्यारह बज चुके थे। जाड़े की रात थी... अंगीठी में कोयले राख हो चले थे, पर उनका (कालीचरण का) कहीं पता न था।"(संदर्भ): यह पंक्ति कहानी की शुरुआत में ही सुनंदा की अंतहीन प्रतीक्षा, अकेलेपन और पति द्वारा की जा रही घोर उपेक्षा को स्थापित कर देती है।
- खोखले आदर्शवाद पर गहरा व्यंग्य:"बाहर देश के उद्धार की चिंता में बड़ी-बड़ी बहसें हो रही थीं, और भीतर एक स्त्री भूख और ठंड से सिकुड़ रही थी।"(संदर्भ): यह भाव कालीचरण के उस दोहरे और पुरुषवादी चरित्र को उजागर करता है, जहाँ वह दुनिया को आज़ाद कराने की बात तो करता है, लेकिन अपनी ही पत्नी की बुनियादी ज़रूरतों और भावनाओं के प्रति पूरी तरह अंधा है।
- सुनंदा का क्षणिक विद्रोह और अंतर्द्वंद्व:"जी में आया कि जाकर कह दे— मैं अब सोती हूँ, अपना खाना खुद निकाल लेना।"(संदर्भ): ठंड और भूख से परेशान सुनंदा के मन में एक पल के लिए विद्रोह जागता है। यह पंक्ति एक पारंपरिक मध्यवर्गीय स्त्री के मानसिक द्वंद्व को दर्शाती है, जो अन्याय महसूस तो करती है पर संस्कारों के कारण बोल नहीं पाती।
- समर्पण और क्रोध का पिघलना:"जब वे भीतर आए, तो उनका चेहरा थका हुआ था... उन्हें देखते ही सुनंदा का दिन भर का सारा क्रोध, सारा क्षोभ जैसे पानी हो गया।"(संदर्भ): यह भारतीय पत्नी के उस गहरे मनोवैज्ञानिक समर्पण को दर्शाता है, जहाँ पति की थोड़ी सी थकान देखकर उसकी अपनी सारी पीड़ा और शिकायतें गौण हो जाती हैं।
- कहानी का मूक और त्रासद अंत:"उसने उन्हें जगाना ठीक न समझा। अपनी भूख मारकर वह भी चुपचाप उनके पास लेट गई।"(संदर्भ): यह कहानी का चरमोत्कर्ष है। बिना कोई शिकायत किए, भूखे पेट सो जाना यह साबित करता है कि सुनंदा ने अपना 'स्व' (अपना अस्तित्व) पूरी तरह से मिटा दिया है। यही इस कहानी की सबसे बड़ी मनोवैज्ञानिक त्रासदी है।
- C) जैनेंद्र कुमार
- B) मनोवैज्ञानिक कथाधारा
- C) सुनंदा
- B) कालीचरण
- C) ग्यारह
- B) अपने पति कालीचरण का
- C) मित्रों के साथ देश और समाज के मुद्दों पर बहस कर रहा है
- B) राष्ट्रीय स्वाधीनता / स्वदेशी आंदोलन
- C) स्वदेशी आंदोलन और क्रांति पर
- B) वह एक पारंपरिक, सहिष्णु और मूक समर्पण वाली भारतीय नारी है
- B) अपनी पत्नी (सुनंदा) की बुनियादी आवश्यकताओं के प्रति
- C) वह भूखी-प्यासी है और ठंड से ठिठुर रही है
- B) क्योंकि वह पति को खाना खिलाए बिना नहीं सो सकती
- B) अंगीठी (बोरसी) का
- B) कि वह बाहर जाकर कह दे कि मैं सोने जा रही हूँ, तुम अपना इंतज़ाम खुद कर लो
- A) कालीचरण
- B) लगभग नगण्य (उनके बीच भयानक संवादहीनता है)
- A) वह बहुत थका हुआ और चूर होता है
- C) वह बिना खाए-पीए, थकावट के कारण सो जाता है
- B) उसका सारा क्रोध पिघल जाता है और वह वात्सल्य भाव से उसे देखती रह जाती है
- B) नहीं, वह भी भूखी ही सो जाती है
- C) नहीं, वह अपनी सारी पीड़ा मन में ही दबा लेती है
- A) खोखले पुरुषवादी आदर्शवाद पर
- A) सुनंदा की उम्मीदों और उसकी जीवन-ऊर्जा के बुझने का
- B) मूक और मनोवैज्ञानिक त्रासदी (Tragic) के साथ
- C) स्त्री विमर्श
- B) आनंदीलाल
- A) 'स्व' को मिटाकर पतिव्रत धर्म निभाने वाली पारंपरिक स्त्री
- B) सिगमंड फ्रायड
- C) चेतना-प्रवाह (Stream of Consciousness) और अंतर्द्वंद्व शैली