मनुष्य हूँ - नागार्जुन (कविता )
नहीं कभी क्या मैं थकता हूँ ?
अहोरात्र क्या नील गगन में उड़ सकता हूँ ?
मेरे चित्तकबरे पंखो की भास्वर छाया
क्या न कभी स्तम्भित होती है
हरे धान की स्निग्ध छटा पर ?
-उड़द मूँग की निविड़ जटा पर ?
आखिर मैं तो मनुष्य हूँ-----
उरूरहित सारथि है जिसका
एक मात्र पहिया है जिसमें
सात सात घोड़ो का वह रथ नहीं चाहिए
मुझको नियत दिशा का वह पथ नहीं चाहिए
पृथ्वी ही मेरी माता है
इसे देखकर हरित भारत , मन कैसा प्रमुदित हो जाता है ?
सब है इस पर ,
जीव -जंतु नाना प्रकार के
तृण -तरु लता गुल्म भी बहुविधि
चंद्र सूर्य हैं
ग्रहगण भी हैं
शत -सहस्र संख्या में बिखरे तारे भी हैं
सब है इस पर ,
कालकूट भी यही पड़ा है
अमृतकलश भी यहीं रखा पड़ा है
नीली ग्रीवावाले उस मृत्यंजय का भी बाप यहीं हैं
अमृत -प्राप्ति के हेतु देवगण
नहीं दुबारा
अब ठग सकते
दानव कुल को
कविता का मूल विषय
मनुष्य हूँ कविता की मूल विषय एक कवि द्वारा समाज की स्थितियों का चित्रण है। इस कविता में कवि ने सर्वप्रथम अपने को मानव रूप में प्रस्तुत किया है। मानव होने के कारन उसकी कल्पना भी कुंठित होती है। वह सर्जनात्मक से भी चुकता है। कवि होने के कारन शेष सृष्टि के साथ वह आत्मीय सम्बन्ध का भी अनुभव करता है। वह जीवन के दुःख प्रक्रिया के रूप में ग्रहण किया है। कवि भी मनुष्य होता है। इसलिए वो भी भौतिक इच्छाओ की चाह करता है। जैसे अन्य मनुष्य मनुष्य। वह अपने भौतिक जरूरतों के लिए संघर्षरत है और संघर्ष से कविता को रूपाकार करता है। वह लोकिकता के माध्यम से वह लोकोत्तर को पाने का प्रयास करता है।
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Thanku aapne jo question post kiye ache h
जवाब देंहटाएंNice
जवाब देंहटाएंThanku so much srr plz sr aapka no mil skta h
जवाब देंहटाएंAcche point h
जवाब देंहटाएंBahut AXA bhai
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