कुकुरमुत्ता

कुकुरमुत्ता -निराला

एक थे नव्वाब,फ़ारस से मंगाए थे गुलाब।बड़ी बाड़ी में लगाएदेशी पौधे भी उगाएरखे माली, कई नौकरगजनवी का बाग मनहरलग रहा था।एक सपना जग रहा थासांस पर तहजबी की,गोद पर तरतीब की।क्यारियां सुन्दर बनीचमन में फैली घनी।फूलों के पौधे वहाँलग रहे थे खुशनुमा।बेला, गुलशब्बो, चमेली, कामिनी,जूही, नरगिस, रातरानी, कमलिनी,चम्पा, गुलमेंहदी, गुलखैरू, गुलअब्बास,गेंदा, गुलदाऊदी, निवाड़, गन्धराज,और किरने फ़ूल, फ़व्वारे कई,रंग अनेकों-सुर्ख, धनी, चम्पई,आसमानी, सब्ज, फ़िरोज सफ़ेद,जर्द, बादामी, बसन्त, सभी भेद।फ़लों के भी पेड़ थे,आम, लीची, सन्तरे और फ़ालसे।चटकती कलियां, निकलती मृदुल गन्ध,लगे लगकर हवा चलती मन्द-मन्द,चहकती बुलबुल, मचलती टहनियां,बाग चिड़ियों का बना था आशियाँ।साफ़ राह, सरा दानों ओर,दूर तक फैले हुए कुल छोर,बीच में आरामगाहदे रही थी बड़प्पन की थाह।कहीं झरने, कहीं छोटी-सी पहाड़ी,कही सुथरा चमन, नकली कहीं झाड़ी।आया मौसिम, खिला फ़ारस का गुलाब,बाग पर उसका पड़ा था रोब-ओ-दाब;वहीं गन्दे में उगा देता हुआ बुत्तापहाड़ी से उठे-सर ऐंठकर बोला कुकुरमुत्ता-“अब, सुन बे, गुलाब,भूल मत जो पायी खुशबु, रंग-ओ-आब,खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट,डाल पर इतरा रहा है केपीटलिस्ट!कितनों को तूने बनाया है गुलाम,माली कर रक्खा, सहाया जाड़ा-घाम,हाथ जिसके तू लगा,पैर सर रखकर वो पीछे को भागाऔरत की जानिब मैदान यह छोड़कर,तबेले को टट्टू जैसे तोड़कर,शाहों, राजों, अमीरों का रहा प्यारातभी साधारणों से तू रहा न्यारा।वरना क्या तेरी हस्ती है, पोच तूकांटो ही से भरा है यह सोच तूकली जो चटकी अभीसूखकर कांटा हुई होती कभी।रोज पड़ता रहा पानी,तू हरामी खानदानी।चाहिए तुझको सदा मेहरून्निसाजो निकाले इत्र, रू, ऐसी दिशाबहाकर ले चले लोगो को, नही कोई किनाराजहाँ अपना नहीं कोई भी सहाराख्वाब में डूबा चमकता हो सितारापेट में डंड पेले हों चूहे, जबां पर लफ़्ज प्यारा।देख मुझको, मैं बढ़ाडेढ़ बालिश्त और ऊंचे पर चढ़ाऔर अपने से उगा मैंबिना दाने का चुगा मैंकलम मेरा नही लगतामेरा जीवन आप जगतातू है नकली, मै हूँ मौलिकतू है बकरा, मै हूँ कौलिकतू रंगा और मैं धुलापानी मैं, तू बुलबुलातूने दुनिया को बिगाड़ामैंने गिरते से उभाड़ातूने रोटी छीन ली जनखा बनाकरएक की दी तीन मैने गुन सुनाकर।
काम मुझ ही से सधा हैशेर भी मुझसे गधा हैचीन में मेरी नकल, छाता बनाछत्र भारत का वही, कैसा तनासब जगह तू देख लेआज का फिर रूप पैराशूट ले।विष्णु का मैं ही सुदर्शनचक्र हूँ।काम दुनिया मे पड़ा ज्यों, वक्र हूँ।उलट दे, मैं ही जसोदा की मथानीऔर लम्बी कहानी-सामने लाकर मुझे बेंड़ादेख कैंडातीर से खींचा धनुष मैं राम का।काम का-पड़ा कन्धे पर हूँ हल बलराम का।सुबह का सूरज हूँ मैं हीचांद मैं ही शाम का।कलजुगी मैं ढालनाव का मैं तला नीचे और ऊपर पाल।मैं ही डांड़ी से लगा पल्लासारी दुनिया तोलती गल्लामुझसे मूछें, मुझसे कल्लामेरे उल्लू, मेरे लल्लाकहे रूपया या अधन्नाहो बनारस या न्यवन्नारूप मेरा, मै चमकतागोला मेरा ही बमकता।लगाता हूँ पार मैं हीडुबाता मझधार मैं ही।डब्बे का मैं ही नमूनापान मैं ही, मैं ही चूना
मैं कुकुरमुत्ता हूँ,पर बेन्जाइन (Bengoin) वैसेबने दर्शनशास्त्र जैसे।ओमफ़लस (Omphalos) और ब्रहमावर्तवैसे ही दुनिया के गोले और पर्तजैसे सिकुड़न और साड़ी,ज्यों सफ़ाई और माड़ी।कास्मोपालिटन और मेट्रोपालिटनजैसे फ़्रायड और लीटन।फ़ेलसी और फ़लसफ़ाजरूरत और हो रफ़ा।सरसता में फ़्राडकेपिटल में जैसे लेनिनग्राड।सच समझ जैसे रकीबलेखकों में लण्ठ जैसे खुशनसीब
मैं डबल जब, बना डमरूइकबगल, तब बना वीणा।मन्द्र होकर कभी निकलाकभी बनकर ध्वनि छीणा।मैं पुरूष और मैं ही अबला।मै मृदंग और मैं ही तबला।चुन्ने खां के हाथ का मैं ही सितारदिगम्बर का तानपूरा, हसीना का सुरबहार।मैं ही लायर, लिरिक मुझसे ही बनेसंस्कृत, फ़ारसी, अरबी, ग्रीक, लैटिन के जनेमन्त्र, गज़लें, गीत, मुझसे ही हुए शैदाजीते है, फिर मरते है, फिर होते है पैदा।वायलिन मुझसे बजाबेन्जो मुझसे सजा।घण्टा, घण्टी, ढोल, डफ़, घड़ियाल,शंख, तुरही, मजीरे, करताल,करनेट, क्लेरीअनेट, ड्रम, फ़्लूट, गीटर,बजानेवाले हसन खां, बुद्धू, पीटर,मानते हैं सब मुझे ये बायें से,जानते हैं दाये से।
ताताधिन्ना चलती है जितनी तरहदेख, सब में लगी है मेरी गिरहनाच में यह मेरा ही जीवन खुलापैरों से मैं ही तुला।कत्थक हो या कथकली या बालडान्स,क्लियोपेट्रा, कमल-भौंरा, कोई रोमान्सबहेलिया हो, मोर हो, मणिपुरी, गरबा,पैर, माझा, हाथ, गरदन, भौंहें मटकानाच अफ़्रीकन हो या यूरोपीयन,सब में मेरी ही गढ़न।किसी भी तरह का हावभाव,मेरा ही रहता है सबमें ताव।मैने बदलें पैंतरे,जहां भी शासक लड़े।पर हैं प्रोलेटेरियन झगड़े जहां,मियां-बीबी के, क्या कहना है वहां।नाचता है सूदखोर जहां कहीं ब्याज डुचता,नाच मेरा क्लाईमेक्स को पहुचंता।
नहीं मेरे हाड़, कांटे, काठ कानहीं मेरा बदन आठोगांठ का।रस-ही-रस मैं हो रहासफ़ेदी का जहन्नम रोकर रहा।दुनिया में सबने मुझी से रस चुराया,रस में मैं डूबा-उतराया।मुझी में गोते लगाये वाल्मीकि-व्यास नेमुझी से पोथे निकाले भास-कालिदास ने।टुकुर-टुकुर देखा किये मेरे ही किनारे खड़ेहाफ़िज-रवीन्द्र जैसे विश्वकवि बड़े-बड़े।कहीं का रोड़ा, कही का पत्थरटी.एस. एलीयट ने जैसे दे मारापढ़नेवाले ने भी जिगर पर रखकरहाथ, कहां,’लिख दिया जहां सारा’।ज्यादा देखने को आंख दबाकरशाम को किसी ने जैसे देखा तारा।जैसे प्रोग्रेसीव का कलम लेते हीरोका नहीं रूकता जोश का पारायहीं से यह कुल हुआजैसे अम्मा से बुआ।मेरी सूरत के नमूने पीरामेडमेरा चेला था यूक्लीड।रामेश्वर, मीनाछी, भुवनेश्वर,जगन्नाथ, जितने मन्दिर सुन्दरमैं ही सबका जनकजेवर जैसे कनक।हो कुतुबमीनार,ताज, आगरा या फ़ोर्ट चुनार,विक्टोरिया मेमोरियल, कलकत्ता,मस्जिद, बगदाद, जुम्मा, अलबत्तासेन्ट पीटर्स गिरजा हो या घण्टाघर,गुम्बदों में, गढ़न में मेरी मुहर।एरियन हो, पर्शियन या गाथिक आर्चपड़ती है मेरी ही टार्च।पहले के हो, बीच के हो या आज केचेहरे से पिद्दी के हों या बाज के।चीन के फ़ारस के या जापान केअमरिका के, रूस के, इटली के, इंगलिस्तान के।ईंट के, पत्थर के हों या लकड़ी केकहीं की भी मकड़ी के।बुने जाले जैसे मकां कुल मेरेछत्ते के हैं घेरे।
सर सभी का फ़ांसनेवाला हूं ट्रेपटर्की टोपी, दुपलिया या किश्ती-केप।और जितने, लगा जिनमें स्ट्रा या मेट,देख, मेरी नक्ल है अंगरेजी हेट।घूमता हूं सर चढ़ा,तू नहीं, मैं ही बड़ा।”
(२)बाग के बाहर पड़े थे झोपड़ेदूर से जो देख रहे थे अधगड़े।जगह गन्दी, रूका, सड़ता हुआ पानीमोरियों मे; जिन्दगी की लन्तरानी-बिलबिलाते किड़े, बिखरी हड्डियांसेलरों की, परों की थी गड्डियांकहीं मुर्गी, कही अण्डे,धूप खाते हुए कण्डे।हवा बदबू से मिलीहर तरह की बासीली पड़ी गयी।रहते थे नव्वाब के खादिमअफ़्रिका के आदमी आदिम-खानसामां, बावर्ची और चोबदार;सिपाही, साईस, भिश्ती, घुड़सवार,तामजानवाले कुछ देशी कहार,नाई, धोबी, तेली, तम्बोली, कुम्हार,फ़ीलवान, ऊंटवान, गाड़ीवानएक खासा हिन्दु-मुस्लिम खानदान।एक ही रस्सी से किस्मत की बंधाकाटता था जिन्दगी गिरता-सधा।बच्चे, बुड्ढे, औरते और नौजवानरह्ते थे उस बस्ती में, कुछ बागबानपेट के मारे वहां पर आ बसेसाथ उनके रहे, रोये और हंसे।
एक मालिनबीबी मोना माली की थी बंगालिन;लड़की उसकी, नाम गोलीवह नव्वाबजादी की थी हमजोली।नाम था नव्वाबजादी का बहारनजरों में सारा जहां फ़र्माबरदार।सारंगी जैसी चढ़ीपोएट्री में बोलती थीप्रोज में बिल्कुल अड़ी।गोली की मां बंगालिन, बहुत शिष्टपोयट्री की स्पेशलिस्ट।बातों जैसे मजती थीसारंगी वह बजती थी।सुनकर राग, सरगम तानखिलती थी बहार की जान।गोली की मां सोचती थी-गुर मिला,बिना पकड़े खिचे कानदेखादेखी बोली मेंमां की अदा सीखी नन्हीं गोली ने।इसलिए बहार वहां बारहोमासडटी रही गोली की मां केकभी गोली के पास।सुबहो-शाम दोनों वक्त जाती थीखुशामद से तनतनाई आती थी।गोली डांडी पर पासंगवाली कौड़ीस्टीमबोट की डोंगी, फ़िरती दौड़ी।पर कहेंगे-‘साथ-ही-साथ वहां दोनो रहती थींअपनी-अपनी कहती थी।दोनों के दिल मिले थेतारे खुले-खिले थे।हाथ पकड़े घूमती थींखिलखिलाती झूमती थीं।इक पर इक करती थीं चोटहंसकर होतीं लोटपोट।सात का दोनों का सिनखुशी से कटते थे दिन।महल में भी गोली जाया करती थीजैसे यहां बहार आया करती थी।
एक दिन हंसकर बहार यह बोली-“चलो, बाग घूम आयें हम, गोली।”दोनों चली, जैसे धूप, और छांहगोली के गले पड़ी बहार की बांह।साथ टेरियर और एक नौकरानी।सामने कुछ औरतें भरती थीं पानीसिटपिटायी जैसे अड़गड़े मे देखा मर्द कोबाबू ने देखा हो उठती गर्दन को।निकल जाने पर बहार के, बोलीपहली दूसरी से, “देखो, वह गोलीमोना बंगाली की लड़की ।भैंस भड़्की,ऎसी उसकी मां की सूरतमगर है नव्वाब की आंखों मे मूरत।रोज जाती है महल को, जगे भागआखं का जब उतरा पानी, लगे आग,रोज ढोया आ रहा है माल-असबाबबन रहे हैं गहने-जेवरपकता है कलिया-कबाब।”झटके से सिर-आंख पर फ़िर लिये घड़ेचली ठनकाती कड़े।बाग में आयी बहारचम्पे की लम्बी कतारदेखती बढ़्ती गयीफ़ूल पर अड़ती गयी।मौलसिरी की छांह मेंकुछ देर बैठ बेन्च परफ़िर निगाह डाली एक रेन्ज परदेखा फ़िर कुछ उड़ रही थी तितलियांडालों पर, कितनी चहकती थीं चिड़ियां।भौरें गूंजते, हुए मतवाले-सेउड़ गया इक मकड़ी के फ़ंसकर बड़े-से जाले से।फ़िर निगाह उठायी आसमान की ओरदेखती रही कि कितनी दूर तक छोरदेखा, उठ रही थी धूप-पड़ती फ़ुनगियों पर, चमचमाया रूप।पेड़ जैसे शाह इक-से-इक बड़ेताज पहने, है खड़े।आया माली, हाथ गुलदस्ते लियेगुलबहार को दिये।गोली को इक गुलदस्तासूंघकर हंसकर बहार ने दिया।जरा बैठकर उठी, तिरछी गलीहोती कुन्ज को चली!देखी फ़ारांसीसी लिलीऔर गुलबकावली।फ़िर गुलाबजामुन का बाग छोड़ातूतो के पेड़ो से बायें मुंह मोड़ा।एक बगल की झाड़ीबढ़ी जिधर थी बड़ी गुलाबबाड़ी।देखा, खिल रहे थे बड़े-बड़े फ़ूललहराया जी का सागर अकूल।दुम हिलाता भागा टेरियर कुत्ताजैसे दौड़ी गोली चिल्लाती हुई ‘कुकुरमुत्ता’।सकपकायी, बहार देखने लगीजैसे कुकुरमुत्ते के प्रेम से भरी गोली दगी।भूल गयी, उसका था गुलाब पर जो कुछ भी प्यारसिर्फ़ वह गोली को देखती रही निगाह की धार।टूटी गोली जैसे बिल्ली देखकर अपना शिकारतोड़कर कुकुरमुत्तों को होती थी उनके निसार।बहुत उगे थे तब तकउसने कुल अपने आंचल मेंतोड़कर रखे अब तक।घूमी प्यार सेमुसकराती देखकर बोली बहार से-“देखो जी भरकर गुलाबहम खायंगे कुकुरमुत्ते का कबाब।”कुकुरमुत्ते की कहानीसुनी उससे जीभ में बहार की आया पानी।पूछा “क्या इसका कबाबहोगा ऎसा भी लजीज?जितनी भाजियां दुनिया मेंइसके सामने नाचीज?”गोली बोली-”जैसी खुशबूइसका वैसा ही स्वाद,खाते खाते हर एक कोआ जाती है बिहिश्त की यादसच समझ लो, इसका कलियातेल का भूना कबाब,भाजियों में वैसाजैसा आदमियों मे नव्वाब”
“नहीं ऎसा कहते री मालिन कीछोकड़ी बंगालिन की!”डांटा नौकरानी ने-चढ़ी-आंख कानी ने।लेकिन यह, कुछ एक घूंट लार केजा चुके थे पेट में तब तक बहार के।“नहीं नही, अगर इसको कुछ कहा”पलटकर बहार ने उसे डांटा-“कुकुरमुत्ते का कबाब खाना है,इसके साथ यहां जाना है।”“बता, गोली” पूछा उसने,“कुकुरमुत्ते का कबाबवैसी खुशबु देता हैजैसी कि देता है गुलाब!”गोली ने बनाया मुंहबाये घूमकर फ़िर एक छोटी-सी निकाली “उंह!”कहा,”बकरा हो या दुम्बामुर्ग या कोई परिन्दाइसके सामने सब छू:सबसे बढ़कर इसकी खुशबु।भरता है गुलाब पानीइसके आगे मरती है इन सबकी नानी।”चाव से गोली चलीबहार उसके पीछे हो ली,उसके पीछे टेरियर, फ़िर नौकरानीपोंछती जो आंख कानी।चली गोली आगे जैसे डिक्टेटरबहार उसके पीछे जैसे भुक्खड़ फ़ालोवर।उसके पीछे दुम हिलाता टेरियर-आधुनिक पोयेट (Poet)पीछे बांदी बचत की सोचतीकेपीटलिस्ट क्वेट।झोपड़ी में जल्दी चलकर गोली आयीजोर से ‘मां’ चिल्लायी।मां ने दरवाजा खोला,आंखो से सबको तोला।भीतर आ डलिये मे रक्खेमोली ने वे कुकुरमुत्ते।देखकर मां खिल गयी।निधि जैसे मिल गयी।कहा गोली ने, “अम्मा,कलिया-कबाब जल्द बना।पकाना मसालेदारअच्छा, खायेंगी बहार।पतली-पतली चपातियांउनके लिए सेख लेना।”जला ज्यों ही उधर चूल्हा,खेलने लगीं दोनों दुल्हन-दूल्हा।कोठरी में अलग चलकरबांदी की कानी को छलकर।टेरियर था बरातीआज का गोली का साथ।हो गयी शादी कि फ़िर दूल्हन-बहार से।दूल्हा-गोली बातें करने लगी प्यार से।इस तरह कुछ वक्त बीता, खाना तैयारहो गया, खाने चलीं गोली और बहार।कैसे कहें भाव जो मां की आंखो से बरसेथाली लगायी बड़े समादर से।खाते ही बहार ने यह फ़रमाया,“ऎसा खाना आज तक नही खाया”शौक से लेकर सवादखाती रहीं दोनोकुकुरमुत्ते का कलिया-कबाब।बांदी को भी थोड़ा-सागोली की मां ने कबाब परोसा।अच्छा लगा, थोड़ा-सा कलिया भीबाद को ला दिया,हाथ धुलाकर देकर पान उसको बिदा किया।
कुकुरमुत्ते की कहानीसुनी जब बहार सेनव्वाब के मुंह आया पानी।बांदी से की पूछताछ,उनको हो गया विश्वास।माली को बुला भेजा,कहा,”कुकुरमुत्ता चलकर ले आ तू ताजा-ताजा।”माली ने कहा,”हुजूर,कुकुरमुत्ता अब नहीं रहा है, अर्ज हो मन्जूर,रहे है अब सिर्फ़ गुलाब।”गुस्सा आया, कांपने लगे नव्वाब।बोले;”चल, गुलाब जहां थे, उगा,सबके साथ हम भी चाहते है अब कुकुरमुत्ता।”बोला माली,”फ़रमाएं मआफ़ खता,कुकुरमुत्ता अब उगाया नही उगता 

कुछ मुख्य बिंदु 

  1. कुकुरमुत्ता कविता निराला ने 1942 ई में लिखा था।  
  2. यह मार्क्सवाद से प्रभावित रचना है। 
  3. इसमें गुलाब शोषक और कुकुरमुत्ता शोषित का प्रतीक है। 

हिंदी साहित्य नेट से सम्बंधित कुछ प्रश्न

                                              

हिंदी साहित्य नेट से सम्बंधित कुछ प्रश्न 

प्रश्न 1 -     गीत फरोश किसकी कविता है ?

1 -मुक्तिबोध                     2 अज्ञेय                           3 धूमिल                    4 भवानी प्रसाद मिश्र 

प्रश्न 2 -निम्न को क्रम से लगाइये 

  1. धूमिल ,मुक्तिबोध, अज्ञेय ,भवानी प्रसाद मिश्र 
  2. अज्ञेय ,भवानीप्रसाद मिश्र ,मुक्तिबोध ,धूमिल 
  3. भवानीप्रसाद मिश्र ,अज्ञेय ,मुक्तिबोध ,धूमिल 
  4. धूमिल ,अज्ञेय ,भवानीप्रसाद मिश्र ,मुक्तिबोध 
प्रश्न ३-बिहारी सतसई में कितने दोहे है ?

1 -709            2- 712                               3- 715                           4 -713 

प्रश्न 4 -अँधेरे में कविता में कितने खंड है ?

1 - 8 खंड 75 बंध                                       २-8 खंड 71 बंध                        3 -6 खंड 71 बंध 

4 -6 खंड 75 बंध 

प्रश्न ५-जोरावर किस नाटक  पात्र है ?

1 -सिंदूर की होली                           2 -बकरी                            3 -महाभोज                4 -आगरा बाजार 

प्रश्न 6 -सावित्री किस नाटक की पात्र है ?

1 -महाभोज                                      2 -अंजो दीदी                         3 -इनमे से कोई नहीं        4 -बकरी 

प्रश्न 7 -कविता क्या है निबंध किस संग्रह में संकलित है ?

1 -रस मीमांसा                    २-चितामणि १ भाग                         ३ -चिंता मणि २ भाग                ४  -इनमे से कोई नहीं 

प्रश्न 8 -ध्रुस्वमिनी नाटक कब आया ?

१ -1915                        २ 1928                               ३ -1931                     ४ 1933 

प्रश्न 9 -देवरानी जेठानी की कहानी को किसने हिंदी का पहला उपन्यास माना है ?

१ -मधुरेश                     2 गोपाल राय                      ३ हजारी प्रसाद दिवेदी              ४ रामचंद्र शुक्ल 

प्रश्न 10 -इस करुणा कलित ह्रदय में 

अब विकल रागनी बजती 

क्यों हाहाकार स्वरों में 

वेदना असीम गरजती ?

१ -आँसू                        २ -कामायनी                      ३ - सरोज स्मृति                  ४ -फिर विकल है प्राण मेरे 

देवकांत सिंह -मोबाईल न-9555935125 

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एक बैच में अधिकतम विद्यार्थियों की संख्या 15 होगी। 

नेट हिंदी साहित्य में लगे कहानीकारों का जन्म

                                                   नेट हिंदी साहित्य में लगे कहानीकारों का जन्म 

  1. सुभद्रा कुमारी चौहान1905 
  2. प्रेमचंद -1880 
  3. चंद्रधर शर्मा गुलेरी -1883
  4. जयशंकर प्रसाद -1889 
  5. जैनेन्द्र -1905 
  6. फणीश्वरनाथ रेणु -1921 
  7. अज्ञेय -1911 
  8. शेखर जोशी -1932
  9. भीष्म साहनी -1915
  10. कृष्णा सोबती -1925 
  11. हरिशंकर परसाई - 1924 
  12. ज्ञानरंजन -1931 
  13. कमलेश्वर -1932 
  14. निर्मल वर्मा -1929 
  15. राजेंद्र बाला घोष -1882
  16. माधवप्रसाद सप्रे -1871 
  • दुनिया का अनमोल रतन कहानी सोजे वतन में संकलित हे। यह रचना 1907 ई  में ै आई थी। इसे अंग्रेजो जब्त कर लिया।  उसके पश्चात् नवाबराय ने प्रेमचंद नाम से लिखना आरम्भ किया। 
  • उसने कहा था कहानी का प्रकाशन 1915 ई में हुआ। यह सरस्वती पत्रिका में सम्पादित हुई। इसे राजेंद्र यादव ने हिंदी की पहली प्रौढ़ कहानी कहा है। 
  • परिंदे कहानी 1960 में प्रकाशित हुई।  डॉ नामवर सिंह ने इसे अपनी पुस्तक कहानी और नयी कहानी में हिंदी नै कहानी की प्रथम कहानी माना है। 
  • ईदगाह कहानी 1933 में प्रकाशित हुई। इसमें एक बालक के मनोविज्ञान की दशा को दिखाया गया है की वह कैसे काम उम्र में इतना संवेदनशील हो जाता है। कि अपनी जरूरतों को न देख वह दादी के लिया चिंता ले अत है। 
  • अमृतसर आ गया कहानी साम्प्रदाइकता की विभीषिका पर लिखी गई कहानी है। किस प्रकार मनुष्य हैवान बन जाता है। वह अपने ही जैसे दूसरे व्यक्ति की हत्या तक कर देता है।  क्योकि उसका धर्म अलग है। ऐसे में जरुरी नहीं जो गलत करता है। वही व्यक्ति दूसरे का निशाना हो। उसमे किसी की भी बलि चढ़ जाती है। 

देवकांत सिंह -मोबाईल न-9555935125 

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एहसास एक किशोरा के अस्तित्व की कथा


एहसास

एक किशोरा के अस्तित्व की कथा 

कमरे में अँधेरा छाया हुआ था। बाहर का शोरगुल नीता को व्याकुल कर रहा था। वह चाहती थी ,की जैसे यह लाइट गई और अँधेरा छा गया वैसे ही यहाँ शांति हो जाए वह सकून से कुछ सोच सके। लेकिन बाहर का शोर उसके आंतरिक मन में उठनेवाले विचारों को दबा देता ओर उसका ध्यान उसी की ओर केन्द्रित हो गया। सहसा रसोईघर से बर्तनों के गिरने की आवाज आयी /वह रसोईघर की तरफ चल दी /घर की आज पूरी जिम्मेदारी उसी के ऊपर थीरोज -रोज /माँ -पिताजी बड़ी बहन की शादी के लिए आवश्यक सामानों के ऑर्डर देने के लिए गए थे /जो रात के 11 बजे से पहले नहीं आ सकते ,बड़ी बहन मीना ,भाई अमित के साथ गाँव चली गई है /शादी शहर में होने के कारण वह गाँव में सबसे मिल लेना चाहती थी /कमरों के पद्चाप के कारण नीता का ध्यान टूटा /उसने देखा रोहित उसके सामने खड़ा है ,तभी बाहर लाइट आ जाती है /
क्या सोच रही थी ?तुम्हें सोचने के सिवा और कुछ काम नहीं /
काम ही तो कर रही हूँ ,उसने झुँझलाकर कहाँ /रोहित में चाहती हूँ की तुम कोई अच्छी लड़की देखकर शादी कर लो /
न नीता तुम्हें कुछ दिनों से क्या हो गया है /तुम बात -बात पर झगड़ा किया करती हो /तुम स्वयं जानती हो ,की मै तुमसे प्यार करता हूँ /अब तुम्हारे घर वालो को मेरे आने -जाने से कोई एतराज नहीं /
तुम यहाँ रोज -रोज मत आया करो /
रोहित का गुस्सा बढ़ जाता है ,वह पास रखे हुए मेज पर ;लात मारकर चला जाता है /
नीता को रोहित के जाने का कोई गम नहीं है /वह घर की लाइट को बुझा देती है /अब कोई शोर कमरे में प्रविष्ट नहीं हो रहा क्योंकि गली के बच्चें घर में टी.वी देखने में व्यस्त हो गए है /नीता अपने ख्यालों में डूबती चली जाती है /मेरे लिए अभी तक नास्ता तैयार नहीं हुआ ?मम्मी मेरे लिए अभी तक नाश्ता नहीं तैयार किया /
बेटी ये पैसे लो केंटीन से खा लेना माँ 30 रुपए निकाल कर देती है /
नीता ऑटो में बैठने के लिए जाती है ,पीछे से कई लड़को की आवाजें आती है 
पहला -क्या माल है यार 
दूसरा -अपने अनुभवी अन्दाज में ,तुम इसे जानते नहीं इसने कितनों को फसा रखा है /
तीसरा -मुझे भी एक बढ़ाले तेरा क्या हो जायेगा 
इतने में ऑटो वाला आ जाता है और वह चली जाती है 
सोनी हाय नीता आज बहुत सुन्दर लग रही हो ,किसी के साथ डेट पर जाना है 
फरवरी का महीना ही ऐसा होता है ,जिसमें न चाहो तो भी कुछ एहसास छोड़ जाता है 
एहसास मुझे तो कोई एहसास नहीं होता नीता ने कहा /
चल क्लास शुरू होने वाली है 
तू जा मैं तो रोशन के साथ डेट पर जा रही हूँ /वह बाहर बाइक लेकर खड़ा है /ओके बाय नीता 
नीता कल क्लॉस में क्या पढ़ाया गया था /
सविधान निर्माण ,त्रिभुज ,टेंस और अध्यापिका नहीं आई थी 
तुम कहा गई थी ?
कुछ काम था घर पर /इसलिए नहीं आ सकी /
सभी अध्यापिका बारी -बारी और पढ़ने के लिए कहकर अपनी नीद पूरी करती /अंतिम पीरियड हिंदी का था मेम ने रस पढ़ाया ,शृंगार रस से काफी लड़किया प्रभावित और रोमांचित दिख रही थी /क्लॉस की छुट्टी होने के बाद लड़कियों में इस रस के बारे में अधिक चर्चा थी /सभी इस रस को पहचानने लगे थे वे बच्चे खासतौर पर जो पढ़ाई पर थोड़ा भी ध्यान नहीं देती /लेकिन इस रस का बातों से आनंद ले रही थी /नीता कुछ दूर अपने साथियों के साथ आयी ,अब वह अकेले ही अपने घर की दूरियाँ नाप रही थी की रोहित फिर से उसके पीछे चला आया /यह रोज -रोज उसका पीछा करना नीता को समझ आ रहा था /वह जानती थी की वह उसके प्यार में लट्टू है /उसने 8 वी में किशोरावस्था पढ़ा था ओर अपने सहेलियों के पास इसी प्यार के कारण ,फोन ओर पैसे रहते थे /उनके पास नए कपड़ो की भरमार भी थी /नीता ने भी फैसला कर लिया की इसके रोज -रोज पीछा करने निजात पा जाय /वह मुड़ी ,,क्यों मेरा पीछा रोज -रोज करते हो /
रोहित ने अपने हाथ में लिया हुआ मोबाइल उसे देते हुए कहा रात में 10 बजे फोन करूँगा /घर पर आकार नीता उदास बैठ गई वह क्या करे?रोहित 25 साल का का नौजवान ओर ये 15 साल की किशोरा /उसने निश्चय किया की वह रात को जो कुछ भी कहेगा ,वह उसका नकरात्मक उत्तर देगी /उसे उसके मोबइल को वापस ले जाने के लिए भी कहेगी /
माँ -पिताजी के काम पर चले जाने के बाद उसकी बड़ी बहन मीना बच्चों को टूशन पढ़ाने में व्यस्त रहती ,भाई को अपनी पढ़ाई से मतलब था /घर में अकेले यही सोचती रही की रात में ,मैं क्या उत्तर दूंगी 
10 बजे मोबाइल कम्पन करने लगा और नीता छत के कोने में ले जाकर बात करती है /
मैं तुम्हारे लिए सब कुछ करूँगा बस तुम मेरी हो जाओ /कल हम फिल्म देखने चलेंगे /
मगर कल मेरा स्कूल है 
एक दिन स्कूल नहीं जाओगी तो ,क्या हो जायगा /कल तुम मुझे बस स्टैण्ड पर मिल जाना /रोहित फोन रख देता है /
नीता सोचने लगती है /मैने क्या सोचा था ओर क्या कह दिया अच्छा चलो पहले कल फिल्म देख आते है /
रोहित सुबह बस स्टैण्ड से लेकर चला जाता है /फिल्म बड़ी ही रोमांटिक होती है /जिसमे रोहित भी रोमांचित होकर उसे कस कर पकड़ लेता है /नीता तो पहले घबड़ा जाती है लेकिन फिर वह उसका प्रतिवाद नहीं करती /

अगले दिन भी रोहित उसे बस स्टॉप पर मिल जाता है /नीता उसके साथ जाती है /

मैं रोज तुम्हें साथ स्कूल नहीं ले जा सकता क्योंकि मेरा काम ही ऐसा है की में तुमसे इस समय मिल सकूँ /
ठीक है 

बाजार ,किसी अवसर पर घूमने ले जाना और घर पर किसी को पता न चलना इतने कड़े रूटीन के साथ नीता घूमती थी /वह इसमें सफल भी रही /आज 4 साल हो गए नीता ने 12 वी पास कर लिया /रोहित ने उसके पास होने पर पार्टी भी की थी /नीता भी खुश थी लेकिन आगे भविष्य के बारे में भी सोचना था /

रोहित मैं इंग्लिश ऑनर्स करना चाहती हूँ /
मेरा नाम कॉलेज के इन्ट्रेन्स में आ गया है /ठीक है 

हाय नीता हमारी क्लॉस 201 में लग रही है /चलोगी नहीं /

क्लॉस लग रही है तो कैसे जायँगे ?यार तुम हमेशा अपनी स्कूल वाली सोच ही रखोगी /यहाँ पर क्लॉस में कभी भी जा सकते है ,लेकिन शांति से 
हम कौन सा ढोल बजाते हुए जा रहे है /
क्लॉस के सबसे पीछे वाली सीट पर दोनों जाकर बैठ जाती है /सर के जाने के बाद एक लड़का उसके पास जाकर कहता है आप इसी क्लॉस में हो 
नहीं में इस क्लॉस में नहीं हू यहाँ डांस करने आई हूँ /
तो करो यहाँ दर्शकों की कमी नहीं /
नीता ने उस लड़के का मजाक बनाने के चक्कर में खुद का मजाक बना लिया /लेकिन लड़के से वह प्रभावित थी ऐसे ही बेधड़क आकर बोलना ,रोहित तो ऐसा नहीं है वह तो कई महीने मेरे पीछे ही घूमता रहा /अंत में मुझे ही बोलना पड़ा /उम्र में भी 19 साल के लगभग सुन्दर साँवला होते हुए भी नक्से की ऐसी बनावट बहुत ही प्रभावशाली है /
ओ तुम्हारे डांस करने के लिए स्टेज नहीं लगने वाला /
हो गया बस और इस बात को खेचना है /मेरा नाम नीता है /
मैं करणवीर लेकिन सब मुझे करण ही कहते है 
क्लॉस से निकलने के बाद नीता को रोहित गेट पर ही मिल गया /कैसा गया कॉलेज का दिन ?
मस्त 
क्लॉस में एक महीने बीतने पर कई बच्चों ने मिलकर घूमने की योजना बनाई /नीता को भी लगा की मुझे जाना चाहिए /घर के लोगों के आपस में ही व्यस्त रहने के कारण वह सिर्फ कहीं घूमने रोहित के साथ ही गई थी /उसमें भी उसे एक डर समाया रहता था,कोई मुझे देख न ले /अगर कोई मुझे देख लेगा तो घर का बवाल अलग /लेकिन स्वत्नंत्र घूमने की इच्छा से उसने भी इसमें हा मिला दी? /
घूमने के दिन उसने मम्मी को बताया की /मैं आज थोड़ी देर से आउंगी /मैं अपने दोस्तों के साथ घूमने जा रही हूँ /
रोहित इस बात से काफी नाराज था /मैं तुम्हें हमेशा घुमाता ही रहता हूँ /
मैंने तुम्हें बता दिया मुझे तुम्हारे इजाजत की जरुरत नहीं /
इतना क्यों गुस्सा करती हो ?ठीक है मैं तुम्हें शाम को लेने आ जाऊंगा /
ठीक है 
दिन भर घूमने में करण नीता के साथ रहा उसके साथ रहने के अहसास में नीता खो जाती /कभी उसे यह अहसास होता की उसने अपनी जिंदगी में जल्दबाजी नहीं कर दी ?या आज भी कुछ करना जल्दबाजी में आएगा या आज मैं इस काबिल हो गई हूँ ?इस मानसिक पीड़ा से वह लड़ रही थी /तभी करण की आवाज आई /वह लड़का तुम्हें बुला रहा है क्या तुम उसे जानती हो ?हा वह मेरा पुराना दोस्त है /
अभी तो काफी समय है ,थोड़ा और घूम लो /
नहीं अभी नहीं मुझे देर हो रही है /
ओके बाय 
बाय 
नीता ने करण के चेहरे पर ध्यान से देखा अन्य बच्चों की तुलना में रोहित का कुछ उदास लग रहा था /वह उदासी भी नीता को अच्छी लग रही थी /रोहित घर तक नीता को छोड़ने गया /
मम्मी ये मेरा दोस्त है -रोहित 
आओ बेटा चाय पी कर जाना /
नहीं मुझे अभी काम है ,फिर कभी आऊंगा /
नीता ये तो उम्र में काफी बड़ा लग रहा है /ऐसे बच्चे भी तुम्हारे साथ पढ़ते है ?
नहीं माँ ,यह तो पढ़कर काम भी करने लगा है यह कॉलसेंटर में मैनेजर है /
अच्छा लड़का है /माँ ने कहा /
नीता को इस अच्छे का मतलब तब समझ में आया जब दीदी की शादी तय होने के बाद माँ ने कहा तेरी भी शादी करा देती हूँ /वैसे भी रोहित अच्छा लड़का है ,काम भी अच्छा करता है /
माँ मैं अभी शादी नहीं करना चाहती /
ठीक है ,अभी तेरी बहन की शादी हो जाए /उसके बाद बात करेंगे /
अब रोहित का आना जाना हमेशा लगा रहता है /क्योंकि मुझसे अधिक घरवालों को उससे लगाव हो गया है मेरी नजर मैं वह पहले वाला रोहित क्यों नहीं रहा /मैं उससे नफरत करने लगी हूँ तभी तो आज उससे कहा की तुम हमेशा यहाँ पर क्यो आ जाते हो ?
घण्टी की आवाज सुनकर नीता अपनी स्मृतियों से बाहर आती है /लाइट जलाकर दरवाजा खोलती है /
बेटा आज बोहोत थक गए है /पहले शादी के लिए लड़का ढूढ़ने में थके ,अब उनकी शादी करने में अलग थकावट। 





समाप्त 

पत्नी कहानी का सारांश, जैनेंद्र कुमार की पत्नी कहानी, Patni kahani summary.

  'पत्नी' हिंदी के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक कथाकार जैनेंद्र कुमार की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और बहुचर्चित कहानी है। यह कहानी भारतीय समाज...