आवारा मसीहा हिंदी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार विष्णु प्रभाकर द्वारा रचित एक अत्यंत लोकप्रिय और प्रामाणिक जीवनी है। यह महान बांग्ला उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के जीवन पर आधारित है।
- प्रकाशन वर्ष: 1974
- विधा: जीवनी साहित्य
- रचना प्रक्रिया: विष्णु प्रभाकर जी ने इस उत्कृष्ट कृति की रचना के लिए लगभग 14 वर्षों तक गहन शोध किया। शरतचंद्र के जीवन से जुड़े प्रामाणिक तथ्यों और संदर्भों को जुटाने के लिए उन्होंने बंगाल से लेकर म्यांमार (बर्मा) तक की लंबी यात्राएं कीं।
कृति की संरचना:
यह जीवनी तीन प्रमुख भागों (पर्वों) में विभाजित है। साहित्यिक अध्ययन और प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे UGC NET, UPHESC) के दृष्टिकोण से इन तीनों पर्वों का विभाजन अत्यंत महत्वपूर्ण है:
विष्णु प्रभाकर द्वारा रचित 'आवारा मसीहा' महान बांग्ला कथाशिल्पी शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के जीवन पर आधारित एक कालजयी और प्रामाणिक जीवनी है। लेखक ने 14 वर्षों के कठोर शोध और बर्मा से लेकर बंगाल तक की यात्राओं के बाद इस ग्रंथ की रचना की।
यह जीवनी मुख्य रूप से तीन पर्वों (भागों) में विभाजित है, जो शरतचंद्र के जीवन की क्रमिक विकास-यात्रा को दर्शाते हैं। इसका विस्तृत सारांश इस प्रकार है:
1. प्रथम पर्व: दिशाहारा (भटकाव और यायावरी का दौर)
यह पर्व शरतचंद्र के बचपन, किशोरावस्था और उनके दिशाहीन भटकाव को प्रस्तुत करता है।
- पारिवारिक पृष्ठभूमि: शरत का जन्म देवानंदपुर में हुआ, लेकिन अत्यधिक गरीबी के कारण उनका अधिकांश बचपन भागलपुर में अपने नाना के घर (केदारनाथ गांगुली के कड़े अनुशासन में) बीता।
- पिता का प्रभाव: शरत को अपने पिता मोतीलाल से दो चीजें विरासत में मिलीं—साहित्य के प्रति गहरा अनुराग और घुमक्कड़ी (यायावरी) की प्रवृत्ति।
- विद्रोही और घुमक्कड़ स्वभाव: शरत बचपन से ही उच्छृंखल, विद्रोही और नियम-कानूनों को तोड़ने वाले थे। वे स्कूल से भागकर जंगलों में घूमते, नाव खेते, तैरते और समाज के निचले व उपेक्षित वर्ग के लोगों (जैसे सपेरे, मछुआरे) के साथ समय बिताते थे।
- संवेदना का बीज: इसी दौर में उन्होंने समाज के ढोंग और पाखंड को करीब से देखा। राजू, गिरीश और बाल-विधवा कुसुम जैसे पात्रों के संपर्क ने उनके भीतर शोषितों और पीड़ितों के प्रति गहरी संवेदना पैदा की, जो बाद में उनके साहित्य का मूल आधार बनी।
2. द्वितीय पर्व: दिशा की खोज (संघर्ष और सृजन का दौर)
यह पर्व शरतचंद्र के युवावस्था के संघर्षों और उनके वास्तविक जीवन-लक्ष्य (साहित्य सृजन) को खोजने की जद्दोजहद पर केंद्रित है।
- रंगून (बर्मा) प्रवास: पिता की मृत्यु और घोर आर्थिक संकट के बाद, आजीविका की तलाश में शरत कलकत्ता से रंगून (बर्मा) चले गए। वहाँ उन्होंने एक एकाउंटेंट (क्लर्क) के रूप में कार्य किया।
- त्रासदी और एकाकीपन: रंगून में उनका जीवन अत्यधिक कष्टमय रहा। उन्होंने एक असहाय मिस्त्री की बेटी 'शांति' से विवाह किया, लेकिन प्लेग की चपेट में आने से शांति और उनके नवजात पुत्र की मृत्यु हो गई। इस त्रासदी ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया। बाद में उन्होंने 'मोक्षदा' (हिरण्मयी) से विवाह किया, जिसने उनके अस्त-व्यस्त जीवन को सँभाला।
- लेखनी की वापसी: रंगून में रहते हुए भी वे साहित्य से पूरी तरह दूर नहीं रह सके। उनके मित्र प्रमथनाथ भट्टाचार्य ने उन्हें कलकत्ता से पत्र लिखकर लगातार प्रेरित किया। यहीं से उनके भीतर का सुप्त लेखक जाग उठा और उन्होंने अपनी कहानियों और उपन्यासों के माध्यम से अपनी जीवन-दिशा खोज ली।
3. तृतीय पर्व: दिशांत (साहित्यिक यश और अवसान)
अंतिम पर्व में शरतचंद्र के रंगून से वापस बंगाल लौटने, एक प्रतिष्ठित साहित्यकार के रूप में स्थापित होने और उनके जीवन के अंतिम दिनों का वर्णन है।
- साहित्यिक प्रतिष्ठा: जब वे बंगाल लौटे, तब तक उनकी रचनाएँ (जैसे श्रीकांत, चरित्रहीन, देवदास, पल्ली समाज) धूम मचा चुकी थीं। समाज के उपेक्षित वर्गों और विशेषकर 'पतित' मानी जाने वाली स्त्रियों के मर्मस्पर्शी चित्रण ने उन्हें पूरे भारत का चहेता लेखक बना दिया।
- सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण: शरतचंद्र केवल कलम के सिपाही नहीं थे, वे देशबंधु चित्तरंजन दास के आग्रह पर हावड़ा कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बने। वे सुभाष चंद्र बोस के क्रांतिकारी विचारों के प्रबल समर्थक थे और युवाओं के प्रेरणास्रोत बन गए।
- अंतिम समय: अपार यश और सम्मान मिलने के बावजूद शरतचंद्र भीतर से एक नितांत अकेले और वैरागी व्यक्ति ही रहे। अंततः, बीमारी के कारण इस महान साहित्यकार ने जीवन की अंतिम दिशा (दिशांत) अर्थात् मृत्यु को प्राप्त किया।
शीर्षक की सार्थकता:
विष्णु प्रभाकर ने उन्हें 'आवारा मसीहा' इसलिए कहा क्योंकि समाज की दृष्टि में वे एक उच्छृंखल, घुमक्कड़ और दिशाहीन व्यक्ति (आवारा) थे, लेकिन वास्तव में उनके भीतर एक ऐसा करुणावतार (मसीहा) छिपा था, जिसने समाज द्वारा ठुकराए गए लोगों, विधवाओं और शोषितों के दर्द को अपनी कलम से वाणी दी और उन्हें साहित्य में सर्वोच्च आसन पर बिठाया।
साहित्यिक महत्त्व:
हिंदी साहित्य में 'आवारा मसीहा' को जीवनी विधा का मील का पत्थर माना जाता है। विष्णु प्रभाकर जी ने इसमें केवल शरतचंद्र के जीवन की घटनाओं का ब्यौरा नहीं दिया है, बल्कि उनके पात्रों के पीछे छिपी पीड़ा, उनकी गहरी संवेदनशीलता और समाज के उपेक्षित व शोषित वर्गों के प्रति उनके झुकाव के मनोवैज्ञानिक कारणों को बहुत ही जीवंत ढंग से उकेरा है।
| पात्र का नाम | शरतचंद्र से संबंध | 'आवारा मसीहा' में भूमिका / संक्षिप्त परिचय |
| शरतचंद्र चट्टोपाध्याय | मुख्य चरित्र (आवारा मसीहा) | जिनके दिशाहीन बचपन, संघर्षपूर्ण युवावस्था और एक महान लेखक बनने की पूरी यात्रा का वर्णन इस कृति में है। |
| मोतीलाल चट्टोपाध्याय | पिता | स्वभाव से स्वप्नदृष्टा, साहित्य-प्रेमी, लेकिन अत्यंत अस्थिर और घुमक्कड़ प्रवृत्ति के व्यक्ति। शरत को साहित्य और घुमक्कड़ी विरासत में इन्हीं से मिली। |
| भुवनमोहिनी देवी | माता | अत्यंत सहिष्णु, स्नेहमयी और कष्ट सहने वाली स्त्री। शरत के उपन्यासों में आदर्श और त्यागमयी स्त्री-पात्रों की नींव इन्हीं के व्यक्तित्व पर आधारित है। |
| केदारनाथ गांगुली | नाना | भागलपुर के प्रतिष्ठित और कड़े अनुशासन वाले व्यक्ति। आर्थिक तंगी के कारण शरत का बचपन इन्हीं के आश्रय में बीता। |
| सुरेन्द्रनाथ (सुरेन) | मामा और बालसखा | उम्र में शरत के लगभग बराबर। भागलपुर में शरत के घनिष्ठ मित्र, साथी और उनके शरारती कारनामों के गवाह। |
| उपेन्द्रनाथ | छोटे मामा | शरत के साहित्यिक जीवन और बाल्यकाल से जुड़े महत्त्वपूर्ण संबंधी, जिन्होंने शरत की प्रतिभा को बहुत करीब से देखा। |
| अनिला देवी | बड़ी बहन | शरत की बहन। शरतचंद्र ने साहित्य जगत में अपनी कई शुरुआती रचनाएँ इन्हीं के नाम का उपयोग (छद्म नाम 'अनिला देवी') करके प्रकाशित करवाई थीं। |
| गिरीश | भागलपुर का मित्र | अत्यंत साहसी, निर्भीक और रहस्यमयी स्वभाव वाला साथी। शरत के सबसे प्रसिद्ध उपन्यास 'श्रीकांत' के अमर पात्र 'इन्द्रनाथ' का सृजन इसी मित्र की छवि पर हुआ है। |
| निरुपमा देवी (नीरू) | घनिष्ठ आत्मीय मित्र | शरत के मित्र विभूति की बाल-विधवा बहन। शरत का इनसे गहरा मानसिक और आध्यात्मिक जुड़ाव था, जो जीवन भर रहा। |
| शांति देवी | प्रथम पत्नी | रंगून (बर्मा) प्रवास के दौरान शरत ने एक असहाय मिस्त्री की इस पुत्री से विवाह किया था। इनका और इनके नवजात पुत्र का प्लेग की बीमारी से निधन हो गया। |
| हिरण्मयी देवी (मोक्षदा) | द्वितीय पत्नी | रंगून में ही शरत का दूसरा विवाह बाल-विधवा मोक्षदा से हुआ, जिनका नाम उन्होंने हिरण्मयी रखा। इन्होंने आजीवन शरत का साथ निभाया और उनके अस्त-व्यस्त जीवन को सँभाला। |
| विभूति | मित्र (भागलपुर/रंगून) | शरत के बालसखा (निरुपमा के भाई) और बाद में बर्मा प्रवास के दौरान भी उनके करीबी मित्र रहे। |
| राजू / राजेन्द्रनाथ | मित्र | शरत के घुमक्कड़ी और दिशाहीन दिनों (दिशाहारा पर्व) का प्रमुख साथी। |
'आवारा मसीहा' में शरतचंद्र के पारिवारिक और मुख्य मित्रों के अलावा भी कई ऐसे पात्र हैं, जिन्होंने उनके साहित्यिक सफर, बर्मा (रंगून) प्रवास और राजनीतिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बचे हुए अन्य महत्त्वपूर्ण पात्रों का विवरण इस प्रकार है:
| पात्र का नाम | शरतचंद्र से संबंध | 'आवारा मसीहा' में भूमिका / संक्षिप्त परिचय |
| कुसुम | बाल-विधवा / आत्मीय मित्र | भागलपुर के दिनों की एक बाल-विधवा, जिसका शरत से गहरा मौन प्रेम और आत्मीयता थी। शरत के प्रसिद्ध स्त्री पात्रों (जैसे 'श्रीकांत' की राजलक्ष्मी और अन्नदा दीदी) में कुसुम की गहरी छाप दिखाई देती है। |
| प्रमथनाथ भट्टाचार्य | घनिष्ठ साहित्यिक मित्र | 'भारतवर्ष' पत्रिका से जुड़े घनिष्ठ मित्र। जब शरत बर्मा में थे, तब प्रमथनाथ ने ही उन पर दबाव डालकर और प्रेरित करके उनसे कई प्रसिद्ध कहानियाँ और उपन्यास लिखवाए। |
| सौरीन्द्र मोहन मुखर्जी | कलकत्ता के मित्र / लेखक | साहित्यकार मित्र जिन्होंने शरत के कलकत्ता छोड़ने के बाद उनकी छोड़ी हुई पुरानी पांडुलिपियों (जैसे 'बड़ी दीदी') को सहेजा और पत्रिकाओं में छपवाने का प्रबंध किया। |
| हरिदास चट्टोपाध्याय | प्रकाशक मित्र | कलकत्ता के प्रसिद्ध प्रकाशक (गुरुदास चट्टोपाध्याय एंड संस), जिन्होंने शरत की अधिकांश पुस्तकों को प्रकाशित किया और उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया। |
| नवीनचंद्र | रंगून के परिचित | जब शरतचंद्र पहली बार बर्मा (रंगून) गए थे, तो शुरुआत में नवीनचंद्र ने ही उन्हें आश्रय दिया था। |
| अघोरनाथ | रंगून के मित्र | बर्मा में क्लर्क की नौकरी के दौरान शरत के सहयोगी और मित्र, जो उनके सुख-दुख में साथ रहे। |
| देशबंधु चित्तरंजन दास | राजनैतिक मार्गदर्शक | बंगाल के महान स्वतंत्रता सेनानी। शरतचंद्र इनके व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित थे और इन्हीं के आग्रह पर शरत ने हावड़ा ज़िला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष का पद सँभाला था। |
| सुभाष चंद्र बोस | आत्मीय युवा नेता | शरतचंद्र का नेताजी सुभाष चंद्र बोस के प्रति अगाध स्नेह था। शरत ने सुभाष के विद्रोही और क्रान्तिकारी विचारों का सदैव खुलकर समर्थन किया। |
| रवींद्रनाथ टैगोर (गुरुदेव) | साहित्यिक आदर्श | यद्यपि दोनों के साहित्य का विषय अलग था, लेकिन शरत गुरुदेव का बहुत सम्मान करते थे। 'आवारा मसीहा' में दोनों के बीच के वैचारिक और सम्मानजनक पत्राचार का सुंदर वर्णन है। |
| भेलू (पालतू कुत्ता) | पालतू जीव | शरतचंद्र को पशु-पक्षियों से गहरा लगाव था। 'भेलू' उनके सबसे प्रिय कुत्तों में से एक था, जिसका उल्लेख जीवनी में शरत की गहरी संवेदना और अकेलेपन को दर्शाने के लिए किया गया है। |
विष्णु प्रभाकर द्वारा लिखित 'आवारा मसीहा' की भूमिका (प्राक्कथन) केवल एक परिचयात्मक लेख नहीं है, बल्कि यह एक जीवनीकार की 14 वर्षों की कठिन शोध-यात्रा का जीवंत दस्तावेज़ है। इसकी मुख्य बातें इस प्रकार हैं:
- रचना की प्रेरणा: विष्णु प्रभाकर ने स्पष्ट किया है कि उन्हें शरतचंद्र की प्रामाणिक जीवनी लिखने की प्रेरणा मुख्य रूप से 'हिंदी ग्रंथ रत्नाकर' के नाथूराम प्रेमी और अपने मित्र यशपाल जैन से मिली थी।
- तथ्यों के अन्वेषण की चुनौती: शरतचंद्र अपने अतीत के बारे में बात करने से बचते थे, उन्होंने कोई व्यक्तिगत डायरी नहीं छोड़ी थी, और अक्सर अपने ही जीवन के बारे में भ्रांतियां फैलाते थे। लेखक ने भूमिका में बताया है कि शरतचंद्र के इर्द-गिर्द बुने गए 'मिथक' और वास्तविक 'यथार्थ' के बीच अंतर करना इस रचना की सबसे बड़ी और जटिल चुनौती थी।
- 14 वर्षों की शोध-यात्रा का विवरण: भूमिका में उन लंबी और दुरूह यात्राओं का विस्तृत ब्यौरा है जो लेखक ने प्रामाणिक सामग्री जुटाने के लिए कीं। उन्होंने भागलपुर, पटना, कलकत्ता, हुगली से लेकर म्यांमार (रंगून) तक की यात्राएँ कीं और शरतचंद्र के समकालीनों, उनके रिश्तेदारों और मित्रों से मिलकर बिखरे हुए तथ्य एकत्रित किए।
- जीवनी का मूल उद्देश्य: लेखक ने यह रेखांकित किया है कि उनका लक्ष्य किसी स्थापित महापुरुष का गुणगान करना या केवल उनके साहित्यिक अवदान की अकादमिक चर्चा करना नहीं था। वे उस 'आवारा', घुमक्कड़ और दिशाहीन व्यक्ति के भीतर छिपे 'मसीहा' (करुणा और पीड़ा से भरे मनुष्य) को खोजना चाहते थे, जिसने समाज के सबसे उपेक्षित, शोषित और पतित वर्गों की पीड़ा को समझा और उसे स्वर दिया।
'आवारा मसीहा' के तीनों पर्वों से सबसे महत्त्वपूर्ण, प्रतिनिधि और बार-बार पूछे जाने वाले कथन यहाँ संकलित किए गए हैं:
प्रथम पर्व: दिशाहारा
इस पर्व में शरतचंद्र के बचपन, घुमक्कड़ी और उनके पिता के प्रभाव को दर्शाने वाले मुख्य कथन हैं:
- "भगवान ने मुझे सब कुछ दिया, लेकिन एक चीज़ नहीं दी—स्थायित्व और सांसारिक बुद्धि।" — मोतीलाल चट्टोपाध्याय (शरत के पिता)
- "मेरे पिता घुमक्कड़ थे। वे एक जगह टिक कर नहीं रह सकते थे और यही घुमक्कड़ी मेरे खून में बस गई है।" — शरतचंद्र
- "वह केवल आवारा नहीं था, बल्कि एक ऐसा मसीहा था जिसके हृदय में पीड़ितों के लिए अथाह करुणा थी।" — विष्णु प्रभाकर (जीवनीकार का नेपथ्य कथन)
- "मैं नियम और अनुशासन में बँधकर नहीं जी सकता, खुला आसमान ही मेरा घर है।" — शरतचंद्र (अपने बालसखाओं से)
- "शरत में एक अजीब सी चुंबक शक्ति है, जो उसे सबसे अलग भी करती है और सबके करीब भी लाती है।" — केदारनाथ गांगुली (शरत के नाना)
- "समाज के नियम उन लोगों के लिए हैं जो समाज से कुछ चाहते हैं, मुझे इस समाज से कुछ नहीं चाहिए।" — शरतचंद्र
- "तुम्हें देखकर मुझे डर लगता है शरत, तुम जीवन में या तो बहुत ऊपर जाओगे या बिल्कुल रसातल में।" — भुवनमोहिनी देवी (शरत की माता)
द्वितीय पर्व: दिशा की खोज
यह पर्व शरत के रंगून (बर्मा) प्रवास, उनके संघर्ष और एक लेखक के रूप में स्थापित होने की जद्दोजहद पर केंद्रित है:
- "मैंने जो कुछ लिखा है, वह मेरे अपने जीवन का अनुभव है, मैंने किसी से उधार नहीं लिया।" — शरतचंद्र (प्रमथनाथ भट्टाचार्य से)
- "तुम लौट आओ शरत, बंगाल की माटी और साहित्य तुम्हें पुकार रहा है।" — प्रमथनाथ भट्टाचार्य (शरत को रंगून में लिखे गए पत्र में)
- "पाप और पुण्य की परिभाषाएँ समाज ने अपनी सुविधा के लिए गढ़ी हैं, मैंने उन तथाकथित पापियों में जो करुणा देखी है, वह पुण्यात्माओं में नहीं है।" — शरतचंद्र
- "रंगून ने मुझे बहुत कुछ दिया, पर सबसे बड़ी चीज़ जो उसने मुझे दी, वह है मेरी अपनी पहचान और मेरी कलम की धार।" — शरतचंद्र
- "मैं साहित्य की रचना इसलिए नहीं करता कि मुझे यश मिले, मैं इसलिए लिखता हूँ क्योंकि मैं लिखे बिना रह नहीं सकता।" — शरतचंद्र
- "तुम्हें अपनी प्रतिभा का मोल नहीं पता, तुम जो पन्नों पर बिखेर रहे हो, वह एक दिन अमूल्य निधि बनेगा।" — हरिदास चट्टोपाध्याय (प्रकाशक मित्र)
- "हिरण्मयी ने मेरे बिखरे हुए जीवन को वैसे ही समेटा है, जैसे कोई माँ अपने अबोध बच्चे को सँभालती है।" — शरतचंद्र (अपनी द्वितीय पत्नी के संदर्भ में)
तृतीय पर्व: दिशांत
अंतिम पर्व में शरतचंद्र की साहित्यिक सफलता, उनके वैचारिक दृष्टिकोण, राजनीतिक जुड़ाव और जीवन के अवसान से जुड़े कथन हैं:
- "मेरे उपन्यासों की स्त्रियाँ वही हैं, जिन्हें समाज ने बहिष्कृत कर दिया, लेकिन जिनके भीतर देवताओं से भी अधिक पवित्रता और त्याग है।" — शरतचंद्र
- "तुम्हारा साहित्य बंगाल की सीमाओं को तोड़कर पूरे भारत का साहित्य बन गया है, तुमने मनुष्य के मन की सबसे गहरी परतों को छुआ है।" — रवींद्रनाथ टैगोर (शरत को लिखे पत्र में)
- "मैं राजनीति के पचड़े में नहीं पड़ना चाहता था, लेकिन जब देश का सबसे सच्चा सिपाही बुलाए, तो अनसुना करना मेरे लिए संभव नहीं।" — शरतचंद्र (देशबंधु चित्तरंजन दास के आग्रह पर)
- "सुभाष के भीतर जो आग है, वही कल भारत को रौशनी देगी। मैं उसके विद्रोही विचारों के साथ हूँ।" — शरतचंद्र (सुभाष चंद्र बोस के संदर्भ में)
- "मैंने जीवन में कभी किसी को उपदेश नहीं दिया, क्योंकि मैं स्वयं को उपदेश देने लायक नहीं समझता।" — शरतचंद्र
- "अब मेरी कलम थक गई है, शायद अब आराम करने का समय आ गया है।" — शरतचंद्र (बीमारी के अंतिम दिनों में)
- "वह मृत्यु को भी उसी सहजता और निडरता से गले लगाना चाहता था, जैसे उसने जीवन की अनंत कठिनाइयों को लगाया था।" — विष्णु प्रभाकर (अंत्यालाप में)
- "मेरी रचनाओं का मूल्यांकन भविष्य करेगा, मुझे बस इस बात का संतोष है कि मैंने कभी अपनी कलम के साथ बेईमानी नहीं की।" — शरतचंद्र
'आवारा मसीहा' (विष्णु प्रभाकर) पर आधारित 50 बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
- 'आवारा मसीहा' किसकी जीवनी है?(A) बंकिमचंद्र चटर्जी(B) रवींद्रनाथ टैगोर(C) शरतचंद्र चट्टोपाध्याय(D) मुंशी प्रेमचंद
- 'आवारा मसीहा' के लेखक कौन हैं?(A) अमृतराय(B) विष्णु प्रभाकर(C) रामविलास शर्मा(D) अज्ञेय
- 'आवारा मसीहा' का प्रथम प्रकाशन किस वर्ष हुआ था?(A) 1965(B) 1974(C) 1980(D) 1972
- विष्णु प्रभाकर को यह जीवनी लिखने में लगभग कितने वर्षों का समय लगा?(A) 5 वर्ष(B) 10 वर्ष(C) 14 वर्ष(D) 20 वर्ष
- 'आवारा मसीहा' कुल कितने पर्वों (भागों) में विभक्त है?(A) दो(B) तीन(C) चार(D) पाँच
- निम्नलिखित में से कौन सा 'आवारा मसीहा' का पर्व (भाग) नहीं है?(A) दिशाहारा(B) दिशा की खोज(C) दिशाहीन(D) दिशांत
- 'आवारा मसीहा' का प्रथम पर्व कौन सा है?(A) दिशांत(B) दिशाहारा(C) दिशा की खोज(D) दिशा निर्देश
- शरतचंद्र के बर्मा (रंगून) प्रवास का वर्णन किस पर्व में किया गया है?(A) दिशाहारा(B) दिशांत(C) दिशा की खोज(D) इनमें से कोई नहीं
- शरतचंद्र का बचपन अधिकांशतः कहाँ बीता?(A) रंगून में(B) कलकत्ता में(C) भागलपुर (नाना के घर) में(D) ढाका में
- शरतचंद्र के पिता का क्या नाम था?(A) केदारनाथ चट्टोपाध्याय(B) मोतीलाल चट्टोपाध्याय(C) हरिदास चट्टोपाध्याय(D) नवीनचंद्र चट्टोपाध्याय
- शरतचंद्र की माता का क्या नाम था?(A) प्रभावती देवी(B) भुवनमोहिनी देवी(C) निरुपमा देवी(D) शांति देवी
- शरतचंद्र के नाना का क्या नाम था, जिनके कड़े अनुशासन में वे रहे?(A) केदारनाथ गांगुली(B) अघोरनाथ(C) उपेन्द्रनाथ(D) प्रमथनाथ
- शरतचंद्र ने साहित्य जगत में अपनी कई आरंभिक रचनाएँ किस छद्म नाम से प्रकाशित करवाई थीं?(A) निरुपमा देवी(B) भुवनमोहिनी(C) अनिला देवी(D) शांति देवी
- 'अनिला देवी' रिश्ते में शरतचंद्र की क्या लगती थीं?(A) माता(B) पत्नी(C) बड़ी बहन(D) बुआ
- शरतचंद्र के उस बालसखा और रिश्ते में मामा का क्या नाम था, जो उम्र में उनके लगभग बराबर था?(A) गिरीश(B) सुरेन्द्रनाथ (सुरेन)(C) राजू(D) विभूति
- शरतचंद्र के प्रसिद्ध उपन्यास 'श्रीकांत' के पात्र 'इन्द्रनाथ' का आधार उनका कौन सा साहसी मित्र था?(A) विभूति(B) राजू (राजेन्द्रनाथ) / गिरीश(C) उपेन्द्र(D) नवीनचंद्र
- रंगून (बर्मा) प्रवास के दौरान शरतचंद्र की प्रथम पत्नी कौन थीं?(A) मोक्षदा(B) शांति देवी(C) हिरण्मयी(D) कुसुम
- बर्मा में शरतचंद्र की प्रथम पत्नी (शांति देवी) और पुत्र का निधन किस महामारी से हुआ था?(A) हैजा(B) टी.बी.(C) प्लेग(D) चेचक
- शरतचंद्र की द्वितीय पत्नी का क्या नाम था, जिन्होंने आजीवन उनका साथ निभाया?(A) मोक्षदा (हिरण्मयी)(B) निरुपमा(C) कुसुम(D) अनिला
- विवाह से पूर्व शरतचंद्र की द्वितीय पत्नी का मूल नाम 'मोक्षदा' था, विवाह के बाद शरत ने उन्हें क्या नाम दिया?(A) कल्याणी(B) हिरण्मयी(C) सुहासिनी(D) वैष्णवी
- 'आवारा मसीहा' में वर्णित 'निरुपमा देवी' (नीरू) शरतचंद्र की कौन थीं?(A) कलकत्ता की प्रकाशक(B) भागलपुर की आत्मीय मित्र (बाल-विधवा)(C) उनकी मौसी(D) बर्मा की निवासिनी
- बर्मा में शरतचंद्र को साहित्य सृजन के लिए निरंतर प्रेरित करने वाले उनके घनिष्ठ मित्र कौन थे?(A) प्रमथनाथ भट्टाचार्य(B) हरिदास चट्टोपाध्याय(C) चित्तरंजन दास(D) सौरीन्द्र मोहन मुखर्जी
- शरतचंद्र की रचनाओं को कलकत्ता में छापने वाले प्रमुख प्रकाशक मित्र कौन थे?(A) सौरीन्द्र मोहन मुखर्जी(B) हरिदास चट्टोपाध्याय(C) नाथूराम प्रेमी(D) प्रमथनाथ भट्टाचार्य
- विष्णु प्रभाकर को 'आवारा मसीहा' लिखने की प्रेरणा मुख्य रूप से किनसे मिली थी?(A) प्रेमचंद और अज्ञेय(B) नाथूराम प्रेमी और यशपाल जैन(C) हजारीप्रसाद द्विवेदी(D) रामधारी सिंह दिनकर
- 'आवारा मसीहा' का अंतिम पर्व 'दिशांत' शरतचंद्र के जीवन के किस चरण से संबंधित है?(A) बचपन की घुमक्कड़ी(B) क्लर्क की नौकरी(C) बंगाल वापसी, साहित्यिक यश और अवसान(D) प्रथम विवाह
- जब शरतचंद्र पहली बार बर्मा (रंगून) गए थे, तो शुरुआत में उन्हें किसने आश्रय दिया था?(A) नवीनचंद्र(B) अघोरनाथ(C) सुरेन(D) प्रमथनाथ
- 'आवारा मसीहा' में उल्लेखित शरतचंद्र के प्रिय पालतू कुत्ते का क्या नाम था?(A) टाइगर(B) मोती(C) भेलू(D) शेरू
- "भगवान ने मुझे सब कुछ दिया, लेकिन एक चीज़ नहीं दी—स्थायित्व और सांसारिक बुद्धि।" यह कथन किसका है?(A) केदारनाथ गांगुली(B) मोतीलाल चट्टोपाध्याय(C) शरतचंद्र(D) सुरेन
- "मेरे पिता घुमक्कड़ थे और यही घुमक्कड़ी मेरे खून में बस गई है।" यह किसने कहा था?(A) शरतचंद्र(B) रवींद्रनाथ टैगोर(C) विष्णु प्रभाकर(D) अनिला देवी
- किस महान नेता के आग्रह पर शरतचंद्र ने हावड़ा ज़िला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष का पद सँभाला था?(A) महात्मा गांधी(B) जवाहरलाल नेहरू(C) देशबंधु चित्तरंजन दास(D) सुभाष चंद्र बोस
- शरतचंद्र किस युवा क्रांतिकारी नेता के विद्रोही विचारों के पक्के समर्थक और प्रशंसक थे?(A) भगत सिंह(B) सुभाष चंद्र बोस(C) चंद्रशेखर आज़ाद(D) सूर्य सेन
- "तुम्हारा साहित्य बंगाल की सीमाओं को तोड़कर पूरे भारत का साहित्य बन गया है" - यह कथन किसका है?(A) बंकिमचंद्र चटर्जी(B) विष्णु प्रभाकर(C) महात्मा गांधी(D) रवींद्रनाथ टैगोर
- शरतचंद्र ने बर्मा (रंगून) में अपनी आजीविका के लिए मुख्य रूप से क्या कार्य किया?(A) चित्रकारी(B) अध्यापन(C) क्लर्क (एकाउंटेंट) की नौकरी(D) वकालत
- 'आवारा मसीहा' विधा की दृष्टि से क्या है?(A) आत्मकथा(B) जीवनी(C) संस्मरण(D) रिपोर्ताज
- विष्णु प्रभाकर ने 'आवारा मसीहा' की भूमिका में जीवनी लिखने की सबसे बड़ी चुनौती किसे बताया है?(A) धन का अभाव(B) यात्राओं की थकान(C) शरत के जीवन से जुड़े तथ्यों और मिथकों के बीच अंतर करना(D) प्रकाशक का न मिलना
- शरतचंद्र के उपन्यासों में अधिकांशतः किस वर्ग की स्त्रियों का मर्मस्पर्शी चित्रण है?(A) राजघरानों की स्त्रियाँ(B) समाज द्वारा उपेक्षित, शोषित और बहिष्कृत स्त्रियाँ(C) विदेशी स्त्रियाँ(D) केवल शिक्षित और नौकरीपेशा स्त्रियाँ
- कलकत्ता में शरतचंद्र द्वारा छोड़ी गई पुरानी पांडुलिपियों (जैसे 'बड़ी दीदी') को सहेजने और पत्रिकाओं में छपवाने का प्रबंध किस मित्र ने किया था?(A) सौरीन्द्र मोहन मुखर्जी(B) प्रमथनाथ(C) विभूति(D) सुरेन
- "समाज के नियम उन लोगों के लिए हैं जो समाज से कुछ चाहते हैं, मुझे इस समाज से कुछ नहीं चाहिए।" यह साहसिक कथन किसका है?(A) सुभाष चंद्र बोस(B) शरतचंद्र(C) मोतीलाल(D) गिरीश
- 'दिशा की खोज' पर्व का आरंभ शरतचंद्र की किस घटना/यात्रा से होता है?(A) भागलपुर आगमन(B) साहित्य अकादमी पुरस्कार मिलना(C) कलकत्ता से रंगून (बर्मा) की यात्रा(D) मृत्यु
- शरतचंद्र को साहित्य और घुमक्कड़ी की प्रवृत्ति किससे विरासत में मिली थी?(A) नाना से(B) माता से(C) पिता से(D) मित्रों से
- भागलपुर की वह बाल-विधवा, जिससे शरत की गहरी आत्मीयता थी और जिसकी झलक उनके 'राजलक्ष्मी' जैसे पात्रों में दिखती है:(A) शांति(B) कुसुम(C) मोक्षदा(D) प्रभावती
- "मैंने जो कुछ लिखा है, वह मेरे अपने जीवन का अनुभव है, मैंने किसी से उधार नहीं लिया।" यह कथन किसका है?(A) रवींद्रनाथ टैगोर(B) विष्णु प्रभाकर(C) शरतचंद्र(D) प्रेमचंद
- शरतचंद्र ने अपने जीवन का अंतिम समय कहाँ व्यतीत किया?(A) रंगून में(B) भागलपुर में(C) बंगाल (कलकत्ता/हावड़ा) में(D) ढाका में
- शरतचंद्र की किस बहन से विष्णु प्रभाकर ने सामग्री जुटाने के लिए भेंट की थी?(A) अनिला देवी(B) सुशीला(C) विमला(D) निरुपमा
- 'आवारा मसीहा' का प्रथम पर्व (दिशाहारा) शरतचंद्र के जीवन के किस कालखंड को दर्शाता है?(A) वृद्धावस्था(B) दिशाहीन और घुमक्कड़ बचपन/किशोरावस्था(C) रंगून में नौकरी के दिन(D) राजनीतिक जीवन
- "पाप और पुण्य की परिभाषाएँ समाज ने अपनी सुविधा के लिए गढ़ी हैं..." यह विचार 'आवारा मसीहा' में किसके हैं?(A) शरतचंद्र(B) विष्णु प्रभाकर(C) देशबंधु(D) रवींद्रनाथ
- 'आवारा मसीहा' के संदर्भ में सही कथन चुनिए:(A) यह केवल साहित्यिक आलोचना है।(B) यह बंकिमचंद्र के जीवन पर आधारित है।(C) इसमें शरतचंद्र के घुमक्कड़ स्वभाव और करुणा से भरे व्यक्तित्व का चित्रण है।(D) यह एक काल्पनिक उपन्यास है।
- विष्णु प्रभाकर ने प्रामाणिक सामग्री जुटाने के लिए भारत के बाहर किस देश की यात्रा की थी?(A) नेपाल(B) श्रीलंका(C) इंग्लैंड(D) म्यांमार (बर्मा)
- "वह मृत्यु को भी उसी सहजता और निडरता से गले लगाना चाहता था, जैसे उसने जीवन की अनंत कठिनाइयों को लगाया था।" यह कथन किसके लिए है?(A) मोतीलाल के लिए(B) शरतचंद्र के लिए(C) चित्तरंजन दास के लिए(D) गिरीश के लिए
- 'आवारा मसीहा' शीर्षक में 'मसीहा' शब्द किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?(A) विष्णु प्रभाकर(B) शरतचंद्र चट्टोपाध्याय(C) ईश्वर(D) रवींद्रनाथ टैगोर
उत्तर तालिका (Answer Key)
- (C) शरतचंद्र चट्टोपाध्याय
- (B) विष्णु प्रभाकर
- (B) 1974
- (C) 14 वर्ष
- (B) तीन
- (C) दिशाहीन
- (B) दिशाहारा
- (C) दिशा की खोज
- (C) भागलपुर (नाना के घर) में
- (B) मोतीलाल चट्टोपाध्याय
- (B) भुवनमोहिनी देवी
- (A) केदारनाथ गांगुली
- (C) अनिला देवी
- (C) बड़ी बहन
- (B) सुरेन्द्रनाथ (सुरेन)
- (B) राजू (राजेन्द्रनाथ) / गिरीश
- (B) शांति देवी
- (C) प्लेग
- (A) मोक्षदा (हिरण्मयी)
- (B) हिरण्मयी
- (B) भागलपुर की आत्मीय मित्र (बाल-विधवा)
- (A) प्रमथनाथ भट्टाचार्य
- (B) हरिदास चट्टोपाध्याय
- (B) नाथूराम प्रेमी और यशपाल जैन
- (C) बंगाल वापसी, साहित्यिक यश और अवसान
- (A) नवीनचंद्र
- (C) भेलू
- (B) मोतीलाल चट्टोपाध्याय
- (A) शरतचंद्र
- (C) देशबंधु चित्तरंजन दास
- (B) सुभाष चंद्र बोस
- (D) रवींद्रनाथ टैगोर
- (C) क्लर्क (एकाउंटेंट) की नौकरी
- (B) जीवनी
- (C) शरत के जीवन से जुड़े तथ्यों और मिथकों के बीच अंतर करना
- (B) समाज द्वारा उपेक्षित, शोषित और बहिष्कृत स्त्रियाँ
- (A) सौरीन्द्र मोहन मुखर्जी
- (B) शरतचंद्र
- (C) कलकत्ता से रंगून (बर्मा) की यात्रा
- (C) पिता से
- (B) कुसुम
- (C) शरतचंद्र
- (C) बंगाल (कलकत्ता/हावड़ा) में
- (A) अनिला देवी
- (B) दिशाहीन और घुमक्कड़ बचपन/किशोरावस्था
- (A) शरतचंद्र
- (C) इसमें शरतचंद्र के घुमक्कड़ स्वभाव और करुणा से भरे व्यक्तित्व का चित्रण है।
- (D) म्यांमार (बर्मा)
- (B) शरतचंद्र के लिए
- (B) शरतचंद्र चट्टोपाध्याय
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