निराला के प्रति- केदारनाथ अग्रवाल
मानव-अपमान के
हलाहल को पान किया,
नीचे रह,
ऊँची कर
कविता को मान दिया।
जीवन में
गंध-गान-
छंद प्रवहमान किया;
तुमने स्वर लहरदार
जन-मन में तान दिया।।
पत्थर को तोड़ रही
नारी के साथ जिए;
मैंहगू के साथ रहे
मैंहगू का हाथ लिए।
खेतों को हँसिया से
काटते किसान बने;
मोरों के पंख खोल
नाचते विहान बने।।
27-2-1957, 11 बजे दिन : 2 घंटे में
केदारनाथ अग्रवाल द्वारा रचित कविता "निराला के प्रति" हिंदी साहित्य के महान कवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' को समर्पित एक भावपूर्ण श्रद्धांजलि है। इसमें निराला जी के संघर्षमय व्यक्तिगत जीवन, उनकी महान काव्य-साधना और शोषित वर्ग (मज़दूरों-किसानों) के प्रति उनके गहरे जुड़ाव का वर्णन किया गया है।
प्रथम पद्यांश का अर्थ:
कवि कहते हैं कि निराला जी ने जीवन भर समाज की उपेक्षाओं, तानों और 'मानव-अपमान' रूपी ज़हर (हलाहल) को शिव की तरह पिया। उन्होंने स्वयं अत्यंत अभावों और ग़रीबी (नीचे रह) में जीवन बिताया, लेकिन अपनी रचनाओं से हिंदी कविता का स्तर बहुत ऊँचा कर दिया और उसे असीम सम्मान दिलाया। उन्होंने जीवन में गीत, छंद और नव-चेतना की ऐसी रसधारा प्रवाहित की, जिसने जन-सामान्य के मन में उत्साह और जागृति के नए स्वर भर दिए।
द्वितीय पद्यांश का अर्थ:
यह पद्यांश निराला जी की यथार्थवादी और प्रगतिशील सोच को दर्शाता है। इसमें निराला जी की प्रसिद्ध कविताओं (जैसे 'वह तोड़ती पत्थर' और 'महँगू महँगा रहा') का संदर्भ है:
- मज़दूरों से जुड़ाव: कवि कहते हैं कि निराला जी ने केवल कविताएँ नहीं लिखीं, बल्कि चिलचिलाती धूप में पत्थर तोड़ती मज़दूरनी के दर्द को अपने भीतर जिया। उन्होंने हमेशा शोषित और आम आदमी (मैंहगू) का हाथ थामा।
- किसानों से एकाकार: वे खेतों में हँसिया चलाने वाले साधारण किसान की पीड़ा और पसीने से इस कदर जुड़े कि उनकी आवाज़ बन गए।
- नया सवेरा: अपने इस ज़मीनी जुड़ाव और विद्रोही साहित्य के माध्यम से निराला जी समाज के लिए एक ऐसे खूबसूरत और नए सवेरे (विहान) बन गए, जो मोर के पंख पसार कर नाचने के समान उल्लास और उम्मीद से भरा है।
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