भीष्म साहनी द्वारा रचित 'तमस' हिंदी साहित्य का एक कालजयी उपन्यास है। यह 1947 के विभाजन की त्रासदी और सांप्रदायिक दंगों की पृष्ठभूमि पर लिखा गया है।
यहाँ इस उपन्यास का संक्षिप्त सारांश दिया गया है:
उपन्यास की मुख्य कथावस्तु
'तमस' (जिसका अर्थ है 'अँधेरा') केवल 5 दिनों की कहानी को समेटे हुए है, लेकिन यह उन पाँच दिनों में मानवीय क्रूरता, अज्ञानता और राजनीति के भयावह चेहरे को उजागर करता है।
1. दंगे की शुरुआत
उपन्यास की शुरुआत नत्थू नाम के एक चमार से होती है, जिसे एक स्थानीय नेता (मुराद अली) बहला-फुसलाकर एक सुअर मारने के लिए पाँच रुपये देता है। नत्थू को यह नहीं पता होता कि इसका इस्तेमाल दंगा भड़काने के लिए किया जाएगा। अगली सुबह उस सुअर की लाश मस्जिद की सीढ़ियों पर मिलती है, जिससे शहर में तनाव फैल जाता है और हिंदू-मुस्लिम दंगे शुरू हो जाते हैं।
2. राजनीति और प्रशासन की भूमिका
साहनी जी ने दिखाया है कि कैसे ऊंचे पदों पर बैठे लोग और राजनीतिक दल अपनी रोटियां सेकने के लिए आम जनता को ढाल बनाते हैं।
अंग्रेज सरकार: जिले का डिप्टी कमिश्नर 'रिचर्ड' सब कुछ जानते हुए भी दंगों को रोकने की कोशिश नहीं करता, क्योंकि 'बांटो और राज करो' की नीति उनके हित में थी।
स्थानीय नेता: दोनों पक्षों के कट्टरपंथी नेता आग में घी डालने का काम करते हैं, जबकि गरीब जनता एक-दूसरे के खून की प्यासी हो जाती है।
3. मानवीय त्रासदी और विस्थापन
उपन्यास का दूसरा हिस्सा गांवों की ओर मुड़ता है। यहाँ दंगों की विभीषिका और भी भयानक है:
सिक्खों का बलिदान: एक गुरुद्वारे में शरण लिए हुए सिक्ख अपनी मर्यादा बचाने के लिए संघर्ष करते हैं। यहाँ महिलाओं द्वारा कुएं में कूदकर जान देने (जौहर) का हृदयविदारक वर्णन है।
सांप्रदायिक पागलपन: पड़ोसी जो सालों से साथ रहते थे, एक-दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं। हालांकि, इसी अंधेरे के बीच 'हरनाम सिंह' और उसकी पत्नी जैसे पात्र भी हैं जिन्हें एक मुस्लिम परिवार शरण देकर इंसानियत की उम्मीद जगाता है।
4. अंत: शांति या केवल एक विराम?
अंत में जब सेना आती है, तो दंगे रुक जाते हैं। शांति मार्च निकाला जाता है, लेकिन यह शांति खोखली है। जिन लोगों ने दंगे भड़काए थे, वे ही अब 'शांति के मसीहा' बनकर मंच पर बैठे हैं। नत्थू, जो अनजाने में इस आग का कारण बना था, आत्मग्लानि और हिंसा की भेंट चढ़ जाता है।
मुख्य निष्कर्ष (Key Themes)
अज्ञानता का अंधकार: सामान्य जनता धर्म के नाम पर अंधभक्त होकर बिना सोचे-समझे हिंसा पर उतारू हो जाती है।
विभाजन की पीड़ा: यह केवल देश का बँटवारा नहीं, बल्कि दिलों और मानवीय संवेदनाओं का बँटवारा था।
सत्ता का स्वार्थ: दंगे कभी अचानक नहीं होते, वे सुनियोजित होते हैं।
विशेष: 1975 में इस उपन्यास के लिए भीष्म साहनी को साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था और इस पर गोविंद निहलानी ने एक बेहद चर्चित फिल्म/धारावाहिक भी बनाया है।
'तमस' उपन्यास के पात्र समाज के अलग-अलग वर्गों का प्रतिनिधित्व करते हैं। भीष्म साहनी ने इन पात्रों के माध्यम से यह दिखाया है कि दंगे कैसे शुरू किए जाते हैं, उन्हें कौन संचालित करता है और उनका शिकार कौन होता है।
यहाँ प्रमुख पात्रों का संक्षिप्त चरित्र-चित्रण दिया गया है:
1. नत्थू (आम आदमी और शिकार)
नत्थू इस उपन्यास का सबसे महत्वपूर्ण और त्रासदीपूर्ण पात्र है। वह एक गरीब चमार है जो राजनीति से कोसों दूर है।
भोलापन: वह मुराद अली के बहकावे में आकर महज पाँच रुपये के लिए सुअर मार देता है। उसे अंदाजा भी नहीं होता कि उसका यह छोटा सा काम पूरे शहर को जला देगा।
आत्मग्लानि (Guilt): जब उसे पता चलता है कि मस्जिद के सामने मिला सुअर वही है जिसे उसने मारा था, तो वह भीतर तक टूट जाता है। वह अंत तक डर और पछतावे में जीता है।
प्रतीक: नत्थू उस आम आदमी का प्रतीक है जिसे सत्ता और चालाक लोग मोहरे की तरह इस्तेमाल करते हैं।
2. रिचर्ड (ब्रिटिश शासक / राजनीति)
रिचर्ड जिले का डिप्टी कमिश्नर है और ब्रिटिश हुकूमत का चेहरा है।
बुद्धिजीवी पर क्रूर: वह कला और इतिहास का शौकीन है, लेकिन प्रशासनिक रूप से बेहद ठंडा और निर्मम है।
कूटनीति: वह जानता है कि शहर में दंगे होने वाले हैं, लेकिन वह उन्हें रोकता नहीं है। उसका मानना है कि जब तक भारतीय आपस में लड़ेंगे, अंग्रेज राज सुरक्षित रहेगा।
प्रतीक: वह 'बांटो और राज करो' (Divide and Rule) की नीति का जीता-जागता उदाहरण है।
3. मुराद अली (साजिशकर्ता)
मुराद अली वह व्यक्ति है जो पर्दे के पीछे रहकर दंगों की योजना बनाता है।
चालाकी: वह नत्थू जैसे गरीब लोगों का इस्तेमाल करता है ताकि उसके हाथ गंदे न हों। वह ऊपर से प्रशासन का वफादार दिखता है लेकिन भीतर से सांप्रदायिक आग भड़काता है।
स्वार्थ: उसका मुख्य उद्देश्य सत्ता में अपनी पकड़ बनाए रखना और अपने राजनीतिक हितों को साधने के लिए धार्मिक भावनाओं का फायदा उठाना है।
4. हरनाम सिंह और बंतो (मानवीय संवेदना)
ये पात्र उपन्यास के दूसरे हिस्से (ग्रामीण परिवेश) में आते हैं।
सहनशीलता: दंगों के दौरान इनका सब कुछ छिन जाता है, फिर भी ये अपनी इंसानियत नहीं खोते।
सांप्रदायिक सद्भाव: जब कट्टरता चरम पर होती है, तब एक मुस्लिम परिवार (एहसान अली) इन्हें अपने घर में पनाह देता है। ये पात्र दिखाते हैं कि नफरत के दौर में भी प्रेम और जुड़ाव जीवित रह सकता है।
पात्रों के बीच का तुलनात्मक ढांचा
| पात्र | वर्ग/भूमिका | मुख्य विशेषता |
| नत्थू | शोषित वर्ग | अनजाने में अपराध करने वाला मोहरा |
| रिचर्ड | शासक वर्ग | चतुर, तटस्थ और स्वार्थी प्रशासक |
| मुराद अली | बिचौलिया/नेता | दंगों का मास्टरमाइंड |
| बख्शी जी | कांग्रेस कार्यकर्ता | आदर्शवादी लेकिन दंगों के सामने असहाय |
निष्कर्ष:
भीष्म साहनी ने इन पात्रों के जरिए यह संदेश दिया है कि दंगे नफरत से ज्यादा स्वार्थ और सत्ता की भूख के कारण होते हैं।
'तमस' उपन्यास में दो दृश्य ऐसे हैं जो पाठक की आत्मा को झकझोर कर रख देते हैं। ये दृश्य केवल हिंसा नहीं, बल्कि उस समय के मनोवैज्ञानिक दबाव और बेबसी को भी दर्शाते हैं।
यहाँ उन दो प्रमुख दृश्यों का विवरण दिया गया है:
1. महिलाओं का कुएं में कूदना (सामूहिक आत्म-बलिदान)
यह उपन्यास का सबसे मार्मिक और रोंगटे खड़े कर देने वाला दृश्य है। यह ग्रामीण क्षेत्र (सैय्यदपुर गांव) की घटना है।
परिस्थिति: जब गांव पर हमला होता है और सिक्ख पुरुषों को लगता है कि वे अब हार जाएंगे, तब महिलाओं के सामने अपनी मर्यादा (अस्मत) बचाने की चुनौती आती है।
दृश्य: गुरुद्वारे के पास स्थित कुएं पर महिलाएं जमा होती हैं। एक-एक करके महिलाएं 'जो बोले सो निहाल' के जयकारे के साथ कुएं में कूदने लगती हैं।
भाव: साहनी जी ने यहाँ दिखाया है कि युद्ध और दंगों की सबसे बड़ी कीमत महिलाओं को चुकानी पड़ती है। यह दृश्य वीरता से ज्यादा उस भयानक डर को दर्शाता है जो सांप्रदायिकता पैदा करती है। यहाँ तक कि एक माँ अपनी गोद के बच्चे के साथ कुएं में कूद जाती है।
2. नत्थू की मृत्यु और आत्मग्लानि
नत्थू का अंत इस उपन्यास की सबसे बड़ी 'ट्रैजेडी' है।
मानसिक द्वंद्व: सुअर मारने के बाद जब नत्थू शहर में आग और खून-खराबा देखता है, तो वह भीतर ही भीतर मर जाता है। वह बीमार पड़ जाता है और उसे हर जगह वही सुअर और चीखें सुनाई देती हैं।
मृत्यु: वह किसी दंगे में नहीं मारा जाता, बल्कि वह अपनी ग्लानि (Guilt) और बीमारी के बोझ से दम तोड़ देता है।
विडंबना: जिस नत्थू ने अनजाने में दंगे की चिंगारी सुलगाई थी, उसका अंत गुमनामी में होता है। उसके मरने के बाद भी किसी को पता नहीं चलता कि इस पूरी आग के पीछे असल में वह निर्दोष मोहरा था।
3. शांति मार्च का दृश्य (व्यंग्य)
उपन्यास के अंत में जब दंगे शांत हो जाते हैं, तो एक हवाई जहाज आसमान से शांति के पर्चे गिराता है।
राजनीतिक पाखंड: शहर के वही नेता (हिंदू, मुस्लिम और सिक्ख), जो कुछ समय पहले एक-दूसरे के खिलाफ जहर उगल रहे थे, अब एक ही गाड़ी में बैठकर 'शांति मार्च' निकाल रहे हैं।
लेखक का संदेश: भीष्म साहनी यहाँ कड़ा व्यंग्य करते हैं कि आम जनता तो मर गई, घर जल गए, लेकिन राजनीति करने वाले लोग फिर से दोस्त बन गए और सत्ता की मलाई खाने को तैयार हैं।
इन दृश्यों का महत्व
कुएं वाला दृश्य धार्मिक कट्टरता के भयावह परिणाम दिखाता है।
नत्थू का अंत दिखाता है कि दंगे का 'असली शिकार' हमेशा गरीब आदमी ही होता है।
शांति मार्च राजनीति के दोगलेपन को उजागर करता है।
'तमस' उपन्यास का शीर्षक और इसका उद्देश्य दोनों ही एक-दूसरे से गहरे जुड़े हुए हैं। भीष्म साहनी ने बहुत सोच-समझकर इस कृति का नाम 'तमस' रखा था।
1. शीर्षक 'तमस' की सार्थकता
'तमस' एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है— अंधकार (Darkness)। यह शीर्षक कई स्तरों पर उपन्यास की व्याख्या करता है:
अज्ञानता का अंधेरा: उपन्यास में दिखाया गया है कि आम जनता अज्ञानता के अंधेरे में डूबी हुई है। वे नहीं जानते कि उन्हें कौन और क्यों लड़वा रहा है। वे बस सुनी-सुनाई बातों पर यकीन कर एक-दूसरे का खून बहाने लगते हैं।
मानवीय संवेदनाओं का लोप: दंगे के दौरान इंसान के अंदर की करुणा और दया मर जाती है और वह पशु बन जाता है। यह 'विवेकहीनता' का अंधेरा है।
भविष्य का अंधेरा: विभाजन के समय जो नफरत पैदा हुई, उसने आने वाली पीढ़ियों के बीच भी एक धुंधला और अंधेरा भविष्य पैदा कर दिया।
राजनीति का काला चेहरा: पर्दे के पीछे जो साजिशें रची गईं, वे काली और अंधकारमय थीं।
2. उपन्यास का मुख्य उद्देश्य
भीष्म साहनी ने 'तमस' केवल इतिहास बताने के लिए नहीं, बल्कि समाज को आइना दिखाने के लिए लिखा था। इसके मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं:
क. सांप्रदायिकता के असली चेहरे को बेनकाब करना
लेखक यह स्पष्ट करना चाहते थे कि दंगे कभी अपने आप नहीं होते, वे 'कराए जाते' हैं। इसके पीछे धर्म नहीं, बल्कि सत्ता और राजनीति का लालच होता है।
ख. ब्रिटिश कूटनीति का पर्दाफाश
उपन्यास का एक बड़ा उद्देश्य यह दिखाना था कि अंग्रेज सरकार ने कैसे 'फूट डालो और राज करो' की नीति का उपयोग किया। रिचर्ड जैसा पात्र यह दिखाता है कि प्रशासन चाहता तो दंगों को एक घंटे में रोक सकता था, लेकिन उन्होंने इसे बढ़ने दिया।
ग. आम आदमी की त्रासदी को दिखाना
साहनी जी का उद्देश्य यह बताना था कि दंगों में मरता हमेशा नत्थू जैसा गरीब ही है। अमीर और बड़े नेता तो बाद में फिर से एक साथ बैठकर चाय पीते हैं और समझौते कर लेते हैं।
घ. मानवीयता की तलाश
इतने अंधकार के बीच भी लेखक ने 'हरनाम सिंह' और 'एहसान अली' जैसे पात्रों के जरिए यह संदेश दिया है कि मानवता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। विपरीत परिस्थितियों में भी इंसानियत को बचाए रखना ही सबसे बड़ी जीत है।
निष्कर्ष
'तमस' का संदेश स्पष्ट है: "जब तक समाज अज्ञानता और कट्टरता के अंधेरे (तमस) में रहेगा, तब तक नत्थू जैसे निर्दोष लोग कुर्बान होते रहेंगे और मुराद अली जैसे लोग राज करते रहेंगे।"
भीष्म साहनी की भाषा-शैली की सबसे बड़ी विशेषता उसकी सरलता और स्वाभाविकता है। उन्होंने 'तमस' में जटिल साहित्यिक शब्दों के बजाय उस भाषा का प्रयोग किया है, जो पाठक के दिल को सीधे छूती है।
यहाँ 'तमस' की भाषा-शैली के मुख्य बिंदु दिए गए हैं:
1. सहज और प्रभावशाली भाषा
साहनी जी ने खड़ी बोली हिंदी का प्रयोग किया है, लेकिन इसमें बनावटीपन बिल्कुल नहीं है। उनकी भाषा में एक तरह का 'ठहराव' है, जो दंगों जैसी हिंसक घटनाओं को भी बहुत गहराई से व्यक्त करता है।
2. उर्दू, पंजाबी और अंग्रेजी का मिश्रण
चूंकि उपन्यास पंजाब की पृष्ठभूमि पर आधारित है, इसलिए इसकी भाषा में उस क्षेत्र की मिट्टी की महक है:
उर्दू-शब्द: मुराद अली और प्रशासन के संवादों में 'तहजीब', 'वक्त', 'मजहब' जैसे शब्दों का सुंदर प्रयोग है।
पंजाबी पुट: ग्रामीण परिवेश और सिक्ख पात्रों (जैसे हरनाम सिंह) की बातचीत में पंजाबी शब्दों का लहजा मिलता है, जो कहानी को यथार्थवादी (Realistic) बनाता है।
अंग्रेजी: रिचर्ड और लिजा के संवादों में अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग तत्कालीन प्रशासनिक माहौल को दर्शाता है।
3. वर्णनात्मक शैली (Descriptive Style)
साहनी जी किसी भी दृश्य का चित्रण इस तरह करते हैं जैसे वह पाठक की आँखों के सामने घटित हो रहा हो।
उदाहरण: नत्थू द्वारा सुअर मारने वाला दृश्य या कुएं में कूदती महिलाओं का दृश्य इतना सजीव है कि पाठक सिहर उठता है।
4. प्रतीकात्मकता और बिम्ब (Imagery and Symbolism)
उपन्यास में प्रतीकों का बहुत गहरा अर्थ है:
'तमस' (अंधकार): खुद एक बहुत बड़ा प्रतीक है जो अज्ञानता और क्रूरता को दर्शाता है।
मरा हुआ सुअर: यह केवल एक जानवर नहीं, बल्कि नफरत की उस चिंगारी का प्रतीक है जो पूरे शहर को जला देती है।
चील और गिद्ध: दंगों के बाद आकाश में उड़ते पक्षी समाज की सड़न और मौत के प्रतीक के रूप में दिखाए गए हैं।
5. व्यंग्यात्मक शैली (Satirical Tone)
लेखक ने राजनीति और प्रशासन पर तीखा प्रहार करने के लिए व्यंग्य का सहारा लिया है।
जब शहर जल रहा होता है और डिप्टी कमिश्नर रिचर्ड अपनी पत्नी लिजा को ऐतिहासिक पेंटिंग्स दिखा रहा होता है, तो वह दृश्य प्रशासन की संवेदनहीनता पर सबसे बड़ा व्यंग्य है।
संक्षेप में:
'तमस' की शैली "यथार्थवादी" (Realistic) है। लेखक ने अपनी ओर से बहुत ज्यादा टिप्पणी करने के बजाय दृश्यों और पात्रों को इस तरह पेश किया है कि वे खुद अपनी कहानी कहें। उनकी भाषा 'चिल्लाती' नहीं है, बल्कि एक गहरी 'खामोशी' के जरिए दंगों का दर्द बयां करती है।
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