प्रशासनिक और कार्यालयी कामकाज में टिप्पण (Noting) एक रीढ़ की हड्डी की तरह कार्य करता है। जब किसी विचाराधीन पत्र या फाइल पर निर्णय लेने के लिए उसके इतिहास, तथ्यों और संबंधित नियमों का विवरण देते हुए जो सुझाव दिए जाते हैं, उसे टिप्पण कहते हैं।

टिप्पण की उपयोगिता को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:

1. निर्णय प्रक्रिया में सुगमता (Ease of Decision Making)

किसी भी सरकारी या निजी संस्थान में अधिकारी के पास इतना समय नहीं होता कि वह पूरी फाइल को शुरू से अंत तक पढ़े। टिप्पण के माध्यम से फाइल का सारांश और मुख्य बिंदु सामने रख दिए जाते हैं, जिससे उच्चाधिकारी को निर्णय लेने में आसानी होती है।

2. समय की बचत (Time Saving)

टिप्पण में मामले से संबंधित पूर्व संदर्भों (Previous References) और नियमों का उल्लेख पहले से ही कर दिया जाता है। इससे अधिकारी को बार-बार पुरानी फाइलें नहीं खोजनी पड़तीं और कार्य त्वरित गति से संपन्न होता है।

3. उत्तरदायित्व का निर्धारण (Fixing Accountability)

टिप्पण प्रक्रिया में प्रत्येक लिपिक (Clerk) और अधिकारी अपने सुझावों पर हस्ताक्षर करता है। इससे यह स्पष्ट रहता है कि किसी निर्णय के पीछे किस व्यक्ति का क्या तर्क था। भविष्य में किसी गड़बड़ी की स्थिति में जवाबदेही तय करना आसान हो जाता है।

4. नीतिगत स्पष्टता और निरंतरता (Consistency in Policy)

टिप्पण के माध्यम से यह पता चलता है कि अतीत में इसी तरह के मामलों में क्या निर्णय लिए गए थे। इससे कार्यप्रणाली में एकरूपता बनी रहती है और पक्षपात या भेदभाव की संभावना कम हो जाती है।

5. वैधानिक और अभिलेखीय महत्व (Legal and Record Value)

  • स्थायी रिकॉर्ड: टिप्पण फाइल का एक स्थायी हिस्सा बन जाता है, जो भविष्य में प्रमाण के रूप में कार्य करता है।

  • सूचना का अधिकार (RTI): वर्तमान समय में टिप्पणियाँ पारदर्शी शासन के लिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि RTI के तहत किसी निर्णय के पीछे के तर्कों को जाना जा सकता है।


टिप्पण के प्रमुख गुण (विशेषताएँ)

एक उपयोगी टिप्पण में ये बातें होनी चाहिए:

  • संक्षिप्तता: अनावश्यक विस्तार से बचना चाहिए।

  • स्पष्टता: भाषा सरल और स्पष्ट होनी चाहिए ताकि भ्रम न हो।

  • तटस्थता: लेखक को व्यक्तिगत राय के बजाय तथ्यों और नियमों पर जोर देना चाहिए।

  • क्रमबद्धता: विचारों का प्रवाह तार्किक और क्रमवार होना चाहिए।


निष्कर्ष:

संक्षेप में, टिप्पण कार्यालयी कार्यवाही का वह दर्पण है जो किसी समस्या के समाधान का मार्ग प्रशस्त करता है। यह न केवल प्रशासन को गति प्रदान करता है, बल्कि उसे अनुशासित और तर्कसंगत भी बनाता है।

क्या आप टिप्पण के किसी विशिष्ट प्रकार (जैसे 'अनुषंगिक टिप्पण' या 'मुख्य टिप्पण') के बारे में विस्तार से जानना चाहेंगे?

मलवे का मालिक (कहानी)- मोहन राकेश,

 लेखक : मोहन राकेश

पूरे साढ़े सात साल के बाद लाहौर से अमृतसर आए थे. हॉकी का मैच देखने का तो बहाना ही था, उन्हें ज़्यादा चाव उन घरों और बाज़ारों को फिर से देखने का था, जो साढ़े सात साल पहले उनके लिए पराए हो गए थे. हर सड़क पर मुसलमानों की कोई न कोई टोली घूमती नज़र आ जाती थी. उनकी आंखें इस आग्रह के साथ वहां की हर चीज़ को देख रही थीं, जैसे वह शहर साधारण शहर न होकर एक ख़ास आकर्षण का केन्द्र हो।

तंग बाज़ारों में से गुज़रते हुए वे एक-दूसरे को पुरानी चीज़ों की याद दिला रहे थे-देख, फतहदीना, मिसरी बाज़ार में अब मिसरी की दुकानें पहले से कितनी कम रह गई हैं. उस नुक्कड़ पर सुक्खी भठियारन की भट्ठी थी, जहां अब वह पान वाला बैठा है. यह नमक मण्डी देख लो, ख़ान साहब! यहां की एक-एक ललाइन वह नमकीन होती है कि बस!

बहुत दिनों के बाद बाज़ारों में तुर्रेदार पगड़ियां और लाल तुर्की टोपियां दिखाई दे रही थीं. लाहौर से आए हुए मुसलमानों में काफ़ी संख्या ऐसे लोगों की थी, जिन्हें विभाजन के समय मजबूर होकर अमृतसर छोड़कर जाना पड़ा था. साढ़े सात साल में आए अनिवार्य परिवर्तनों को देखकर कहीं उनकी आंखों में हैरानी भर जाती और कहीं अफ़सोस घिर आता-वल्लाह, कटड़ा जयमलसिंह इतना चौड़ा कैसे हो गया? क्या इस तरफ़ के सबके सब मकान जल गए? यहां हकीम आसिफ़ अली की दुकान थी न? अब यहां एक मोची ने कब्ज़ा कर रखा है।

और कहीं-कहीं ऐसे भी वाक्य सुनाई दे जाते-वली, यह मस्जिद ज्यों की त्यों खड़ी है? इन लोगों ने इसका गुरूद्वारा नहीं बना दिया?

जिस रास्ते से भी पाकिस्तानियों की टोली गुज़रती, शहर के लोग उत्सुकतापूर्वक उसकी ओर देखते रहते. कुछ लोग अब भी मुसलमानों को आते देखकर शंकित-से रास्ते हट जाते थे, जबकि दूसरे आगे बढ़कर उनसे बगलगीर होने लगते थे. ज़्यादातर वे आगन्तुकों से ऐसे-ऐसे सवाल पूछते थे कि आजकल लाहौर का क्या हाल है? अनारकली में अब पहले जितनी रौनक होती है या नहीं? सुना है, शाहालमी गेट का बाज़ार पूरा नया बना है? कृष्ण नगर में तो कोई ख़ास तब्दीली नहीं आई? वहां का रिश्वतपुरा क्या वाक़ई रिश्वत के पैसे से बना है? कहते हैं पाकिस्तान में अब बुर्का बिल्कुल उड़ गया है, यह ठीक है? इन सवालों में इतनी आत्मीयता झलकती थी कि लगता था कि लाहौर एक शहर नहीं, हज़ारों लोगों का सगा-सम्बन्धी है, जिसके हालात जानने के लिए वे उत्सुक हैं. लाहौर से आए हुए लोग उस दिन शहर-भर के मेहमान थे, जिनसे मिलकर और बातें करके लोगों को खामखाह ख़ुशी का अनुभव होता था।

बाज़ार बांसा अमृतसर का एक उपेक्षित-सा बाज़ार है, जो विभाजन से पहले ग़रीब मुसलमानों की बस्ती थी. वहां ज़्यादातर बांस और शहतीरों की ही दुकानें थीं, जो सबकी सब एक ही आग में जल गई थीं. बाज़ार बांसा की आग अमृतसर की सबसे भयानक आग थी, जिससे कुछ देर के लिए तो सारे शहर के जल जाने का अन्देशा पैदा हो गया था. बाज़ार बांसा के आसपास के कई मुहल्लों को तो उस आग ने अपनी लपेट में ले ही लिया था. ख़ैर, किसी तरह वह आग क़ाबू में आ तो गई, पर उसमें मुसलमानों के एक-एक घर के साथ हिन्दुओं के भी चार-चार, छह-छह घर जलकर राख हो गए. अब साढ़े सात साल में उनमें से कई इमारतें तो फिर से खड़ी हो गई थीं, मगर जगह-जगह मलबे के ढेर अब भी मौजूद थे. नई इमारतों के बीच-बीच में मलबे के ढेर अजीब ही वातावरण प्रस्तुत करते थे।

बाज़ार बांसा में उस दिन भी चहल-पहल नहीं थी, क्योंकि उस बाज़ार के ज़्यादातर बाशिन्दे तो अपने मकानों के साथ ही-शहीद हो गए थे और जो बचकर चले गए थे, उनमें शायद लौटकर आने की हिम्मत बाक़ी नहीं रही थी. सिर्फ़ एक दुबला-पतला बूढ़ा मुसलमान ही उस वीरान बाज़ार में आया और वहां की नई और जली हुई इमारतों को देखकर जैसे भूल-भुलैया में पड़ गया. बाएं हाथ को जाने वाली गली के पास पहुंचकर उसके क़दम अन्दर मुड़ने को हुए, मगर फिर वह हिचकिचाकर वहां बाहर ही खड़ा रह गया, जैसे उसे निश्चय नहीं हुआ कि वह वही गली है या नहीं, जिसमें वह जाना चाहता है. गली में एक तरफ़ कुछ बच्चे कीड़ी-काड़ा खेल रहे थे और कुछ अन्तर पर दो स्त्रियां ऊंची आवाज़ में चीख़ती हुई एक-दूसरी को गालियां दे रही थीं।

‘सब कुछ बदल गया, मगर बोलियां नहीं बदलीं!’ बुड्ढे मुसलमान ने धीमे स्वर में अपने से कहा और छड़ी का सहारा लिए खड़ा रहा. उसके घुटने पाजामे से बाहर को निकल रहे थे और घुटनों के थोड़ा ऊपर ही उसकी शेरवानी में तीन-चार पैबन्द लगे थे. गली में एक बच्चा रोता हुआ बाहर को आ रहा था. उसने उसे पुचकार कर पुकारा,‘इधर आ, बेटे, आ इधर! देख तुझे चिज्जी देंगे, आ,’ और वह अपनी जेब में हाथ डालकर उसे देने के लिए कोई चीज़ ढूंढ़ने लगा. बच्चा क्षण भर के लिए चुप कर गया, लेकिन फिर उसने होंठ बिसूर लिए और रोने लगा. एक सोलह-सत्रह बरस की लड़की गली के अन्दर से दौड़ती हुई आई और बच्चे की बांह पकड़कर उसे घसीटती हुई गली में ले चली. बच्चा रोने के साथ-साथ अपनी बांह छुड़ाने के लिए मचलने लगा. लड़की ने उसे बांहों में उठा कर अपने साथ चिपका लिया और उसका मुंह चूमती हुई बोली,‘चुप कर, मेरा वीर! रोएगा तो तुझे वह मुसलमान पकड़ कर ले जाएगा, मैं वारी जाऊं, चुप कर!’

बुड्ढे मुसलमान ने बच्चे को देने के लिए जो पैसा निकाला था, वह वापस जेब में रख लिया. सिर से टोपी उतारकर उसने वहां थोड़ा खुजलाया और टोपी बगल में दबा ली. उसका गला ख़ुश्क हो रहा था और घुटने ज़रा-ज़रा कांप रहे थे. उसने गली के बाहर की बन्द दुकान के तख़्ते का सहारा ले लिया और टोपी फिर से सिर पर लगा ली. गली के सामने जहां पहले ऊंची-ऊंची शहतीरियां रखी रहती थीं, वहां अब एक तिमंज़िला मकान खड़ा था. सामने बिजली के तार पर दो मोटी-मोटी चीलें बिल्कुल जड़ होकर बैठी थीं. बिजली के खम्भे के पास थोड़ी धूप थी. वह कई पल धूप में उड़ते हुए ज़र्रों को देखता रहा. फिर उसके मुंह से निकला,‘या मालिक!’

एक नवयुवक चाबियों का गुच्छा घुमाता हुआ गली की ओर आया ओर बुड्ढे को वहां खड़े देखकर उसने रूककर पूछा,‘कहिए मियां जी, यहां किस तरह खड़े हैं?’

बुड्ढ़े मुसलमान की छाती और बांहों में हल्की-सी कंपकंपी हुई और उसने होंठों पर जबान फेरकर नवयुवक को ध्यान से देखते हुए पूछा,‘बेटे, तेरा नाम मनोरी तो नहीं है?’

नवयुवक ने चाबियों का गुच्छा हिलाना बन्द करके मुट्ठी में ले लिया और आश्चर्य के साथ पूछा,‘आपको मेरा नाम कैसे पता है?’
‘साढ़े सात साल पहले तू बेटे, इतना-सा था.’यह कहकर बुड्ढे ने मुस्कराने की कोशिश की।

‘आप आज पाकिस्तान से आए हैं?’ मनोरी ने पूछा।

‘हां, मगर पहले हम इसी गली में रहते थे,’ बुड्ढे ने कहा,‘मेरा लड़का चिराग़दीन तुम लोगों का दर्ज़ी था. तक़सीम से छह महीने पहले हम लोगों ने यहां अपना नया मकान बनाया था।

‘ओ, गनी मियां.’ मनोरी ने पहचान कर कहा।

‘हां, बेटे, मैं तुम लोगों का गनी मियां हूं. चिराग और उसके बीवी-बच्चे तो नहीं मिल सकते, मगर मैंने कहा कि एक बार मकान की सूरत ही देख लूं. ’ और उसने टोपी उतार कर सिर पर हाथ फेरते हुए आंसुओं को बहने से रोक लिया।

‘आप तो शायद काफ़ी पहले ही यहां से चले गए थे?’ मनोरी ने स्वर में सम्वेदना लाकर कहा।

‘हां, बेटे, मेरी बदबख़्ती थी कि पहले अकेला निकलकर चला गया. यहां रहता, तो उनके साथ मैं भी…’ और कहते-कहते उसे अहसास हो आया कि उसे ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए. उसने बात मुंह में रोक ली, मगर आंख में आए हुए आंसुओं को बह जाने दिया।

‘छोड़िए, गनी साहब, अब बीती बातों को सोचने में क्या रखा है?’ मनोरी ने गनी की बांह पकड़ कर कहा,‘आइए, आपको आपका घर दिखा दूं?’

गली में ख़बर इस रूप में फैली थी कि गली के बाहर एक मुसलमान खड़ा है, जो रामदासी के लड़के को उठाने जा रहा था उसकी बहन उसे पकड़ कर घसीट लाई, नहीं तो वह मुसलमान उसे ले गया होता. यह ख़बर पाते ही जो स्त्रियां गली में पीढ़े बिछाकर बैठी थीं, वे अपने-अपने पीढ़े उठा कर घरों के अन्दर चली गईं. गली में खेलते हुए बच्चों को भी उन स्त्रियों ने पुकार-पुकारकर घरों में बुला लिया. मनोरी जब गनी को लेकर गली में आया, तो गली में एक फेरीवाला रह गया था या कुएं के साथ उगे हुए पीपल के नीचे रक्खा पहलवान बिखरकर सोया दिखाई दे रहा था. घरों की खिड़कियों में से और किवाड़ों के पीछे से अलबत्ता कई चेहरे झांक रहे थे. गनी को गली में आते देखकर उनमें हल्की-हल्की चेमेगोइयां शुरू हो गईं. दाढ़ी के सब बाल सफ़ेद हो जाने के बावजूद लोगों ने चिरागदीन के बाप अब्दुल गनी को पहचान लिया था।

‘वह आपका मकान था.’ मनोरी ने दूर से एक मलबे की ओर संकेत किया. गनी पल-भर के लिए ठिठकर फटी-फटी आंखों से उसकी ओर देखता रह गया. चिराग और उसके बीवी-बच्चों की मौत को वह काफ़ी अर्सा पहले स्वीकार कर चुका था, मगर अपने नए मकान को इस रूप में देखकर उसे जो झुरझुरी हुई, उसके लिए वह तैयार नहीं था. उसकी जबान पहले से ज़्यादा ख़ुश्क हो गई और घुटने भी और ज़्यादा कांपने लगे।

‘वह मलबा?’ उसने अविश्वास के स्वर में पूछा।

मनोरी ने उसके चेहरे का बदला हुआ रंग देखा. उसने उसकी बांह को और सहारा देकर ठहरे हुए स्वर में उत्तर दिया,‘आपका मकान उन्हीं दिनों जल गया था।’

गनी छड़ी का सहारा लेता हुआ किसी तरह मलबे के पास पहुंच गया. मलबे में अब मिट्टी ही मिट्टी थी, जिसमें जहां-तहां टूटी और जली हुई ईटें फंसी थीं. लोहे और लकड़ी का सामान उसमें से न जाने कब का निकाल लिया गया था. केवल जले हुए दरवाजे की चौखट न जाने कैसे बची रह गई थी, जो मलबे में से बाहर को निकली हुई थी. पीछे की ओर दो जली हुई अलमारियां और बाकी थीं, जिनकी कालिख पर अब सफेदी की हल्की-हल्की तह उभर आई थी. मलबे को पास से देखकर गनी ने कहा,‘यह रह गया है, यह?’

और जैसे उसके घुटने जवाब दे गए और वह जली हुई चौखट को पकड़ कर बैठ गया. क्षण-भर बाद उसका सिर भी चौखट से जा लगा और उसके मुंह से बिलखने की-सी आवाज़ निकली,‘हाए! ओए, चिरागदीना!’

जले हुए किवाड़ की चौखट साढ़े सात साल मलबे में से सिर निकाले खड़ी तो रही थी, मगर उसकी लकड़ी बुरी तरह भुरभुरा गई थी. गनी के सिर के छूने से उसके कई रेशे झड़कर बिखर गए. कुछ रेशे गनी की टोपी और बालों पर आ गिरे. लकड़ी के रेशों के साथ एक केंचुआ भी नीचे गिरा, जो गनी के पैर से छह-आठ इंच दूर नाली के साथ बनी ईंटों की पटरी पर सरसराने लगा. वह अपने लिए सूराख ढूंढ़ता हुआ ज़रा-सा सिर उठाता, मगर दो- एक बार सिर पटककर और निराश होकर दूसरी ओर को मुड़ जाता।

खिड़कियों में से झांकने वाले चेहरों की संख्या पहले से कहीं बढ़ गयी थी. उनमें चेमेगोइयां चल रही थीं कि आज कुछ न कुछ ज़रूर होगा. चिराग़दीन का बाप गनी आ गया है, इसलिए साढ़े सात साल पहले की सारी घटना आज खुल जाएगी. लोगों को लग रहा था जैसे वह मलबा ही गनी की सारी कहानी सुना देगा कि शाम के वक़्त चिराग़ ऊपर के कमरे में खाना खा रहा था जब रक्खे पहलवान ने उसे नीचे बुलाया कि वह एक मिनट आकर एक ज़रूरी बात सुन जाए. पहलवान उन दिनों गली का बादशाह था. हिन्दुओं पर ही उसका काफ़ी दबदबा था, चिराग़ तो ख़ैर मुसलमान था. चिराग़ हाथ पर कौर बीच में ही छोड़कर नीचे उतर आया. उसकी बीवी जुबैदा और दोनों लड़कियां किश्वर और सुलताना खिड़कियों में से नीचे झांकने लगीं. चिराग़ ने डयोढ़ी से बाहर क़दम रखा ही था कि पहलवान ने उसे कमीज़ के कालर से पकड़कर खींच लिया और उसे गली में गिराकर उसकी छाती पर चढ़ बैठा. चिराग़ उसका छुरेवाला हाथ पकड़कर चिल्लाया,‘न, रक्खे पहलवान मुझे मत मार! हाय मुझे बचाओ! जुबैदा! मुझे बचा…!’ और ऊपर से जुबैदा चीख़ती हुई नीचे डयोढ़ी की तरफ भागी. रक्खे के एक शगिर्द ने चिराग़ की जद्दोजहद करती हुई बांहें पकड़ लीं ओर रक्खा उसकी जांघों को घुटने से दबाए हुए बोला,‘चीख़ता क्यों है, भैण के… तुझे पाकिस्तान दे रहा हूं, ले!’
और जुबैदा के नीचे पहुंचने से पहले ही उसने चिराग़ को पाकिस्तान दे दिया।

आसपास के घरों की खिड़कियां बंद हो गईं. जो लोग इस दृश्य के साक्षी थे, उन्होंने दरवाज़े बन्द करके अपने को इस घटना के उत्तरदायित्व से मुक्त कर लिया था. बन्द किवाड़ों में भी उन्हें देर तक जुबैदा, किश्वर और सुलताना के चीख़ने की आवाज़ें सुनाई देती रहीं. रक्खे पहलवान और उसके साथियों ने उन्हें भी उसी रात पाकिस्तान देकर विदा कर दिया, मगर दूसरे तबील रास्ते से. उनकी लाशें चिराग के घर में न मिलकर बाद में नहर के पानी में पाई गईं।

दो दिन तक चिराग के घर की ख़ाना-तलाशी होती रही. जब उसका सारा सामान लूटा जा चुका तो न जाने किसने उस घर को आग लगा दी. रक्खे पहलवान ने कसम खाई थी कि वह आग लगाने वाले को ज़िन्दा ज़मीन में गाड़ देगा, क्योंकि उसने उस मकान पर नज़र रख कर ही चिराग़ को मारने का निश्चय किया था. उसने उस मकान को शुद्ध करने के लिए हवन-सामग्री भी ख़रीद रखी थी. मगर आग लगाने वाले का पता ही नहीं चल सका, उसे ज़िन्दा गाड़ने की नौबत तो बाद में आती. अब साढ़े सात साल से रक्खा पहलवान उस मलबे को अपनी जागीर समझता आ रहा था, जहां न वह किसी को गाय-भैंस बांधने देता था ओर न खोंचा लगाने देता था. उस मलबे से बिना उसकी अनुमति के कोई ईंट भी नहीं उठा सकता था।

लोग आशा कर रहे थे कि सारी कहानी ज़रूर किसी न किसी तरह गनी के कानों तक पहुंच जाएगी जैसे मलबे को देखकर उसे अपने-आप ही सारी घटना का पता चल जाएगा. और गनी मलबे की मिट्टी नाख़ूनों से खोद-खोद कर अपने ऊपर डाल रहा था और दरवाज़े की चौखट को बांह में लिए हुए रो रहा था,‘बोल, चिराग़दीना, बोल! तू कहां चला गया, ओए! ओ किश्वर! ओ सुल्तान! हाय मेरे बच्चे! ओएऽऽ! गनी को कहां छोड़ दिया, ओएऽऽ!’

और भुरभुरे किवाड़ से कड़ी के रेशे झड़ते जा रहे थे।

पीपल के नीचे सोए हुए रक्खे पहलवान को किसी ने जगा दिया, या वह वैसे ही जाग गया. यह जानकर कि पाकिस्तान से अब्दुल गनी आया है ओर अपने मकान के मलबे पर बैठा है, उसके गले में थोड़ा झाग उठ आया, जिससे उसे खांसी हो आई और उसने कुएं के फ़र्श पर थूक दिया. मलबे की ओर देखकर उसकी छाती से धौंकनी का-सा स्वर निकला और उसका निचला ओंठ थोड़ा बाहर को फैल आया।

‘गनी अपने मलबे पर बैठा है।’

उसके शागिर्द लच्छे पहलवाने ने उसके पास आकर बैठते हुए कहा।

‘मलबा उसका कैसे है? मलबा हमारा है!’ पहलवान ने झाग के कारण घरघराई हुई आवाज़ में कहा।

‘मगर वह वहां पर बैठा है,’लच्छे ने आंखों में रहस्यमय संकेत लाकर कहा.
‘बैठा है, बैठा रहे, तू चिलम ला,’ उसकी टांगें थोड़ी फैल गईं और उसने अपनी नंगी जांघों पर हाथ फेरा।

‘मनोरी ने अगर उसे कुछ बताया-उताया तो…’ लच्छे ने चिलम भरने के लिए उठते हुए उसी रहस्यपूर्ण दृष्टि से देखकर कहा.
‘मनोरी की शामत आई है!’

लच्छे चला गया।

कुएं पर पीपल की कई पुरानी पत्तियां बिखरी थीं. रक्खा उन पत्तियों को उठा-उठाकर हाथों में मसलता रहा. जब लच्छे ने चिलम के नीचे कपड़ा लगाकर उसके हाथ में दिया तो उसने कश खींचते हुए पूछा,‘और भी तो किसी से गनी की बात नहीं हुई?’
‘नहीं।’

‘ले.’

और उसने खांसते हुए चिलम लच्छे के हाथ में दे दी. लच्छे ने देखा कि मनोरी मलबे की तरफ से गनी की बांह पकड़े हुए आ रहा है. वह उकड़ू होकर चिलम के लम्बे-लम्बे कश खींचने लगा. उसकी आंखें आधा क्षण रक्खे के चेहरे पर टिकतीं और आधा क्षण गनी की ओर लगी रहतीं।

मनोरी गनी की बांह पकड़े हुए उससे एक क़दम आगे चल रहा था, जैसे उसकी कोशिश हो कि गनी कुएं के पास से बिना रक्खे पहलवान को देखे ही निकल जाए. मगर रक्खा जिस तरह बिखरकर बैठा था, उससे गनी ने उसे दूर से ही देख लिया. कुएं के पास पहुंचते न पहुंचते उसकी दोनों बांहें फैल गईं और उसने कहा,‘रक्खे पहलवान!’

रक्खे ने गर्दन उठाकर और आंखें जरा छोटी करके उसे देखा. उसके गले में अस्पष्ट-सी घरघराहट हुई, पर वह बोला कुछ नहीं.
‘रक्खे पहलवान, मुझे पहचाना नहीं?’ गनी ने बांहें नीची करके कहा,‘मैं गनी हूं, अब्दुल गनी, चिराग़दीन का बाप!’

पहलवान ने सन्देहपूर्ण दृष्टि से उसका ऊपर से नीचे तक जायजा लिया. अब्दुल गनी की आंखों में उसे देखकर चमक आ गई थी. सफ़ेद दाढ़ी के नीचे उसके चेहरे की झुरियां ज़रा फैल गई थीं. रक्खे का निचला होंठ फड़का, फिर उसकी छाती से भारी-सा स्वर निकला,‘सुना गनिया!’

गनी की बांहें फिर फैलने को हुई, परन्तु पहलवान पर कोई प्रतिक्रिया न देखकर उसी तरह रह गईं. वह पीपल के तने का सहारा लेकर कुएं की सिल पर बैठ गया।

ऊपर खिड़कियों में चेमेगोइयां तेज़ हो गईं कि अब दोनों आमने-सामने आ गए हैं, तो बात ज़रूर खुलेगी. फ़िर हो सकता है, दोनों में ग़ाली-गलौज भी हो. अब रक्खा गनी को कुछ नहीं कह सकता, अब वो दिन नहीं रहे. बड़ा मलबे का मालिक बनता था! असल में मलबा न इसका है, न गनी का. मलबा तो सरकार की मिल्कियत है. क़िसी को गाय का खूंटा नहीं लगने देता. मनोरी भी डरपोक है. उसने गनी को बताया क्यों नहीं कि रक्खे ने ही चिराग़ और उसके बीवी-बच्चों को मारा है? रक्खा आदमी नहीं है, सांड है. दिन भर सांड की तरह गली में घूमता है. ग़नी बेचारा कितना दुबला हो गया है. दाढ़ी के सारे बाल सफ़ेद हो गए है!
गनी ने कुएं की सिल पर बैठकर कहा,‘देख, रक्खे पहलवान, क्या से क्या रह गया है? भरा-पूरा घर छोड़कर गया था और आज यहां मिट्टी देखने आया हूं. बसे हुए घर की यही निशानी रह गई है. तू सच पूछ, रक्खे, तो मेरा यह मिट्टी भी छोड़कर जाने को जी नहीं करता.’ और उसकी आंखें छलछला आईं।

पहलवान ने फैली हुई टांगें समेट लीं और अंगोछा कुएं की मुंडेर से से उठाकर कन्धे पर डाल लिया. लच्छे ने चिलम उसकी तरफ़ बढ़ा दी और वह कश खींचने लगा।

‘तू बता, रक्खे, यह सब हुआ किस तरह?’ गनी आंसू रोकता हुआ आग्रह के साथ बोला,‘तुम लोग उसके पास थे, सबमें भाई-भाई की-सी मुहब्बत थी, अगर वह चाहता तो वह तुममें से किसी के घर में नहीं छिप सकता था? उसे इतनी भी समझ नहीं आई!’
‘ऐसा ही है,’ रक्खे को स्वयं लगा कि उसकी आवाज़ में कुछ अस्वाभाविक-सी गूंज है. उसके होंठ गाढ़ी लार से चिपक-से गए थे. उसकी मूंछों के नीचे से पसीना उसके होंठों पर आ रहा था. उसके माथे पर किसी चीज़ का दबाव पड़ रहा था और उसकी रीढ़ की हड्डी सहारा चाह रही थी।

‘पाकिस्तान के क्या हाल हैं?’

उसने वैसे ही स्वर में पूछा. उसके गले की नसों में तनाव आ गया था. उसने अंगोछे से बगलों का पसीना पोंछा और गले का झाग मुंह में खींच कर गली में थूक दिया.

‘मैं क्या हाल बताऊं, रक्खे!’

गनी दोनों हाथों से छड़ी पर जोर देकर झुकता हुआ बोला,‘मेरा हाल पूछो, तो वह ख़ुदा ही जानता है. मेरा चिराग़ साथ होता तो और बात थी. रक्खे! मैंने उसे समझाया था कि मेरे साथ चला चल. मगर वह अड़ा रहा कि नया मकान छोड़कर कैसे जाऊं. यहां अपनी गली है, कोई ख़तरा नहीं है. भोले कबूतर ने यह नहीं सोचा कि गली में ख़तरा न सही, बाहर से तो ख़तरा आ सकता है. मकान की रखवाली के लिए चारों जनों ने जान दे दी. रक्खे! उसे तेरा बहुत भरोसा था. कहता था कि रक्खे के रहते कोई मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता. मगर जब आनी आई, तो रक्खे के रोके न रुक सकी।’

रक्खे ने सीधा होने की चेष्टा की, क्योंकि उसकी रीढ़ की हड्डी दर्द कर रही थी. उसे अपनी कमर और जांघों के जोड़ पर सख़्त दबाव महसूस हो रहा था. पेट की अन्तड़ियों के पास जैसे कोई चीज़ उसकी सांस को जकड़ रही थी. उसका सारा जिस्म पसीने से भीग गया था ओर उसके पैरों के तलुवों में चुनचुनाहट हो रही थी. बीच-बीच में फुलझड़ियां-सी ऊपर से उतरतीं और उसकी आंखों के सामने से तैरती हुई निकल जातीं. उसे अपनी जबान और होंठों के बीच का अन्तर कुछ ज़्यादा महसूस हो रहा था. उसने अंगोछे से होंठों के कोनों को साफ़ किया और उसके मुंह से निकला-

‘हे प्रभु! सच्चिआ, तू ही है, तू ही है, तू ही है!’

गनी ने लक्षित किया कि पहलवान के होंठ सूख रहे हैं ओर उसकी आंखों के इर्द-गिर्द दायरे गहरे हो आए हैं, तो वह उसके कन्धे पर हाथ रखकर बोला,‘जी हल्कान न कर, रक्खिया. जो होनी थी, सो हो गई. उसे कोई लौटा थोड़े ही सकता है. ख़ुदा नेक की नेकी रखे और बद की बदी माफ़ करें. मेरे लिए चिराग़ नहीं, तो तुम लोग तो हो. मुझे आकर इतनी ही तसल्ली हुई कि उस ज़माने की कोई तो यादगार है. मैंने तुमको देख लिया, तो चिराग़ को देख लिया. अल्लाह तुम लोगों को सेहतमंद रखे. जीते रहो और ख़ुशियां देखो!’

और गनी छड़ी पर दबाव देकर उठ खड़ा हुआ. चलते हुए उसने फिर कहा,‘अच्छा रक्खे पहलवान, याद रखना!’
रक्खे के गले से स्वीकृति की मद्धम-सी आवाज़ निकली. अंगोछा बीच में लिए हुए उसके दोनों हाथ जुड़ गए. गनी गली के वातावरण को हसरत भरी नज़र से देखता हुआ धीरे-धीरे गली से बाहर चला गया।

ऊपर खिड़कियों में थोड़ी देर चेमेगोइयां चलती रहीं कि मनोरी ने गली से बाहर निकलकर ज़रूर गनी को सब कुछ बता दिया होगा. गनी के सामने रक्खे का तालू किस तरह खुश्क हो गया था! रक्खा अब किस मुंह से लोगों को मलबे पर गाय बांधने से रोकेगा? बेचारी जुबैदा! बेचारी कितनी अच्छी थी! कभी किसी से मंदा बोल नहीं बोली. रक्खे मरदूद का घर, न घाट. इसे किस मां-बहन का लिहाज था?

और थोड़ी ही देर में स्त्रियां घरों से गली में उतर आईं, बच्चे गली में गुल्ली-डण्डा खेलने लगे और दो बारह-तेरह बरस की लड़कियां किसी बात पर एक-दूसरी से गुत्थमगुत्था हो गईं।

रक्खा गहरी शाम तक कुएं पर बैठा खंखारता और चिलम फूंकता रहा. कई लोगों ने वहां से गुज़रते हुए उससे पूछा,‘रक्खे शाह, सुना है आज गनी पाकिस्तान से आया था?’

‘आया था,’ रक्खे ने हर बार एक ही उत्तर दिया।

‘फिर?’

‘फिर कुछ नहीं, चला गया.।

रात होने पर पहलवान रोज़ की तरह गली के बाहर बाईं ओर की दुकान के तख़्ते पर आ बैठा. रोज़ अक्सर वह रास्ते से गुज़रने वाले परिचित लोगों को आवाज़ दे-देकर बुला लेता था और उन्हें सट्टे के गुर और सेहत के नुस्ख़े बताया करता था. मगर उस दिन वह लच्छे को अपनी वैष्णो देवी की यात्रा का विवरण सुनाता रहा, जो उसने पन्द्रह साल पहले की थी. लच्छे को विदा करके वह गली में आया, तो मलबे के पास लोकू पंडित की भैंस को खड़ी देखकर वह रोज़ की आदत के मुताबिक़ उसे धक्के दे-दे कर हटाने लगा-तत्-तत्…तत्- तत्…

और भैंस को हटाकर वह सुस्ताने के लिए मलबे की चौखट पर बैठ गया. गली उस समय बिल्कुल सुनसान थी. कमेटी की कोई बत्ती न होने से वहां शाम से ही अन्धेरा हो जाता था. मलबे के नीचे नाली का पानी हल्की आवाज़ करता हुआ बह रहा था. रात की ख़ामोशी के साथ मिली हुई कई तरह की हल्की-हल्की आवाज़ें मलबे की मिट्टी में से निकल रहीं थीं. एक भटका हुआ कौआ न जाने कहां से उड़कर कड़ी की चौखट पर आ बैठा. उससे लकड़ी के रेशे इधर-उधर छितरा गए. कौए के वहां बैठते ने बैठते मलबे के एक कोने में लेटा हुआ कुत्ता गुर्राकर उठा और ज़ोर-ज़ोर से भौंकने लगा-वउ-अउ अऊ-वऊ. कौवा कुछ देर सहमा-सा चौखट पर बैठा रहा, फिर वह पंख फड़फड़ाता हुआ उड़कर कुएं के पीपल पर चला गया. कौए के उड़ जाने पर कुत्ता और नीचे उतर आया और पहलवान की ओर मुंह करके भौंकने लगा. पहलवान उसे हटाने के लिए भारी आवाज में बोला-दुर् दुर् दुर् दुरे।

मगर कुत्ता और पास आकर भौंकने लगा-वउ-अउ-वउ-वउ-वउ.

-हट हट, दुर्रर्र-दुर्रर्र दुरे

वऊ-अऊ-अऊ-अउ-अउ.

पहलवान ने एक ढेला उठाकर कुत्ते की ओर फेंका. कुत्ता थोड़ा पीछे हट गया, पर उसका भौंकना बन्द नहीं हुआ. पहलवान मुंह ही मुंह में कुत्ते की मां को गाली देकर वहां से उठ खड़ा हुआ और धीरे-धीरे जाकर कुएं की सिल पर लेट गया. पहलवान के वहां से हटने पर कुत्ता गली में उतर आया और कुएं की ओर मुंह करके भौंकने लगा. काफ़ी देर भौंक कर जब गली में उसे कोई प्राणी चलता-फिरता दिखाई नहीं दिया तो वह एक बार कान झटककर मलबे पर लौट आया और वहां कोने में बैठकर गुर्राने लगा।

हिंदी साहित्य में किन्नर विमर्श -एक पूर्वपीठिका 

साहित्य किसी भी स्थिति की तहों में जाकर समाज का सरोकार उन विमर्शो और मुद्दों से करता है जिसका समाज पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से समाज को हितकर बनाये। साहित्य अच्छे या बुरे सभी मुद्दों को सामने लाकर रख देता है जिस से मनुष्य  बिंदुओं को परख कर वास्तविकता से परिचित करवाता है। इसीलिए महावीर प्रसाद द्विवेदी ने कहा है साहित्य समाज का दर्पण है। साहित्य समाज के मानसिक प्रक्रिया को पढ़ता रहता है उसकी बुनावट देखता है। दबे ,कुचले शोषितो के प्रति आवाज उठाता है। साहित्य समतामूलक समाज की स्थापना करने के लिए निरंतर संघर्षशील रहता है ,उसे समाज में चल रहे असमानता से नफरत होती है। इसीलिए एक साहित्यकार अपनी जागरूकता से दलित ,स्त्री ,आदिवासी ,किसान ,किन्नर ,अल्पसंख्यक सभी वंचितों और असमानता का दंश झेलते समुदाय को न्याय दिलाने की लिए अपनी लेखनी को गतिशील रखता है। इन हासिये के समाज पर निरंतर विचार किया जा रहा है। 

साहित्य अपने समय से आगे की और ही देखता है। जहाँ वह एक नदी  भांति ही निरन्तर गतिशील रहती है। उसमे रुकावट नहीं आती क्योंकि साहित्यकार निर्भीक भी होता है। साहित्य नयी  दिशाओ में निरन्तर अनुसन्धान करता रहता है। साहित्य मुद्दों की प्रवृतियों पर अपना मुख्य उद्देश्य रखते हुए व्यक्ति के अंदर मनोरंजन ढंग से संवेदना को विकसित करता है। हिंदी साहित्य के विषय में भी यह बात युक्तियुक्त प्रतीति होती है।   

 स्त्री के गर्भ धारण करते ही यह निश्चित हो जाता है की लड़की होगी या लड़का। अगर xx क्रोमोसोम होते है तब लड़की का जन्म होता है और xy से लड़का जन्म लेता है परन्तु छह सप्ताह तक लड़की और लड़के दोनों के लिंग का स्वरुप एक जैसा ही रहता है। उसके बाद y क्रोमोसोम पर का sry नामक जीन कार्यरत होता है। उसमे फिर जननेन्द्रियों का विकास होने लगता है और हार्मोन्स तैयार होने की शुरुवात होती है। इसी तरह जैसे -जैसे गर्भ विकसित होता है बच्चा अपने शारीरिक संरचना में स्थायित्व प्राप्त कर लेता है। पुरुष हार्मोन्स एंड्रोजेन तैयार होता है। उसमे टेस्टास्टरोन हार्मोन की बड़ी मात्रा  होती है। इसी प्रकार बच्चों की संरचना रूप धारण करती है। 

यह प्रक्रिया सामान्यतः ऐसी ही चलती है और स्त्री पुरुष का जन्म होता रहता है। मगर बहुत बार इस प्रक्रिया में गड़बड़ी होने से लिंग निर्धारण पाता। इसके भी चार प्रकार के सिंड्रोम है पहले सिंड्रोम को टर्नर सिंड्रोम कहा जाता है। उसमे गर्भ का सिंड्रोम xx या xy न होकर इस से उलट xo होता है। पिता से आने वाले ,गर्भ को पुरुषत्व देनेवाला u क्रोमोसोम के न होने की वजह से बाहर के जननेन्द्रियों का विकास स्त्री जैसा ही होता है। इसी वजह से गर्भाशय का आभाव हो जाता है और वह बच्चा जन्म देने में असमर्थ होते है। इसमें स्त्री के विकास  के लिए दो x की जरुरत होती है। इस वजह से उसका पूरा स्वरुप स्त्री का होने के बावजूद उसमे मातृत्व गुण से वंचित रहना पड़ता है। 

दूसरा प्रकार होता है एंड्रोजन इंसेन्सिटिव सिंड्रोम। इसमें टेस्टा स्टारॉन हार्मोन को गर्भ रेस्पॉन्स नहीं देता। गर्भ अगर पुरुष का है ,xy तो इस वजह से उसकी पुरुष जननेन्द्रियों का विकास नहीं होता। नवजात बच्ची की जननेंद्रिय स्त्री की होती है,पर अण्डकोश ,गर्भशय नहीं होता। लेकिन स्तनों का विकास होता है। उसे मासिक धर्म नहीं होता,उनके बच्चे नहीं होते। जेनेटकली उसमे लड़के का प्रभाव होता है।

तीसरे प्रकार में पुरुष हार्मोन का ,एंड्रोजन का स्तर बहुत बढ़ता है गर्भ अगर लड़के का हो तो कोई सवाल पैदा नहीं होता ,पर लड़की का हो तो जन्मी हुई लड़की पुरुष ,टॉमबोइश पद्यति की होती है। 

चौथे प्रकार में पुरुष हार्मोन ,टेस्टास्टरोन काफी कम मात्रा में तैयार होते है। स्त्री का गर्भ हो तो कोई दिक्कत नहीं ,लेकिन गर्भ पुरुष का हो तो जननेंद्रिय पुरुषों की होने के बावजूद सोच और भावना आदि उसमे स्त्रीत्व की मिलती है। उसे स्त्री जैसा रहना ,बर्ताव करना अच्छा लगता है। किशोरावस्था में आने के बाद ये लड़के पुरुषों की ओर आकर्षित होते है। 

हिजड़ा का सम्बन्ध इसी चौथे प्रकार से है। हिजड़ा में शारीरिक रूप से वह पुरुष होते है लेकिन भावनाये स्त्रियों की निहित होती है। किसी के पास शरीर स्त्री का और भावनाये पुरुष की हो जाती है। हमारे यहाँ पुरुषों का विद्रोह स्त्रियों से आसान होता है। कई पुरुषों की भावना स्त्रियों की तरह होने के कारण उन्हें मउगा कह कर चिढ़ाया जाता है।   


didik

डॉ. कमलकिशोर गोयनका ने प्रेमचंद को भारतीयता से जोड़कर भारतीय चिंतन परंपरा में व्याख्यायित किया है।

प्रेमचंद ने बार-बार भारतीयों को सनातन संस्कृति पर चलने की सीख दी लेकिन प्रेमचंद के मूल्यांकन में इन चीजों को शामिल नहीं किया जाता है।

प्रेमचंद पर कब तक काफी लिखा-पढ़ा गया है, लेकिन डॉ. 

 लेखक ने भारतीय जीवनादर्शों एवं मूल्यों की तुलना में पाश्चात्य जीवनादर्शों एवं मूल्यों को हीन और निम्नकोटि का मानते हुए भारतीय मूल्यों की स्थापना की हैं।23

इस उपन्यास में प्रेमचंद ने मुख्यतः किसानों औऱ जमींदारों के प्रश्न को उठाया है, परन्तु इसमें इन दोनों वर्गों से संबंधित अन्य व्यवसायों तथा निहित स्वार्थों के लोगों का भी चित्रण हुआ है।24

पश्चिमी जीवन दृष्टि , संस्कार और मूल्यों की अनिष्टकरिता और भारतीय जीवन-दृष्टि , संस्कार और मूल्यों की श्रेष्ठता दिखाना ही लेखक का उद्देश्य रहा है। 28
भाषा साधन है, साध्य नहीं । अब हमारी भाषा ने वह रूप प्राप्त कर लिया है कि हम भाषा से आगे बढ़कर भाव की और ध्यान दें और इस पर विचार करें कि जिस उद्देश्य से यह निर्माण कार्य आरंभ किया था, वह क्योंकर पूरा हो। वही भाषा, जिसमे आरम्भ में बागोबहार और बैताल-पचीसी की रचना हु सबसे बड़ी साहित्य-सेवा थी , अब इस योग्य ही गई है कि उसमें शास्त्र और विज्ञान के प्रश्नों की भी विवेचना की जा सके और यह सम्मेलन इस सच्चाई की स्पष्ट स्वीकृति है।912

नीति -शास्त्र ओर साहित्य-शास्त्र का लक्ष्य एक ही है-केवल उपदेश की विधि में अंतर है। नीति-शास्त्र तर्कों और उपदेशों के द्वारा बुद्धि और मन पर प्रभाव डालने का यत्न करता है, साहित्य अपने लिए मानसिक अवस्थाओं और भावों का क्षेत्र चुन लिया है। 914

कवि या साहित्यकार में अनुभूति की जितनी तीव्रता होती है, उसकी रचना उतनी ही आकर्षक और उच्चे दर्जे की होती है। जिस साहित्य से हमारी सुरुचि न जागे,आध्यात्मिक और मानसिक तृप्ति न मिले, हममें शक्ति और गति न पैदा हो, हमारा सौंदर्य-प्रेम न जाग्रत हो -जो हममें सच्चा संकल्प और कठिनाइयों पर विजय पाने की सच्ची दृढ़ता न उत्पन्न करे, वह आज हमारे लिए बेकार है, वह साहित्य कहाने का अधिकारी नहीं। 915

हम साहित्यकार से यह भी आशा रखते हैं कि वह अपनी बहुज्ञता और अपने विचारों की विस्तृति से हमें जाग्रत कर, हमारी दृष्टि तथा मानसिक परिधि को विस्तृत करे- उसकी दृष्टि इतनी सूक्ष्म, इतनी गहरी और इतनी विस्तृत हो कि उसकी रचना से हमें आध्यात्मिक आनंद और बल मिले। 916

हम मानसिक और नैतिक गिरावट से उसी तरह संतुष्ट नहीं रहते, जैसे कोई रोगी अपने रोग से संतुष्ट नहीं रहता। जैसे वह सदा किसी चिकित्सक की तलाश में रहता है, उसी तरह हम भी इस फिक्र में रहते है कि किसी तरह अपनी कमजोरियों को परे फेंककर अधिक अच्छे मनुष्य बनें। इसलिए हम साधु-फकीरों की खोज में रहते हैं, पूजा-पाठ करते हैं, बड़े-बूढ़ों के पास बैठते हैं, विद्वानों के व्याख्यान सुनते हैं और साहित्य का अध्ययन करते हैं।916


साहित्य हमारे जीवन को स्वाभाविक और स्वाधीन बनाता है। दूसरे शब्दों में , उसी बदौलत मन का संस्कार होता है। यही उसका मुख्य उद्देश्य है।917

साहित्य कलाकार के आध्यात्मिक सामंजस्य का व्यक्त रूप है और सामंजस्य सौन्दर्य की सृष्टि करता है, नाश नहीं। 917

प्रगतिशील लेखक संघ, यह नाम ही मेरे विचार से गलत है। साहित्यकार या कलाकार स्वभावतः प्रगतिशील होता है।अगर यह उसका स्वभाव न होता, तो शायद वह साहित्यकार ही न होता। 917

अब तो हमें उस कला की आवश्यकता है, जिसमें कर्म का संदेश हो।918

कला का उद्देश्य सौन्दर्य-वृत्ति की पुष्टि करना है और वह हमारे आध्यात्मिक आनंद की कुंजी है, पर ऐसा कोई रुचिगत मानसिक तथा आध्यात्मिक आनंद नहीं , जो अपनी उपयोगिता का पहलू न रखता हो। 918

प्रकृति से अपने जीवन का सुर मिलाकर रहने में हमें इसलिए आध्यात्मिक सुख मिलता है कि उससे हमारा जीवन विकसित और पुष्ट होता है। 919

आजमाये को आजमाना मूर्खता है, इस कहावत के अनुसार यदि हम अब भी धर्म और नीति का दामन पकड़कर समानता के ऊँचे लक्ष्य पर पहुँचना चाहें, तो विफलता ही मिलेगी। क्या हम इस सपने को उत्तेजित मस्तिष्क की सृष्टि समझकर भूल जाएँ? तब तो मनुष्यता की उन्नति और पूर्णता के लिए कोई आदर्श ही बाकी न रह जायेगा। इससे कहीं अच्छा है कि मनुष्य का अस्तित ही मिट जाए। जिस आदर्श को हमने सभ्यता के आरंभ से पाला है। जिसके लिए मनुष्य ने, ईश्वर जाने कितनी कुर्बानियाँ की है, जिसकी परिणति के लिए धर्मों का आविर्भाव हुआ, मानव-समाज का इतिहास जिस आदर्श की प्राप्ति का इतिहास है, उसे सर्वमान्य समझकर, एक अमिट सचाई समझकर, हमें उन्नति के मैदान में कदम रखना है। हमें एक ऐसे नए संघटन को सर्वांगपूर्ण बनाना है, जहाँ समानता केवल नैतिक बंधनों पर आश्रित न रहकर अधिक ठोस रूप प्राप्त कर ले। हमारे साहित्य को उसी आदर्श को अपने सामने रखना है। 919

साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफ़िल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है- उसका दर्जा इतना न गिराइए। वह देश-भक्ति और राजनीति के पीछे चलनेवाली सचाई भी नहीं, बल्कि उनके आगे मशाल दिखती हुई चलने वाली सचाई है। 921

इसमें शक नहीं कि साहित्यकार पैदा होता है, बनाया नहीं जाता; पर यदि हम शिक्षा और जिज्ञासा से प्रकृति की इस देन को बढ़ा सकें , तो निश्चय ही हम साहित्य की अधिक सेवा कर सकेंगे। 921

सेवा में जो आध्यात्मिक आनंद है, वही हमारा पुरस्कार है 923

सादी जिंदगी के साथ ऊँची निगाह हमारे जीवन का लक्ष्य है। 923



प्रेमचंद अपने युग की नवीन चेतना से प्रभावित थे, वह स्वयं उसके निर्माता थे। अनेक राजनीतिज्ञों की तुलना में वह वर्तमान और भविष्य - दोनों को ज्यादा स्पष्टता से देखते थे। फिर भी संयुक्त परिवार से उन्हें मोह था। इस मोह के बावजूद इस प्राचीन परिवार- प्रथा के दोषों का जैसा विशद चित्रण उन्होंने किया है, वैसा किसी दूसरे कलाकार ने नहीं।176

15 प्रेमाश्रम और गोदान:कुछ अन्य समस्याए

प्रेमाश्रम में विशुद्ध भारतीय शिक्षा-पध्दति का कोई प्रतिनिधि है ही नहीं, इसलिए उसमें भारतीय शिक्षा और पाश्चात्य शिक्षा की टक्कर के चित्रण की कल्पना करना व्यर्थ है।191

गांधीजी पर अंग्रेज लेखक रस्किन और रूसी लेखक तोल्स्तोय का गहरा असर था। अहिंसा और निष्क्रिय प्रतिरोध के जरिए सामाजिक समस्याएँ हल की जाएँ, वर्ग संघर्ष को वर्ग-सहयोग में बदल दिया जाए, इस तरह की विचारधारा का प्रसार भारत से बाहर अधिक था। भारतीय जनमानस पर रामायण और महाभारत का गहरा असर है। राम और कृष्ण इन दो महानायकों में अहिंसावादी कोई नहीं है। 191

ट्रस्टीशिप का सिद्धान्त भारतीय नहीं है, इसलिए भारतीय और पश्चिमी जीवन-दृष्टियों की बात करना व्यर्थ है।-196

 प्रेमचंद ने प्रेमाश्रम में लिखा था, "सत्याग्रह में अन्याय का दमन करने की शक्ति है, यह सिद्धान्त भ्रांतिपूर्ण सिद्ध हो गया।"। कह सकते है कि प्रेमाश्रम गाँधीवाद की विफलता चित्रित करने वाला उपन्यास है।-198

मैं भी औरत हूँ -अनुसूया त्यागी 2011 

अनसूया त्यागी ने अपने इस उपन्यास के अंतर्गत दो जननांग विकारों से ग्रसित दो लड़कियों की दशा को बया किया है जिनका नाम रोशनी और मंजुला है। इनके शारीरिक विकारो के बारे में उनके परिवार जन माता -पिता को बाद में पता चलता है। उपन्यास में डॉक्टर द्वारा ऑपरेशन कर योनि विकसित करना इसका कमजोर पार्ट है। उनके शारीरिक विकार को बचपन से नहीं देख पाना और उन्हें पहचान न पाना , बचपन से किशोरावस्था तक नहीं पता चलना अविश्वसनीय है। इससे रचनाकार द्वारा यह कहना संदिग्ध प्रतीत होता है की यह वास्तविक घटना से प्रेरित है और रचनाकार का इस घटना से व्यक्तिगत भी सरोकार है। पेशे से चिकित्सक लेखिका ने एक तथ्यात्मक भूल की और ध्यान नहीं दिया है -थर्ड जेंडर वाले बच्चे का जन्म आनुवांशिक विकार के कारण नहीं ,हार्मोन के असंतुलन के कारण  होता है। अतः एक ही परिवार में दो ऐसे बच्चों का जन्म मात्र संयोग ही कहा जा सकता है। लेकिन उपन्यास का अन्य कथानक उपन्यास को जनजीवन से जोड़कर उनकी सार्थकता प्रदान करता है। इस उपन्यास में मास्टर साहब ने अपनी बेटियों को अपने प्यार से वंचित नहीं किया उन्होंने न ही भगवान को कोसा बल्कि उनका उपचार कराने का निर्णय किया। समाज का भय भी उन्हें नहीं छुवा उन्होंने अपने बच्चों को दुत्कारा नहीं। उसे सहज स्वीकार किया है। 

मास्टर साहब द्वारा लिया गया निर्णय समाज में एक अत्यंत प्रेरणा देने वाला निर्णय है। वह अपने पिता जी से पैसे ले कर चुपचाप अपनी बेटियों को उपचार के लिए ले कर चले जाते है। जिस से बाद में उनकी लड़कियों को एक सुरक्षित और सम्मानित जीवन प्राप्त होता है। उनका उज्जवल भविष्य उनके सामने बाहें फैलाये खड़ी हो जाती है। अपनी दोनों लड़की मंजुला और रोशनी को उच्च शिक्षा दिलाते है। मंजुला अपने पूर्ण स्वरुप को प्राप्त करती है उसे पति साथ- साथ मातृत्व भी प्राप्त होता है। रोशनी एक प्रसिद्ध कम्पनी की सी.ई.ओ  बनी। रोशनी को ओंकार का साथ मिलता है वह उसके साथ शारीरिक सम्बन्ध स्थापित करती है। दोनों विवाह करते है ,सेरोगेट मदर के  द्वारा संतान उत्पति का प्रयास करते है ,धोखा खाते है ,एक बच्ची गोद लेते है ,रसे बाद बेटे को  पाते है ,दशक पुत्री से उसका विवाह करते है। 
इस उपन्यास के माध्यम से लेखक ने चिकत्साशात्र का महत्व प्रतिपादित किया है की किस प्रकार सही समय से उपचार द्वारा हम शारीरिक विकार से ग्रस्त बच्चों को सम्मानित जिंदगी दे सकते है।यह उपन्यास एक स्टीरियो टाइप से अलग औरत की छवि बनाता है की स्त्री मात्र गर्भाशय  नहीं है। वह जीवन प्रदायिनी तो है लेकिन सिर्फ वही उसका अस्तित्त्व नहीं है। उसके जीवन में और भी तत्व है उसका  निस्पंदन है। 
लेखिका ने इस उपन्यास में शारीरिक विकार के इतर भी अन्य महत्वपूर्ण स्थितियों को आगे किया है। बहार शौच के लिए जाने वाली स्त्रियों का हमेशा भय बने रहना या शारीरिक शोषण से गुजरना। नकुल और सौरभ द्वारा रोशनी का त्याग ,यौन शुचिता का प्रश्न। यहाँ लेखिका यह भी सिद्ध करती है यदि पुरुष सभी रूपों में मानवीय गरिमा के साथ उपस्थित हो -जैसे मास्टर तुलसीराम ,डॉ. विपिन ,दादा जी और ओंकार तो कोई भी स्त्री समाज में स्वयं को असुरक्षित और हिन अनुभव नहीं करेगी। 

किन्नर कथा -महेंद्र भीष्म 2014 

बुंदेला रियासत को केंद्र में रखकर सामाजिक कार्यकर्ता और न्याय व्यवस्था से सम्बद्ध लेखक महेंद्र भीष्म ने किन्नर विमर्श को उठाया। उनके अनुसार यह उपन्यास सत्य घटनाओ पर आधारित है। ऐतिहासिकता और प्रमाणिकता को सत्यापित करने के लिए तिथियों का भी उल्लेख किया गया है। उपन्यास दो उच्च कुल में उत्पन्न तारा और सोना की कथा कहता है जिसमे बीच -बीच में थर्ड -जेंडर पर सैद्धांतिक विवेचन गुथा है जो कथा में संवेदना जगाने की जगह बोझिल बना देता है।उपन्यास में किन्नर  परिचय देना उसे डॉक्यूमेंट्री का रूप  प्रदान  कर देता है। लेखक को कथा सूत्र को  विकसित करना चाहिए था मगर किन्नरों की विशेषताओ के कारण नीरस बन गया है। परन्तु ये सब होने के बावजूद इस उपन्यास का अपना महत्व है जिसमे  लेखक किन्नरों की पारिवारिक अवहेलना झेलते दंश को बखूबी चित्रित किया है। जगतसिंह को जब पता चलता है की सोना थर्ड जेंडर है तब वह उसे मारने के लिए दीवान को भेजता है परन्तु  का मनुष्यत्व जग जाता है और वह उसे नहीं मरता। यह सब सुचना तारा को मिलती है तब वही सोना का पालन  करती है। वह एक अत्यंत निर्भीक किन्नर है और सही निर्णय लेने वाली भी। वह सिर्फ मांग कर खाने पर आश्रित न होकर खेती बाड़ी करती है उनके यहाँ आने वाले किन्नर को वह चिकत्स्कीय सुविधा भी मुहैया कराती है। अगर कोई भी चिकत्स्कीय सुविधा द्वारा ठीक हो सकता है उसे अपने खर्चे पर उसका  इलाज भी करवाती है। 
सोना उर्फ़ तारा को नृत्य में दिलचस्पी है वह इसमें पारंगत  भी है। तारा जैतपुर कभी नहीं जाती लेकिन जब तारा की मृत्यु हो जाती है उसके पाश्चात्य इस चीज से अनभिज्ञ सोना जैतपुर के आमंत्रण पर वह चली जाती है। जैतपुर पहुंचकर उसे अपने बचपन की स्मृतिया याद आ जाती है और वह नृत्य के दौरान गिर जाती है। एक नाटकीय घटनाक्रम के तहत वह अपने पुरे परिवार के साथ रहने लगती है। 
महेंद्र  भीष्म ने इस उपन्यास में जगतसिंह का ह्रदय परिवर्तन दिखाकर उपन्यास को अंततः सुखांत बना दिया है। कुंवर द्वारा स्थिति को समझे बगैर गोली चलने के बाद भी चंदा को लम्बे आपरेशन के बाद जीवनदान मिलता है। चंदा का उपचार होने के बाद वह भी सामान्य जीवन व्यतीत करती है। 
इस उपन्यास में पुरुष द्वारा चंदा को प्यार करने की भी झलक दिखलाई गई है। तारा  का भतीजा मनीष  सब स्थितियों को जानते हुए भी वह चंदा  करता है। यह उपन्यास की एक नयी पहल है क्युकी देखने को यही मिलता है की स्त्री पुरुष का जीवन व्यापन तो स्वाभाविक होता है परन्तु  तृतीय जेंडर के साथ स्थिति दूसरी बनी रहती है। वह इन सब सुखो से  वंचित रहते है। 
यहाँ लेखक ने यह चित्रित किया   किसी भी थर्ड जेंडर को अगर चिकित्सा किया जा सके तो उसे  करना चाहिए। समाज की मानसिक जकड़बंदी को तोड़कर उन्हें इनके दर्द से अवगत करना चाहिए यह कार्य केवल शिक्षा द्वारा ही सम्भव हो सकता है। हम अपने पूर्वाग्रहों को त्यागना चाहिए और नए समाज का निर्माण करना चाहिए जिसमे समतामूलक स्थिति की प्रधानता हो। 

मैं पायल हूँ -महेंद्र भीष्म 2014 

महेंद्र भीष्म की मैं पायल हूँ उपन्यास थर्ड जेंडर पर इनका दूसरा उपन्यास है जिसे पाठको द्वारा काफी सराहा गया। यह एक वास्तविक चरित्र पायल  सिंह के जीवन पर आधारित रचना है जिसमे उनके जीवन संघर्ष को सहज ही उकेरा गया है। यह उपन्यास  जीवनी परक उपन्यास की श्रेणी में आता है। इसलिए यह हमारे समाज का  सच्चा दस्तावेज है जो समाज के नग्न यथार्थ को  प्रदर्शित करता है। इस उपन्यास में समाज के मानवीय और  पक्षों को उजागर किया गया है। 
यह कथा पायल सिंह उर्फ़ जुगनी की कथा है जिसे अपने पारिवारिक  दंश को झेलकर घर से  बाहर निकलना पड़ता है। घर से बाहर का संसार और भी निर्मम क्रूर होता है लेकिन उसके साथ साथ उसमे मधुरता को कोमलता भी है जो इन्हे मरने नहीं देती। वह रेलवे स्टेशन ,रेलवे में प्रौढ़ व्यक्तियों द्वारा शोषण का शिकार बनती है। वह अपनी बुद्धिमत्ता के कारण  अपनी वास्तविकता को छुपाकर ,पंडित जी के यहाँ  नौकरी कर लेती है। सिनेमा के अंदर  हुए  नौकरी करते हुए उसे और भी अमानवीय चेहरे दिखाई देते है। प्रमोद के छेड़खानी करने के दौरान पायल सिंह की असलियत सबके सामने उजागर हो जाती है लेकिन संतोष सिंह जैसे व्यक्ति उसे दूसरी जगह नौकरी भी दिलवाते है। 
पायल के भीतर निरंतर अग्रसित होने की भावना इतनी बलवती है की वह अपने से निरंतर आगे बढ़ती रहती है। वह गेट कीपर से प्रोजेक्टर रूम ऑपरेटर बन जाती है वह गायन में भी अच्छी है और मिमिक्री करने में भी। वह लखनऊ जाकर अपना करियर बनाना  परन्तु किन्नरों द्वारा पकड़ ली जाती है। एक दुखत घटनाकर्म पायल को  तन और मन दोनों से  कर देता है। वह  कानपुर वापस आ जाती  शारीरिक रूप से भी अधिक बलवती होती है।  लखनऊ में आकाशवाणी के अंदर नौकरी मिल जाती है और वह  प्रसिद्धि प्राप्त करती है। पायल को प्रेम भी अशोक के रूप  प्राप्त होता है लेकिन उसके द्वारा हिंसा किए जाने पर वह पायल से पायल गुरु  जाती है। आगे चलकर वह इंटरनेट और यूट्यूब का उपयोग करना भी सिख जाती है। 

उपन्यास में यह प्रदर्शित किया गया है की किन्नरों को ,समाज बदलने नहीं देता। मगर किन्नरों का साहस उन्हें इस क्षेत्र में निरन्तर आगे बढ़ने को भी खुल जायेगा जब सभी किन्नर अपने दृढ संकल्प के साथ ,आत्मविश्वास लिए अपने लिए रोजगार की तलाश करेंगे। यह शुरुवात आने वाले किन्नरों को भी प्रोत्साहित करेगा। जरुरत है किन्नरों को समाजिक तथा मानसिक रूप से  मजबूत होने की। 

पोस्ट बॉक्स न. 203 नाला सोपारा -चित्रा मृदुगल 

नाला सोपारा उपन्यास किन्नरों के जीवन पर लिखा गया अति विशिष्ट उपन्यास है जिसमे किन्नरों के  जीवन का वास्तविक रूप उकेरा गया है। इसमें लेखिका ने कोई दवा नहीं किया की यह किसी व्यक्ति की वास्तविक  घटना पर आधारित है लेकिन इसे पढ़ने के बाद लगता है की यह उपन्यास उसके जीवन का सच्चा दस्तावेज है। चित्रा मृदुगल के साक्षात्कार के दौरान पूछने पर वह इस और संकेत करती है की नाला सोपारा की प्रवास यात्रा के दौरान उन्होंने ऐसे नायको को देखा और उसे घर में भी स्थान दिया। इसी लिए वह इसकी वास्तविकता  पचड़े में न पड़कर पाठको के समक्ष प्रस्तुत कर देती है। 
उपन्यास को सहज तरीके से समझने के लिए इसे समाचार दो से  पढ़ना चाहिए जिसमे एक किन्नर की लाश बरामद होती है और उसका सम्बन्ध अंडरवर्ल्ड से माना जाता है। या समाचार साधारण नहीं होता यह राजनितिक जीवन को भी हिला कर रख देता है। यह लाश बिन्नी उर्फ़ विनोद की है। विधायक जी जान चुके थे की विनोद उनके हाथो की कठपुतली नहीं बनेगा। क्योंकि वह किन्नरों के जाग्रति की बात करता है उनके स्वविवेक की न की आरक्षण की सिर्फ। दूसरी घटना विधायक जी के भतीजे और उसके मित्रो द्वारा पूनम जोशी के साथ  सामूहिक  बलात्कार  की होती है। विधायक जी विनोद और पूनम जोशी के स्नेहिल सम्बन्ध को जानते गई इसीलिए वह चंडीगढ़ के नेताओ के साथ मिलकर जल्दबाजी में वहाँ एक कार्यक्रम का आयोजन कर देते है। दिल्ली आने पर भी विनोद को उस से दुरी  बनाये रखी जाती  उसकी वास्तविकता का खुलासा न हो जाये इसलिए विनोद  अन्य स्थानीय कार्यक्रमों में उलझा कर रखा जाता है।  विनोद का बम्बई जाना  विधायक जी के लिए अच्छा अवसर होता है और विनोद की हत्या कर  दी जाती है। 
विनोद की पढाई चौदह वर्ष तक परिवार के साथ रह कर ही  होती है वह गणित में तेज होता हैं और भविष्य में गणितज्ञ बनना चाहता है। शुरुवाती दौर में तो चम्पाबाई को  मंजुल को दिखाकर पीछा छुड़ा लिया जाता है। परन्तु भविष्य में ऐसा होने पर उसे एक अपरचित संसार की तरफ रुख करना पड़ता है। जिसमे निराशा और आत्मग्लानि का भार से बोझिल जीवन व्यतीत करना होता है। परिवार वाले अपने घर को बेचकर कही चले जाते है तथा परिवार और स्कूल में विनोद के मरने की खबर बता दी जाती है। सिद्धार्थ बाद में भी इस भय से मुक्त नहीं हो पाता और अपने संतान के समय भी डरा हुआ रहता है। मंजुल को भी ऐसे मानसिक स्थितियों से ग्रस्त जीवन को व्यापन करना पड़ता है। वंदना बेन अंतिम समय में समाज की जकड़बन्दियों से विद्रोह पर उतर आती  परन्तु उस समय देर हो चुकी होती है। 
वंदना बेन जब सार्वजनिक रूप से उसे अपनाना चाहती है तब तक गन्दी राजनीती के दलदल में फंस कर उसमे डूब  जाता है और उसके संसार का सूरज वही ध्वस्त हो जाता है। 

चित्रा जी ने उपन्यास के माध्यम से सभी पहलुओ को बारीकी से देखा है और उन सभी व्यक्ति ,संस्थाओ को कटघरे में ला खड़ा किया है जो समाज में सिर्फ दिखावा करते है। उन्होंने सबसे पहले पारिवारिक पहलुओ पर प्रकाश डाला है की शुरुवात क्यों न घर से ही हो। जब परिवार इन बच्चो को अपनाने के लिए आगे आएगा तो समाज उन्हें प्रताड़ित करने में संकोच करेगा।  मगर जब घर से ही पड़ताड़ना का शिकार बच्चा होता है तब उसकी स्थिति जानवर से भी बदतर हो जाती है और उसे हर जगह दुत्कारा ही जाता है। जब इन्हे भी शिक्षा का अधिकार है और परिवार वाले उसके लिए संघर्ष करे तो कोई शिक्षा संस्थान कैसे इनकी अवहेलना करेगी। राजनितिक पार्टिया तब इन्हे सिर्फ वोट बैंक न समझकर इन नागरिक समझने लगेंगी और इनके अधिकारों और इनके स्वअस्तित्व की बात होने लगेगी। लेखिका यह स्पष्ट मानती है की यह खुद ही ऐसा आने वाली पीढ़ियों के लिए भविष्य का निर्माण करते है। वह जो झेलते है उसे आगे आने वाले किन्नरों के लिए भी वैसा ही रहने देते है अगर यह चाहते की इसमें उधर हो तो आज तक कितना कुछ परिवर्तित हो गया होता मगर इन्हे अपनी शक्ति का विस्तार करना अच्छा लगता है। नए किन्नरों पर यह राज करना चाहते है। इन्हे यह निर्णय परिवार के ऊपर ही छोड़ देना चाहिए की बच्चा  परिवार के साथ रहेगा या किन्नरों के डेरे पर। अगर  किन्नर गुरु स्वयं यह निर्णय ले ले की अगर कोई भी यहाँ किन्नर आएगा तो उसके शिक्षा  व्यवस्था की जाएगी और समाज के मुकाबले के साथ वह खड़ा रहे। तब सायास यह परिवर्तन दिखेगा की किन्नर आत्मसम्मान से जी सकेंगे फिर उन्हें किसी के आगे हाथ फैलाकर खाने की जरुरत नहीं पड़ेगी  का खाना खाएंगे। यह वर्ग समाज की एक सार्थक इकाई की तरह अपना अस्तित्व कायम कर सकेगा। 
लेखिका यह बताना चाहती  है की इसके लिए  एक दो पीढ़ी को अपना कर्तव्य पालन करना पड़ेगा तभी समाज में परिवर्तन आ सकेगा। अपनी पूर्वाग्रहों को छोड़कर इन्हे नए विचारो का अनुशीलन करना  पड़ेगा। तब कही जाकर समाज में इन्हे भी समतामूलक  अंग माना जायेगा। 

जिंदगी 50 -50 -भगवंत अनमोल 2017 

भगवंत अनमोल का यह  उपन्यास उनके द्वारा रचित यह तीसरा उपन्यास है जिसमे किन्नरों का चित्र अंकित किया गया है। यह खुद भी साहित्य  विद्यार्थी न होकर 27 वर्षीय इंजीनिर है। इस रचना लेखक इस दृष्टि को उजागर करता है की कोई भी व्यक्ति के जीवन में एक से अधिक बार ऐसा अवसर आता है की वह वहाँ से मुड़ने पर सफलता की सीढ़ी चढ़ सकता है। उसे गवाने के बाद कठिनाइयों का सामना। 
नायक अनमोल के जीवन के दो छोर है पहला भाई हर्षिता दूसरा बेटा सूर्या। इस उपन्यास में नायिका अनाया जन्मजात चेहरे पर दाग है जिस से उसे अनमोल का पहले उपेक्षा सहना पड़ता है परन्तु बाद में वह प्रेम में परवर्तित  हो जाता है। लेखक यह भी प्रदर्शित करना चाहता है की जब जन्मजात दाग व्यक्ति प्रेम पात्र बन सकता है तो जननांग विकार से ग्रसित व्यक्ति क्यों नहीं। अनमोल पिता का आड़ लेकर अनाया से शादी नहीं करता। अनमोल के पिता हर्षा को अपने साथ ही रखते है उसकी शिक्षा दीक्षा पूरी  करते है। एक अपरचित व्यक्ति द्वारा हर्षा का शारीरिक शोषण  करने पर  हर्षा को ही दोषी ठहराते है।  इस चीज से हर्षा आहत होकर कस्तूरी के डेरे पर चली जाती है और उन्ही के अनुरूप अपना जीवन ढाल लेती है। बस में  मांगने के दौरान उसके पिता के आँखों में आंसू को देखकर वह मुंबई की  तरफ अपना रुख करती है। जहाँ  उसका भाई अनमोल रहता है वह शहरी परिवेश में ढल चूका है। पिता से उपेक्षित हर्षा अपने को देह व्यापार में संलग्न कर एड्स का शिकार हो जाता है। स्वयं आत्महत्या कर काल के गाल में समाहित जाता है।  
अनमोल हर्षा के डायरी लेखन से परिचित है  मृत्यु पर्यन्त जब वह डायरी पढता है तो उसमे लिखा  है की में फिर आउंगी और होता यही। पत्नी आंशिक का जब बच्चा होता है तो वह भी शारीरिक विकार से ग्रस्त होता है। हर्षा का अनुभव अनमोल को सूर्या के पालन -पोषण में सहायक होता है। वह  समाज के सामने सूर्या के लिए ढाल बन कर खड़ा हो जाता है।सामान्य बच्चों के जन्मोत्सव की तरह उसका  जन्मोत्सव मनाया जाता है। पड़ोसियों के बोलने पर अनमोल उनकी भी कलई खोलने लगता है। 

अनमोल को हर्षा के मरने के पाश्चात्य मिली डायरी सूर्या  के जीवन को सवारने का काम आता है। जीवन के हर मोड़ पर अनमोल दीवार तरह खड़ा रहता है। उसका पालन -पोषण सामान्य बच्चों की तरह  ही करता है। सूर्या का लड़की की तरह सजने सवरने की इच्छा को भी वह पूरा करने देता है। क्योंकि  सूर्या की इस मानसिक आवश्यकता की तुष्टि जरुरी है। 

यमदीप -नीरजा 

नीरजा माधव का उपन्यास अपने शीर्षक की सार्थकता को दर्शाता है की यमदीप की भांति किन्नरों को भी यह निर्णय लेना होगा की अपने द्वारा सुधार की पहल करने पर ही सुधार निश्चित होगा। 
उपन्यास में दो -नाजबीबी और सोना तथा मानवी और आनंद की कथाएं समानांतर चलती है। कही -कही यह दोनों कहानी एक दूसरे के सामने से गुजरती है। मानवी ग्रामीण जीवन से शहरी परिवेश में आती है। शहर में आ कर  नौकरी भी करती है। वह पत्रकारिता जगत में नौकरी करती है और उसमे निहित भ्रष्टाचार को बखूबी पहचानती है। मानवी गरीबो ,शोषितों और वंचितों की आवाज बनती है। उसे कई बार अपने पारिवारिक रूढ़ियों के लिए भी परिवार के  जंग करना पड़ता है और वह उसके साथ ईर्ष्या का भाव भी रखने  लगते है। 
नाजबीबी  किन्नर होते हुए अत्यधिक साहसिक है वह समाज में तो उपेक्षित है परन्तु सामाजिक न्याय के लिए संघर्षरत भी रहती है। नाजबीबी अपने साथियों के साथ ही  पगली के भी प्रसव पीड़ा में सहायता करती है तथा उसके मर  जाने पर उसके बच्चे का पालन पोषण स्वयं करती है। उसका बच्चे के प्रति प्रेम अतल गहराइयों से होता है इसलिए वह सामान्य अभिभावक की तरह ही उसका देख रेख करती है।  नाज बीबी ,छेलू के साथ मिलकर सोना के लिए हर संभव सुविधा जुटाने का प्रयास करती है।पुलिस से बचकर ही वह उसका संरक्षण करते है। अपने कई महत्वपूर्ण सामानों को वह गिरवी रखने में भी नहीं सकुचाते और उसकी सुविधाओं का उचित ध्यान रखते है। नंदरानी  स्वयं एक  परिवार में  पाली बढ़ी थी मगर -बाई बहनो के मध्य उसे उपेक्षा से देखा जाना एक दमघोटू वातावरण का निर्माण करता है। नंदरानी ने स्वयं ही घर से निष्काषित होने का निर्णय लिया। इसी से वह सोना का ध्यान संस्कारित तरीके से रखती है। वह शिक्षा के महत्व को जानते हुए नंदरानी सोना को शिक्षित होने के लिए स्कूल भी भेजती है। नंदरानी कुछ बातो से अनभिज्ञ भी है इसीलिए वह सोना का मासिक आने पर अपने नजदीकी डॉक्टर के पास ले जाती है। डॉक्टर के द्वारा पुलिस को सुचना देने पर सोना का जीवन अस्त -व्यस्त हो जाता है। लेखिका अंत में सुखांत करने के लिए सत्यम शिवम् सुंदरम की अवधारणा को अपना कर सब कुछ सही हो जाता है। इसके लिए  मानवी और डी.एम आनंद कुमार को माध्यम बनाया गया। नाज बीबी और मानवी का सम्बन्ध स्नेहिल था उसकी का विकास होता है। मानवी निर्भीक स्त्री है वह एक नीडर पत्रकार है  तभी वह सोना के लिए संघर्ष भी कर पाती है अन्यथा वह नहीं कर पाती। उसके सहयोगी पत्रकार भी उसे छोड़कर चले जाते है। उसे भ्रष्ट पुलिस और नेताओ से भी भिड़ना  पड़ता है। पूरी व्यवस्था से वह स्वयं टकरा जाती है और सफलता भी हासिल करती है। 
इस उपन्यास  में लेखिका सिर्फ तृतीय लिंग की चर्चा ही नहीं करती बल्कि उनके जीवन का सूक्ष्म अवलोकन करके उसका समाधान निकलने की भी कोशिश करती है। समाज के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पक्षों को भी उद्घाटित करती है। नाज बीबी का मानवीयता ने एक श्रेष्ट धर्म अपनाया जैसे सोना जैसे चरित्र का जीवन सहज ,सम्मानित और सरल बना। महताब गुरु के माध्यम से किन्नर समाज के बारे में कई अन्धविश्वास ध्वस्त होते दीखते है। उपन्यास इसके साथ साथ पुलिस ,नेता और मिडिया जगत की सच्चाई को भी उजागर करता है। 

तीसरी ताली -प्रदीप सौरभ 2011 

तीसरी ताली उपन्यास में शारीरिक विकार से ग्रस्त प्राणी के मानसिक ,सामाजिक और पारिवारिक और शारीरिक सम्बन्धो की कहानी है जिसमे समलेंगिकता,और किन्नरों के चित्र को उजागर किया गया है। जननांग विकार से ग्रसित लोगो को असामान्य यौन संबंध बनाए पर समाज की अवहेलना को झेलना पड़ता है। लेखक पेशे से पत्रकार है उसने स्वयं धरातल पर उतर कर उनकी सत्यता को जाना है और उपन्यास में अंकित किया है। इसमें कोई अतिश्योक्ति के पुट को कही उपन्यासकार ने छुआ  नहीं है। 
लेखक ने जन्मजात विकार से युक्त और परिस्थिति का शिकार होकर बने हिजड़ो दोनों के अनुभवों की विविधता और समानता को दर्शाया गया है। लेखन नवीन जानकारियों को लेकर पाठक के समक्ष प्रस्तुत होता है। यह उपन्यास विनीता ,राजा उर्फ़ रानी ,ज्योति ,मंजू और विजय  की कहानी है। जिसे लेखक ने अपने रचनात्मक कौशल द्वारा लिपिबद्ध किया है। 
विनीत को जननांग दोष का हर्जाना भरना पड़ता है की उसे सामाजिक उपेक्षा को सहन करना पड़ता है। उसे  स्कूल से भी वंचित रहना पड़ता है लेकिन पिता द्वारा प्रतिष्ठित संसथान से ब्यूटिशन का कोर्स करवाने का निर्णय उसे भविष्य की सफलता की तरफ ले जाता है। वह स्वयं 'गे पार्लर' का निर्माण करती है और वही उसके प्रसिद्धि का कारण बनता है। 
किन्नर गुरु के यहाँ के अमानवीयता को  लेखक ने  दिखाया है की किस प्रकार मंजू और डिंपल के प्रेम सम्बन्ध को स्वीकार नहीं करती। उनके प्रेम सम्बन्ध से मंजू गर्भवती हो  जाती है लेकिन यह बात किन्नर गुरु स्वीकार नहीं है और वह मंजू का गर्भच्छेदन करा दिया जाता है। राजा के साथ भी लिंगछेदन करा कर उसे भी किन्नर समुदाय का अंग बना दिया जाता है। 
यह उपन्यास किन्नर समुदाय के जीवन के मानवीय और अमानवीय सम्बन्धो को  उजागर किया गया है। लेखक  कुशलता के साथ गलत बातो के प्रति अतिक्रमण किया है और सकारत्मक पक्षों के प्रति वह अनुकरणीय स्थिति को उत्तपन्न करते है। अंततः यह उपन्यास किन्नरों के जीवन विडंबना को चित्रित किया है।    
                                     

मुर्दहिया 

लेखक - तुलसीराम 
जन्म -1  जुलाई 1949 
माता का नाम - धीरजा 

मुर्दहिया हमारे गाँव धरमपुर आजमगढ़ की बहुउद्देशीय कर्मस्थली थी। चरवाही से लेकर हरवाही तक के सारे रास्ते वही से गुजरते थे। इतना ही नहीं स्कूल से दुकान ,बाजार हो या मंदिर यहाँ तक की मजदूरी के लिए कलकत्ता वाली रेलगाड़ी पकड़ना हो तो भी मुर्दहिया से गुजरना पड़ता था। हमारे गांव के जिओ पॉलटिक्स यानि भू -राजनीती में दलितों के लिए एक सामरिक केंद्र जैसी थी। जीवन से लेकर मरण तक की सारी गतिविधिया मुर्दहिया समेट लेती थी। सबसे रोचक तथ्य यह है की मुर्दहिया मानव और पशु में कोई फर्क नहीं करती थी। 

मुर्दहिया सही मायनो में हमारी दलित बस्ती की जिंदगी थी। इस जिंदगी को मुर्दहिया से खोदकर लेन का पूरा श्रेय तद्भव के मुख्य संपादक अखिलेश को जाता है। 

प्रवासी मजदूरों से ही पता चला की मुर्दहिया से होकर जाने वाली सड़क ने हमारे गांव को तीन जिलों -आजमगढ़ ,गाजीपुर तथा बनारस से जोड़ दिया है। ..... सम्भवतः मुर्दहिया से सड़क निकल जाने के कारण वहाँ के भूत -पिशाचो का भी पलायन अवश्य हो गया होगा। जाहिर है ,अब पहले जैसी उनकी पूजा नहीं होती। बढ़ते हुए शरीकरण ने हर एक के जीवन को प्रभावित किया है। भूत भी इससे अछूते नहीं है। 

मुर्दहिया को सात  अध्याय में विभक्त किया गया है। 

  1. भूतही पारिवारिक पृष्टभूमि 
  2. मुर्दहिया तथा स्कूली जीवन 
  3. अकाल में अन्धविश्वास 
  4. मुर्दहिया के गिद्ध तथा लोकजीवन 
  5. भूतिनिया नागिन 
  6. चले बुद्ध की राह 
  7. आजमगढ़ की फाकाकशी 
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लगभग 23 सौ वर्ष पूर्व यूनान देश से भारत आए मिनांदर ने कहा की आम भारतीयों को लिपि का ज्ञान नहीं है ,इस लिए वह पढ़ लिख नहीं सकते। 
सदियों पुरानी इस अशिक्षा का परिणाम यह हुआ की मूर्खता और मूर्खता के चलते अंधविश्वासों का बोझ मेरे पूर्वजों के  सिर से  कभी नहीं हटा। 

शुरुवात अगर दादाजी से करूँ  जी के अनुसार उन्हें एक भूत ने लाठियों से पीट- पीटकर मार डाला था। 

 माँ ने बताया था की उसके कई बच्चे पैदा हुए किन्तु थोड़ा बड़ा हो -होकर सबके सब मरते चले गए।  इसलिए जब में पैदा हुआ तो पिताजी मुझे अपनी गोद में लेकर गाँव से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर एक शिव मंदिर ,जिसे शेरपुर कुटी कहते थे ,पहुंचे और मंदिर के महंत हरिहर दास से आशीर्वाद देने  के लिए विनती की। 

भारत के अन्धविश्वास समाज में ऐसे व्यक्ति अशुभ की श्रेणी के लिए सूचीबद्ध हो जाता है। ऐसी श्रेणी में मेरा प्रवेश मात्र तीन वर्ष की अवस्था में हो गया। अतः घर से लेकर बाहर तक सबके लिए मैं अपशगुन बन गया। 

बारह गांव के चमारो के चौधरी -सोम्मर  - तुलसी राम के पिता के 5 भाइयो में सबसे बड़े 

तीसरे नंबर के नग्गर जो बोहोत गुस्सैल स्वाभाव के थे और मुझे कनवा कह कर पुकारते। 

बारह गांव के चौधरी के समक्ष जो समस्याए लाई जाती ,उनमे दो मामले बड़े विचित्र ढंग से सुलझाए जाते थे। इनमे से एक मामला होता था किसी युवती का गांव के किसी अन्य व्यक्ति के साथ यौन -सम्बन्ध या उसका बिन विवाह गर्भवती होना तथा दूसरा था किसी चमार द्वारा मरे हुए पशु [गाय ,बैल या भैंस ] माँस खाया जाना। 

डांगर -मर हुए  पशुओ का माँस 

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पत्नी कहानी का सारांश, जैनेंद्र कुमार की पत्नी कहानी, Patni kahani summary.

  'पत्नी' हिंदी के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक कथाकार जैनेंद्र कुमार की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और बहुचर्चित कहानी है। यह कहानी भारतीय समाज...