प्रयोगवाद के बाद के प्रमुख कविता आंदोलनों की विशेषताएँ

 प्रयोगवाद के बाद हिंदी कविता का सफर बहुत तेजी से बदला। 1950 के दशक के बाद कविता केवल व्यक्तिगत अनुभवों तक सीमित नहीं रही, बल्कि वह सड़क, संसद और आम आदमी के संघर्षों तक पहुँच गई।

प्रयोगवाद के बाद के प्रमुख कविता आंदोलनों की विशेषताएँ नीचे दी गई हैं:


1. नई कविता (1954 - 1960)

प्रयोगवाद का ही विकसित रूप, जिसने 'लघु मानव' को केंद्र में रखा।

  • लघु मानव की प्रतिष्ठा: आम आदमी के सुख-दुख और उसकी साधारणता को महत्व दिया गया।

  • क्षणवाद: जीवन के हर छोटे क्षण को पूरी सार्थकता के साथ जीना और व्यक्त करना।

  • बौद्धिकता: भावनाओं के ऊपर तर्क और बुद्धि को प्रधानता दी गई।

  • नया शिल्प: नए प्रतीकों और नए उपमानों का प्रयोग ।

2. साठोत्तरी कविता (1960 के बाद)

इसे मोहभंग की कविता भी कहते हैं क्योंकि आज़ादी के बाद का उत्साह अब खत्म हो चुका था।

  • मोहभंग (Disillusionment): व्यवस्था, राजनीति और लोकतंत्र से जनता का भरोसा टूटने लगा था।

  • आक्रामकता: इसमें व्यवस्था के प्रति गहरा असंतोष और गुस्सा झलकता है।

  • सपाटबयानी: कविता में घुमा-फिराकर बात करने के बजाय सीधी और तीखी बात कही गई।

3. अकविता (Anti-Poetry) - 1960 के दशक के मध्य

यह आंदोलन स्थापित कविता के मूल्यों के पूर्ण विरोध में खड़ा हुआ। (मुख्य कवि: जगदीश चतुर्वेदी, श्याम परमार)

  • अस्वीकार का भाव: पुरानी परंपराओं, नैतिकता और सौंदर्यबोध का पूरी तरह से निषेध।

  • यौन कुंठा और नग्नता: इसमें मनुष्य की वर्जनाओं और कुंठाओं का बहुत ही बेबाक (कभी-कभी अश्लील भी) चित्रण हुआ।

  • अराजकता: यह काव्य शिल्प और भाषा के किसी भी अनुशासन को नहीं मानती।

4. जनवादी कविता / प्रगतिशील धारा (1970 के बाद)

यह मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित थी और पूरी तरह सामाजिक परिवर्तन के लिए समर्पित थी। (प्रमुख कवि: नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन)

  • वर्ग संघर्ष: शोषक और शोषित (अमीर-गरीब) के बीच के संघर्ष का चित्रण।

  • राजनीतिक चेतना: कविता का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि क्रांति का आह्वान करना था।

  • लोक-संपर्क: आम जनता की भाषा और लोक-धुनों का प्रभाव।

5. समकालीन कविता (Contemporary Poetry) - 1980 से आज तक

यह किसी एक 'वाद' से बंधी नहीं है, बल्कि बहुत व्यापक है।

  • विविधता: इसमें वैश्वीकरण, बाज़ारवाद, स्त्री विमर्श, और दलित चेतना जैसे कई विषय शामिल हैं।

  • संवेदनशीलता: आधुनिक जीवन की आपाधापी के बीच मानवीय संवेदनाओं को बचाने की छटपटाहट।

  • भूमंडलीकरण का विरोध: उपभोक्तावाद और मशीनी होते जा रहे जीवन के प्रति चिंता।

  • प्रमुख कवि: कुंवर नारायण, केदारनाथ सिंह, राजेश जोशी, उदय प्रकाश।


आंदोलनों का सारांश तालिका

आंदोलनप्रमुख स्वरमुख्य कवि
नई कविताजीवन का यथार्थ, क्षणवादअज्ञेय, धर्मवीर भारती
साठोत्तरीविद्रोह, व्यवस्था विरोधधूमिल, रघुवीर सहाय
अकवितानिषेध, अराजकता, कुंठाजगदीश चतुर्वेदी
जनवादीक्रांति, आम आदमी, समाजनागार्जुन, पाश
समकालीनविविधता, वैश्विक चेतनाकेदारनाथ सिंह, राजेश जोशी

 


1. गजानन माधव 'मुक्तिबोध' (नई कविता और साठोत्तरी के बीच का सेतु)

मुक्तिबोध की कविताएँ 'फंतासी' (Fantasy) के लिए जानी जाती हैं। वे समाज के अंधेरे और भीतरी संघर्ष को बहुत जटिल तरीके से दिखाते हैं।

  • उदाहरण (ब्रह्मराक्षस/अंधेरे में):

    "अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे,

    तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब।"

  • विशेषता: यहाँ कवि का कहना है कि अगर सच बोलना है, तो सुरक्षित दायरों (मठों) से बाहर निकलकर जोखिम उठाना ही पड़ेगा। यह 'नई कविता' की उस छटपटाहट को दिखाता है जहाँ बौद्धिकता और सामाजिक जिम्मेदारी आपस में टकरा रही थीं।


2. सुदामा पांडेय 'धूमिल' (साठोत्तरी और जनवादी कविता के शिखर)

धूमिल की कविता में 'साठोत्तरी' दौर का गुस्सा और व्यवस्था के प्रति नफरत साफ दिखती है। उनकी भाषा में कोई लाग-लपेट नहीं होती, वह सीधी चोट करती है।

  • उदाहरण (पटकथा/मोंचीराम):

    "एक आदमी रोटी बेलता है,

    एक आदमी रोटी खाता है,

    एक तीसरा आदमी भी है,

    जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है,

    वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है।

    मैं पूछता हूँ— 'यह तीसरा आदमी कौन है?'

    मेरे देश की संसद मौन है।"

  • विशेषता: यह 'साठोत्तरी कविता' की सबसे बड़ी पहचान है—राजनीतिक मोहभंग। यहाँ संसद की चुप्पी और आम आदमी के शोषण पर तीखा व्यंग्य है। इसे ही 'सपाटबयानी' कहा जाता है।


3. नागार्जुन (जनवादी/प्रगतिशील चेतना)

नागार्जुन को 'जनकवि' कहा जाता है। उनकी कविताओं में खेत-खलिहान और भुखमरी का असली चित्रण मिलता है।

  • उदाहरण (अकाल और उसके बाद):

    "कई दिनों तक चूहिया रोई, चक्की रही उदास,

    कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास।"

  • विशेषता: यह 'जनवादी कविता' का उदाहरण है। बिना किसी भारी-भरकम शब्द के, केवल 'चक्की' और 'चूहिया' के माध्यम से गरीबी की भीषणता को दिखा देना ही इनकी विशेषता है।


निष्कर्ष के तौर पर:

  • जहाँ मुक्तिबोध मन के भीतर के अंधेरे और उलझन (Psychological Struggle) की बात कर रहे थे।

  • वहीं धूमिल सीधे सड़क और संसद (Political Struggle) पर उतर आए थे।

  • और नागार्जुन ने कविता को पूरी तरह से लोक-जीवन (People's Struggle) से जोड़ दिया।

 

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