संपादकीय लेखन (Editorial Writing), संपादकीय की प्रमुख विशेषताएँ, लेखन की प्रक्रिया (Step-by-Step)

संपादकीय लेखन (Editorial Writing) किसी भी समाचार पत्र या पत्रिका की 'आत्मा' माना जाता है। यह वह स्थान है जहाँ समाचार पत्र किसी घटना पर अपनी व्यक्तिगत राय, दृष्टिकोण या नीति को स्पष्ट करता है।


संपादकीय लेखन के मुख्य अंग

एक प्रभावी संपादकीय मुख्य रूप से तीन भागों में विभाजित होता है:

  1. प्रस्तावना (Introduction): यहाँ विषय का परिचय दिया जाता है और उस सामयिक घटना का उल्लेख होता है जिस पर टिप्पणी की जा रही है।

  2. विश्लेषण (Analysis): यह मध्य भाग है जहाँ तर्क, तथ्य और आँकड़े प्रस्तुत किए जाते हैं। यहाँ लेखक विषय के पक्ष और विपक्ष पर गहराई से चर्चा करता है।

  3. निष्कर्ष या सुझाव (Conclusion/Suggestion): अंत में, समाचार पत्र अपनी राय देता है और भविष्य के लिए कोई समाधान या चेतावनी प्रस्तुत करता है।


संपादकीय की प्रमुख विशेषताएँ

  • निष्पक्षता और निर्भीकता: एक अच्छा संपादकीय बिना किसी दबाव के सच्चाई का साथ देता है।

  • सामयिकता: यह हमेशा वर्तमान की ज्वलंत घटनाओं पर आधारित होता है।

  • स्पष्ट दृष्टिकोण: इसमें 'शायद' या 'किंतु-परंतु' के बजाय एक स्पष्ट स्टैंड लिया जाता है।

  • संक्षिप्तता: कम शब्दों में बड़ी बात कहना इसकी सबसे बड़ी कला है।

लेखन की प्रक्रिया (Step-by-Step)

चरणकार्य
विषय चयनऐसी घटना चुनें जिसका समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ता हो।
अनुसंधानविषय से जुड़े सभी पुराने और नए तथ्यों को इकट्ठा करें।
दृष्टिकोण तय करनातय करें कि आप इस विषय का समर्थन कर रहे हैं, विरोध कर रहे हैं या केवल जागरूक कर रहे हैं।
प्रभावशाली शीर्षकएक ऐसा शीर्षक चुनें जो पाठक को सोचने पर मजबूर कर दे।
नोट: संपादकीय लिखते समय भाषा गंभीर, गरिमापूर्ण और संतुलित होनी चाहिए। व्यक्तिगत आक्षेपों से बचना अनिवार्य है।

 

'बढ़ता प्रदूषण और हमारा भविष्य'  विषय पर एक संपादकीय का उदाहरण  प्रस्तुत कर रहा हूँ। इससे आपको इसकी संरचना समझने में आसानी होगी:


 जहरीली हवा और सरकारी सुस्ती

भूमिका:

बीते कुछ हफ्तों से देश के महानगरों की हवा जिस तरह से 'दमघोंटू' श्रेणी में बनी हुई है, वह न केवल चिंताजनक है बल्कि हमारे विकास के दावों पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न भी है। हर साल सर्दियों की आहट के साथ ही प्रदूषण का मुद्दा सुर्खियों में आता है, अदालती फटकार लगती है और फिर अगले साल तक के लिए फाइलें बंद हो जाती हैं।

विश्लेषण:

आंकड़े गवाह हैं कि वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) का स्तर सामान्य से कई गुना ऊपर जा चुका है। इसका सीधा असर जनस्वास्थ्य पर पड़ रहा है। अस्पतालों में सांस और हृदय रोगियों की संख्या में 30 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है। विडंबना यह है कि हम पराली जलाने, निर्माण कार्यों और वाहनों के धुएं को लेकर केवल दोषारोपण के खेल (Blame Game) में उलझे रहते हैं। ठोस नीतिगत समाधान के अभाव में आम नागरिक शुद्ध हवा के लिए तरस रहा है।

निष्कर्ष:

अब समय केवल चर्चा करने का नहीं, बल्कि कड़े फैसले लेने का है। सौर ऊर्जा को बढ़ावा देना, सार्वजनिक परिवहन को सुदृढ़ करना और पर्यावरण नियमों का उल्लंघन करने वालों पर भारी जुर्माना लगाना अनिवार्य हो गया है। यदि हम आज प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे, तो कल की पीढ़ी के पास जीने के लिए सुरक्षित वातावरण नहीं बचेगा। प्रशासन को जागना होगा, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए।



उदाहरण -2

शिक्षा का बाज़ारीकरण: महँगी होती पढ़ाई और टूटते सपने

किसी भी राष्ट्र के निर्माण में शिक्षा सबसे सशक्त नींव होती है। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में, जहाँ संविधान प्रत्येक नागरिक को शिक्षा का समान अवसर प्रदान करने का वादा करता है, वहाँ शिक्षा का निरंतर महँगा होना एक गंभीर चिंता का विषय है। हाल के वर्षों में 'शिक्षा के निजीकरण' ने एक ऐसी दौड़ शुरू कर दी है, जिसमें ज्ञान पीछे छूट गया है और 'मुनाफा' सर्वोपरि हो गया है।

आज गली-मोहल्लों में खुले निजी शिक्षण संस्थान किसी सेवा केंद्र के बजाय कॉरपोरेट दफ्तरों की तरह प्रतीत होते हैं। प्रवेश शुल्क, विकास शुल्क और अन्य विविध खर्चों के नाम पर जिस तरह से अभिभावकों की जेब काटी जा रही है, उसने मध्यम और निम्न वर्ग के सामने एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। विडंबना यह है कि एक ओर निजी संस्थानों की फीस आसमान छू रही है, तो दूसरी ओर सरकारी स्कूलों और कॉलेजों की जर्जर स्थिति छात्रों को निजी संस्थानों की शरण में जाने के लिए मजबूर कर रही है।

यह केवल आर्थिक मुद्दा नहीं है, बल्कि एक सामाजिक विभाजन भी है। जब शिक्षा केवल ऊँची फीस देने वालों तक सीमित हो जाती है, तो समाज में दो वर्ग पैदा होते हैं। एक वह, जिसके पास संसाधनों की ताकत है, और दूसरा वह, जो मेधावी होने के बावजूद आर्थिक अभाव के कारण पीछे छूट जाता है। क्या हम एक ऐसा भविष्य चाहते हैं जहाँ डॉक्टर, इंजीनियर या अफसर केवल धनवानों के बच्चे ही बन सकें?

सरकारों की 'पल्ला झाड़ने' की नीति ने इस स्थिति को और भयावह बना दिया है। सार्वजनिक शिक्षा तंत्र में निवेश घटाना और निजी क्षेत्र को खुली छूट देना, इस समस्या की जड़ है। समय आ गया है कि सरकार एक सख्त 'नियमक संस्था' (Regulatory Body) का गठन करे, जो निजी संस्थानों की मनमानी फीस पर लगाम लगा सके। साथ ही, सरकारी स्कूलों के बुनियादी ढाँचे और पढ़ाई के स्तर को निजी स्कूलों के समकक्ष लाना अनिवार्य है।

अंततः, शिक्षा कोई 'वस्तु' नहीं है जिसे बाजार में सबसे ऊँची बोली लगाने वाले को बेच दिया जाए। यदि हमें एक सशक्त भारत का निर्माण करना है, तो शिक्षा को व्यापार के चंगुल से मुक्त करना ही होगा। सरकार और समाज दोनों को यह समझना होगा कि यदि आज शिक्षा की पहुँच आम आदमी से दूर हुई, तो राष्ट्र का बौद्धिक विकास और भविष्य—दोनों ही दांव पर लग जाएंगे।


 उदाहरण -3


शिक्षा का बाज़ारीकरण: नई नीति और पहुँच की चुनौतियाँ

शिक्षा किसी भी राष्ट्र की प्रगति का पैमाना होती है, लेकिन जब यह सेवा के बजाय 'व्यापार' बन जाए, तो समाज का संतुलित विकास रुक जाता है। भारत में शिक्षा के निजीकरण ने जहाँ एक ओर आधुनिक तकनीक और बुनियादी ढाँचा प्रदान किया है, वहीं दूसरी ओर इसने एक ऐसी आर्थिक दीवार खड़ी कर दी है, जिसे लाँघना आम आदमी के बस के बाहर होता जा रहा है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP) में शिक्षा के लोकतंत्रीकरण और 'समान पहुँच' की बात कही गई है। नीति का लक्ष्य जीडीपी का 6% शिक्षा पर खर्च करना है, जो एक सराहनीय कदम है। लेकिन धरातल पर सच्चाई इसके विपरीत है। आज भी सार्वजनिक शिक्षा बजट उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ पाया है, जिसका सीधा लाभ निजी शिक्षण संस्थान उठा रहे हैं। उच्च शिक्षा में 'स्वायत्तता' के नाम पर शिक्षण संस्थानों को अपनी फीस तय करने की जो छूट मिल रही है, वह अंततः छात्रों पर आर्थिक बोझ ही बढ़ा रही है।

निजीकरण का सबसे काला पक्ष वह 'डिजिटल डिवाइड' है, जिसने अमीर और गरीब छात्र के बीच की खाई को और चौड़ा कर दिया है। महँगे निजी स्कूल और कोचिंग संस्थान केवल उन मेधावियों को तराश रहे हैं जिनकी जेब में ताकत है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या 'नई शिक्षा नीति' के समावेशी उद्देश्य तब तक पूरे हो पाएंगे, जब तक निजी संस्थानों की फीस पर कोई ठोस कानूनी नियंत्रण नहीं होगा?

सरकार को यह समझना होगा कि केवल नीतियां बनाना पर्याप्त नहीं है। यदि हम चाहते हैं कि NEP 2020 का लाभ अंतिम पायदान पर खड़े छात्र तक पहुँचे, तो सरकारी स्कूलों के स्तर को निजी स्कूलों से बेहतर बनाना होगा। इसके साथ ही, उच्च शिक्षा में निजी निवेश को 'परोपकारी' (Philanthropic) मॉडल की ओर मोड़ना होगा, न कि शुद्ध मुनाफे की ओर।

निष्कर्ष:

शिक्षा को बाजार की ताकतों के भरोसे छोड़ना एक आत्मघाती कदम साबित हो सकता है। यदि शिक्षा केवल एक विशेषाधिकार बनकर रह गई, तो हम एक ऐसा समाज बनाएंगे जहाँ प्रतिभा नहीं, बल्कि पैसा भविष्य तय करेगा। वक्त की मांग है कि शिक्षा के बाज़ारीकरण पर नकेल कसी जाए और 'सबके लिए शिक्षा' के संकल्प को कागजों से निकालकर कक्षाओं तक पहुँचाया जाए।


 

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