शुक्ल के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण खंड 'भक्तिकाल'

 आचार्य शुक्ल के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण खंड 'भक्तिकाल' को  समझते हैं, क्योंकि परीक्षाओं में सबसे अधिक प्रश्न यहीं से बनते हैं।


आचार्य शुक्ल का 'भक्तिकाल' ( विश्लेषण)

शुक्ल जी ने भक्तिकाल को 'संवत् 1375 से 1700' तक माना है। उन्होंने भक्ति के उदय का कारण 'हिंदू जनता की पराजित और हताश मनोवृत्ति' को बताया है।

1. भक्ति काल का वर्गीकरण  

शुक्ल जी ने भक्ति काव्य को दो मुख्य धाराओं और चार शाखाओं में विभाजित किया है:

  1. निर्गुण धारा:

    • ज्ञानाश्रयी शाखा: इसके प्रतिनिधि कवि कबीर हैं। शुक्ल जी ने इनकी भाषा को 'सधुक्कड़ी' कहा और इनके 'अक्खड़पन' की चर्चा की।

    • प्रेमाश्रयी शाखा (सूफी): इसके प्रतिनिधि कवि जायसी हैं। शुक्ल जी इन्हें बहुत सम्मान देते थे और इनकी 'पद्मावत' को सर्वश्रेष्ठ प्रेमाख्यानक माना।

  2. सगुण धारा:

    • रामभक्ति शाखा: प्रतिनिधि कवि तुलसीदास। शुक्ल जी के अनुसार तुलसी 'लोक-मंगल' के सर्वोच्च कवि हैं।

    • कृष्णभक्ति शाखा: प्रतिनिधि कवि सूरदास। शुक्ल जी ने इन्हें 'वात्सल्य का सम्राट' और 'जीवनोत्सव का कवि' कहा।


2. प्रमुख कवियों पर शुक्ल जी के 'तीखे' और 'मीठे' मत

कविशुक्ल जी का महत्वपूर्ण मत
कबीर"कबीर ने प्रतिभा तो बड़ी प्रखर थी, पर उनकी भाषा अनगढ़ थी।"
जायसी"जायसी का विरह वर्णन हिंदी साहित्य में अद्वितीय है।"
तुलसी"तुलसीदास जी का काव्य समन्वय (Harmony) की विराट चेष्टा है।"
सूरदास"सूरदास ने बंद आँखों से वात्सल्य का कोना-कोना झाँक लिया है।"
नंददास"और कवि गढ़िया, नंददास जड़िया।" (उनके शब्द-चयन की प्रशंसा)

3. भक्तिकाल की 'त्रिवेणी' का दार्शनिक आधार

शुक्ल जी ने तीन कवियों को विशेष महत्व दिया जिन्हें 'त्रिवेणी' कहा जाता है:

  1. जायसी (सूफी): ईश्वर को 'प्रियतम' रूप में देखना।

  2. सूरदास (कृष्ण भक्ति): ईश्वर को 'सखा' और 'बालक' रूप में देखना।

  3. तुलसीदास (राम भक्ति): ईश्वर को 'मर्यादा पुरुषोत्तम' और 'स्वामी' रूप में देखना।

विशेष नोट: शुक्ल जी ने मीराबाई को भक्तिकाल में तो रखा, लेकिन उनके 'राजस्थानी मिश्रित ब्रज' और अत्यधिक भावुकता के कारण उन्हें तुलसी या सूर के समकक्ष स्थान नहीं दिया।


4. परीक्षा के लिए 'की-पॉइंट्स'

  • भक्ति आंदोलन का केंद्र: शुक्ल जी ने माना कि भक्ति द्रविड़ (दक्षिण) से आई और उत्तर भारत में फैली।

  • लोक-मंगल बनाम लोक-रंजन: शुक्ल जी ने तुलसी के 'लोक-मंगल' (समाज का भला) को सूर के 'लोक-रंजन' (केवल मनोरंजन) से ऊपर रखा।

  • रहस्यवाद: शुक्ल जी जायसी के 'भावात्मक रहस्यवाद' को कबीर के 'साधनात्मक रहस्यवाद' से श्रेष्ठ मानते थे।


 

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