आचार्य शुक्ल का 'आधुनिक काल'

 आचार्य शुक्ल के इतिहास के सबसे अंतिम और महत्वपूर्ण खंड 'आधुनिक काल' का  विश्लेषण । शुक्ल जी ने इसे 'गद्य काल' कहा है और इसकी समय सीमा संवत् 1900 से अब तक मानी है।


आचार्य शुक्ल का 'आधुनिक काल' ( विश्लेषण)

शुक्ल जी ने आधुनिक काल को दो मुख्य खंडों में बाँटा है: गद्य खंड और काव्य खंड। उन्होंने इसे तीन 'उत्थानों' के माध्यम से समझाया है।

1. काल विभाजन का ढांचा

  • प्रथम उत्थान (संवत् 1925–1950): भारतेंदु हरिश्चंद्र और उनका मंडल।

  • द्वितीय उत्थान (संवत् 1950–1975): महावीर प्रसाद द्विवेदी और खड़ी बोली का परिष्कार।

  • तृतीय उत्थान (संवत् 1975 से): छायावाद और रहस्यवाद का उदय।


2. प्रमुख युगों पर शुक्ल जी के विचार

A. भारतेंदु युग (प्रथम उत्थान):

  • शुक्ल जी ने भारतेंदु को 'हिंदी गद्य का प्रवर्तक' माना।

  • उन्होंने लिखा: "भारतेंदु ने हमारे जीवन और साहित्य के बीच के विच्छेद को दूर किया।"

  • इस युग की विशेषता 'देश-प्रेम' और 'प्राचीन-नवीन का समन्वय' बताई।

B. द्विवेदी युग (द्वितीय उत्थान):

  • शुक्ल जी ने इस युग को 'इतिवृत्तात्मकता' (तथ्यों का वर्णन) का युग कहा।

  • महावीर प्रसाद द्विवेदी के बारे में कहा: "इन्होंने हिंदी गद्य को व्याकरण-सम्मत और परिमार्जित बनाया।"

  • इस युग के कवियों में उन्होंने श्रीधर पाठक को 'सच्चा स्वच्छंदतावादी' (True Romantic) माना।

C. छायावाद (तृतीय उत्थान):

  • शुक्ल जी छायावाद के बहुत बड़े प्रशंसक नहीं थे। उन्होंने इसे 'शैली-विशेष' माना।

  • उन्होंने छायावाद का संबंध ईसाई संतों के 'फैंटसमेटा' (Phantasmata) और 'रहस्यवाद' से जोड़ा।

  • मुकुटधर पांडेय को इन्होंने छायावाद का प्रवर्तक माना।


3. कवियों पर शुक्ल जी की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ

कवि / लेखकशुक्ल जी का मत
मैथिलीशरण गुप्तइन्हें 'सामंजस्यवादी कवि' कहा (पुरानी और नई प्रवृत्तियों का मेल)।
जयशंकर प्रसाद'कामायनी' को मानवता का मनोवैज्ञानिक इतिहास माना।
सुमित्रानंदन पंतइनकी कविता में 'प्रकृति का मानवीकरण' सबसे सुंदर है।
सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'ये 'नाद-सौंदर्य' और 'ओज' के कवि हैं।
महादेवी वर्माइनके यहाँ 'रहस्यवाद' शुद्ध और भावात्मक है।

4. गद्य विधाओं का विकास (शुक्ल जी के अनुसार)

  • उपन्यास: लाला श्रीनिवास दास के 'परीक्षा गुरु' को हिंदी का प्रथम अंग्रेजी ढंग का मौलिक उपन्यास माना।

  • नाटक: आधुनिक नाटकों का उदय भारतेंदु से माना और 'आनंद रघुनंदन' को प्रथम नाटक की श्रेणी में रखा।

  • निबंध: निबंधों के क्षेत्र में उन्होंने 'बालकृष्ण भट्ट' और 'प्रतापनारायण मिश्र' की भाषा की सराहना की।


5. परीक्षा के लिए विशेष 'की-वर्ड्स' (Modern Era)

  • स्वच्छंदतावाद (Romanticism): इसके प्रवर्तक शुक्ल जी के अनुसार 'श्रीधर पाठक' हैं।

  • इतिवृत्तात्मकता: यह द्विवेदी युग की सबसे बड़ी विशेषता है।

  • मधुचर्या: शुक्ल जी ने छायावाद की मधुर कविताओं को 'मधुचर्या' कहा।

  • गद्य का आविर्भाव: शुक्ल जी ने गद्य के उदय को आधुनिक काल की 'सबसे प्रधान साहित्यिक घटना' माना।


 

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