हिंदी साहित्य में 'प्रथम कवि' को लेकर विद्वानों में काफी मतभेद रहे हैं, क्योंकि हर विद्वान ने अलग-अलग मापदंडों (जैसे भाषा, काल या रचना) को आधार बनाया है।
यहाँ उन प्रमुख कवियों और उन्हें प्रथम मानने वाले विद्वानों की सूची दी गई है:
हिंदी के 'प्रथम कवि' और उनके प्रस्तोता
| विद्वान (इतिहासकार) | प्रथम कवि का नाम | समय (लगभग) | तर्क / आधार |
| राहुल सांकृत्यायन | सरहपा | 769 ई. | इनकी रचनाओं में हिंदी की शुरुआती प्रवृत्तियाँ मिलती हैं। (सर्वाधिक मान्य मत) |
| डॉ. गणपति चन्द्र गुप्त | शालिभद्र सूरि | 1184 ई. | 'भरतेश्वर बाहुबली रास' एक प्रामाणिक और पूर्ण ग्रंथ है। |
| शिवसिंह सेंगर | पुष्य या पुण्ड | 10वीं शताब्दी | 'शिवसिंह सरोज' में इनका उल्लेख मिलता है। |
| डॉ. रामकुमार वर्मा | स्वयंभू | 693 ई. | अपभ्रंश के महान कवि, जिन्हें हिंदी का पूर्व रूप माना गया। |
| आचार्य रामचंद्र शुक्ल | राजा मुंज या भोज | 993 ई. | पुरानी हिंदी के प्रयोग के आधार पर। |
| चंद्रधर शर्मा गुलेरी | राजा मुंज | 10वीं शताब्दी | 'पुरानी हिंदी' का प्रथम प्रयोगकर्ता माना। |
| हजारी प्रसाद द्विवेदी | अब्दुर्रहमान | 12वीं-13वीं शताब्दी | 'संदेश रासक' के रचयिता। |
निष्कर्ष: किसे माना जाए?
यद्यपि डॉ. गणपति चन्द्र गुप्त ने शालिभद्र सूरि के पक्ष में कड़े तर्क दिए, लेकिन आज अधिकांश परीक्षाओं और विद्वानों के बीच राहुल सांकृत्यायन का मत सबसे अधिक प्रचलित है। उनके अनुसार 'सरहपा' ही हिंदी के आदि-कवि हैं क्योंकि उनकी 'दोहाकोश' जैसी रचनाओं ने आने वाली भक्ति काव्य परंपरा (विशेषकर कबीर) के लिए जमीन तैयार की थी।
एक विशेष बिंदु: डॉ. गणपति चन्द्र गुप्त ने केवल कवि ही नहीं, बल्कि हिंदी की पहली रचना को लेकर भी अपना स्पष्ट मत दिया है। उनके अनुसार 'भरतेश्वर बाहुबली रास' हिंदी की पहली रचना है, जबकि आचार्य देवसेन की 'श्रावकाचार' (933 ई.) को भी कई विद्वान पहली रचना मानते हैं।
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