आचार्य शुक्ल के इतिहास के सबसे विवादास्पद और रोचक कालखंड 'रीतिकाल' का विस्तृत विश्लेषण । शुक्ल जी ने इस काल को 'संवत् 1700 से 1900' तक माना है।
आचार्य शुक्ल का 'रीतिकाल' ( विश्लेषण)
शुक्ल जी ने इस काल को 'रीति' इसलिए कहा क्योंकि इस समय के कवियों ने काव्य के लक्षणों (जैसे अलंकार, रस, नायिका-भेद) को आधार बनाकर अपनी कविताएँ लिखीं।
1. रीतिकाल का वर्गीकरण (फ्लोचार्ट)
शुक्ल जी ने रीतिकाल के कवियों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बाँटा है (हालाँकि बाद के विद्वानों ने तीन श्रेणियाँ बनाईं):
रीति-ग्रंथकार कवि: वे जिन्होंने लक्षण ग्रंथ लिखे (जैसे: चिंतामणि, देव, भूषण)।
अन्य कवि: जिन्होंने लक्षण ग्रंथ तो नहीं लिखे, लेकिन काव्य-शैली वही रखी (जैसे: बिहारी)।
नोट: शुक्ल जी ने 'रीतिमुक्त' (घनानंद आदि) को भी इसी खंड में स्थान दिया है।
2. रीतिकाल के प्रमुख कवियों पर शुक्ल जी के विशेष मत
| कवि | शुक्ल जी की प्रसिद्ध टिप्पणी |
| चिंतामणि त्रिपाठी | शुक्ल जी ने इन्हें रीतिकाल का प्रवर्तक माना है (सिद्धांत के आधार पर)। |
| केशवदास | "केशव को कवि हृदय नहीं मिला था।" (इन्हें इन्होंने 'अलंकारवादी' कहा)। |
| बिहारी | "बिहारी की सतसई रस के छोटे-छोटे छींटे उड़ाने वाली है।" |
| घनानंद | "यह साक्षात् रसमूर्ति और जबाँदानी का दावा रखने वाले कवि थे।" |
| भूषण | "भूषण के वीर रस के उद्गार सारी जनता के हृदय की संपत्ति हुए।" |
| देव | इनके शब्दों में 'पद-मैत्री' बहुत अच्छी है, पर कहीं-कहीं अर्थ गायब हो जाता है। |
3. रीतिकाल की मुख्य विशेषताएँ (शुक्ल जी की दृष्टि में)
मुक्तक की प्रधानता: इस काल में प्रबंध काव्य कम लिखे गए। शुक्ल जी ने कहा— "यदि प्रबंध काव्य एक विस्तृत वनस्थली है, तो मुक्तक एक चुना हुआ गुलदस्ता है।"
शृंगार की अतिशयता: इस काल में कवियों का ध्यान केवल नायिका के शारीरिक सौंदर्य और विलास पर रहा।
ब्रजभाषा का उत्कर्ष: शुक्ल जी के अनुसार, ब्रजभाषा अपनी पूर्ण प्रौढ़ता पर इसी काल में पहुँची।
राज्याश्रय: कविता राजाओं को प्रसन्न करने का साधन बन गई थी।
4. शुक्ल जी और 'रीतिमुक्त' धारा (घनानंद और बोधा)
शुक्ल जी ने घनानंद की बहुत प्रशंसा की है। वे मानते थे कि बाकी कवि जहाँ 'मस्तिष्क' से कविता लिख रहे थे, घनानंद 'हृदय' से लिख रहे थे। उन्होंने लिखा:
"घनानंद ने न तो बिहारी की तरह ताप को बाहरी पैमानों से मापा है, न ही बाहरी ऊहात्मक पद्धति अपनाई है।"
5. परीक्षा के लिए विशेष 'ट्रिक' (रीतिकाल)
प्रवर्तक: शुक्ल जी के अनुसार— चिंतामणि त्रिपाठी। (डॉ. नगेंद्र के अनुसार— केशवदास)।
कठिन काव्य का प्रेत: केशवदास।
पक्का राष्ट्रवादी कवि: भूषण (क्योंकि उन्होंने हिंदू धर्म और वीरता की बात की)।
बिहारी की भाषा: शुक्ल जी ने इसे 'चलती हुई' और 'साहित्यिक' ब्रजभाषा कहा है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें