आचार्य रामचंद्र शुक्ल के 'हिंदी साहित्य का इतिहास' की सभी महत्वपूर्ण जानकारियों को समाहित किया गया है। आप परीक्षा से ठीक पहले इसे देखकर अपनी पूरी तैयारी को दोहरा सकते हैं।
📊 आचार्य शुक्ल: हिंदी साहित्य का इतिहास (संपूर्ण निचोड़)
I. ग्रंथ का परिचय
प्रकाशन वर्ष: 1929 (प्रारंभ में 'हिंदी शब्दसागर' की भूमिका)।
पद्धति: विधेयवादी (जाति, वातावरण, क्षण)।
मूल सिद्धांत: साहित्य जनता की चित्तवृत्ति का प्रतिबिंब है।
II. काल-विभाजन और प्रमुख तथ्य
| कालखंड | समय (संवत्) | शुक्ल जी का नामकरण | मुख्य प्रवृत्ति | प्रतिनिधि कवि |
| आदिकाल | 1050-1375 | वीरगाथा काल | वीरता और युद्ध वर्णन | चंदबरदाई |
| भक्तिकाल | 1375-1700 | पूर्व-मध्यकाल | लोक-मंगल और भक्ति | तुलसी, सूर, जायसी |
| रीतिकाल | 1700-1900 | उत्तर-मध्यकाल | शृंगार और रीति-निरूपण | चिंतामणि, बिहारी |
| आधुनिक काल | 1900-अब तक | गद्य काल | गद्य का विकास, खड़ी बोली | भारतेंदु, द्विवेदी |
IV. शुक्ल जी के द्वारा प्रदान किए गये कवियों के उपनाम (Quick Recall)
तुलसीदास: लोक-मंगल के विधाता।
सूरदास: वात्सल्य रस के सम्राट (कोना-कोना झाँक आए)।
केशवदास: कठिन काव्य का प्रेत (हृदयहीन कवि)।
घनानंद: साक्षात् रसमूर्ति।
बिहारी: रस के छोटे-छोटे छींटे उड़ाने वाले।
विद्यापति: शुद्ध शृंगारी (आध्यात्मिक चश्मे वाली टिप्पणी)।
मैथिलीशरण गुप्त: सामंजस्यवादी कवि।
V. महत्वपूर्ण प्रथम (Firsts)
प्रथम मौलिक उपन्यास: परीक्षा गुरु (लाला श्रीनिवास दास)।
प्रथम नाटक: आनंद रघुनंदन (विश्वनाथ सिंह)।
प्रथम प्रौढ़ गद्य लेखक: रामप्रसाद निरंजनी।
छायावाद के प्रवर्तक: मुकुटधर पांडेय।
रीतिकाल के प्रवर्तक: चिंतामणि त्रिपाठी।
VI. शुक्ल जी के 3 सबसे बड़े सिद्धांत
लोक-मंगल: साहित्य का उद्देश्य समाज का कल्याण होना चाहिए।
विरोधों का सामंजस्य: महान कवि (जैसे तुलसी) विरोधी परिस्थितियों में भी संतुलन बनाए रखता है।
साधारणीकरण: पाठक का हृदय कवि के आलंबन के साथ जुड़ जाना।
💡 अंतिम टिप्स:
संवत् ↔ ईस्वी: संवत् में से 57 घटाना न भूलें।
त्रिवेणी: शुक्ल जी की त्रिवेणी में तुलसी, सूर और जायसी आते हैं (कबीर नहीं)।
इतिवृत्तात्मकता: अगर यह शब्द आए, तो समझ लीजिए बात द्विवेदी युग की हो रही है।
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