डॉ. गणपति चन्द्र गुप्त द्वारा शालिभद्र सूरि को हिंदी का प्रथम कवि मानने के पीछे जो तीसरा बिंदु (रास परंपरा और काव्य उत्कृष्टता) है, वह बहुत महत्वपूर्ण है। डॉ. गुप्त ने केवल भाषा को आधार नहीं बनाया, बल्कि 'साहित्यिक गरिमा' को भी परखा।
इसका विस्तार से विश्लेषण निम्नलिखित है:
1. 'रास' परंपरा का शास्त्रीय आधार
हिंदी के आदिकाल में जैन कवियों द्वारा लिखी गई 'रास' परंपरा का बहुत बड़ा स्थान है। डॉ. गुप्त का तर्क था कि 'भरतेश्वर बाहुबली रास' (1184 ई.) इस परंपरा की पहली ऐसी रचना है जिसमें महाकाव्य के तत्व मिलते हैं।
इससे पहले के कवियों (जैसे सरहपा) की रचनाएँ मुक्तक या छिटपुट दोहों के रूप में थीं।
शालिभद्र सूरि ने एक सुसंगठित कथा (Narrative) प्रस्तुत की, जो साहित्य की दृष्टि से अधिक ऊँची श्रेणी की मानी जाती है।
2. विषय-वस्तु की गंभीरता (भरतेश्वर और बाहुबली का युद्ध)
इस काव्य की कहानी दो भाइयों—भरतेश्वर और बाहुबली—के बीच सत्ता के संघर्ष और अंततः उनके वैराग्य की है।
वीर रस और शांत रस का समन्वय: डॉ. गुप्त ने बताया कि इस रचना में युद्धों का सजीव वर्णन (वीर रस) है, लेकिन अंत में मोक्ष और शांति (शांत रस) की स्थापना होती है।
यह 'हिंसा से अहिंसा' की ओर जाने वाली भारतीय दृष्टि को वैज्ञानिक रूप से पेश करती है।
3. भाषा का 'हिंदीपन' (Evolution of Hindi)
गुप्त जी के अनुसार, सरहपा की भाषा में अपभ्रंश बहुत ज्यादा था, जिसे समझना कठिन था। लेकिन शालिभद्र सूरि की भाषा में:
हिंदी के कारक चिह्नों का प्रयोग बढ़ने लगा था।
क्रियापदों का रूप आधुनिक हिंदी के करीब आ रहा था।
छंद योजना (जैसे रास छंद) हिंदी की अपनी प्रकृति के अनुकूल थी।
4. ऐतिहासिक प्रमाणिकता
डॉ. गुप्त ने तर्क दिया कि इतिहास में कल्पना से ज्यादा 'प्रमाण' का महत्व है।
शालिभद्र सूरि की रचना का समय (1184 ई.) पूरी तरह स्पष्ट और लिखित रूप में मौजूद है।
उन्होंने कहा कि जब हमारे पास एक लिखित, पूर्ण और उच्च कोटि की रचना मौजूद है, तो हम केवल बिखरी हुई पंक्तियों के आधार पर किसी और को प्रथम कवि क्यों मानें?
तुलनात्मक सारांश
| विशेषता | अन्य कवि (जैसे सरहपा) | शालिभद्र सूरि (डॉ. गुप्त का मत) |
| रचना का स्वरूप | मुक्तक, फुटकर दोहे | प्रबंध काव्य, सुसंगठित ग्रंथ |
| प्रमाणिकता | संदेहपूर्ण या बाद में संकलित | पूर्णतः प्रामाणिक और काल-निर्धारित |
| साहित्यिक शिल्प | सरल उपदेशात्मक | अलंकार, छंद और रसों से पूर्ण |
निष्कर्ष: डॉ. गुप्त के लिए 'प्रथम कवि' का अर्थ केवल समय में सबसे पुराना होना नहीं था, बल्कि साहित्यिक मानक (Literary Standard) पर खरा उतरना भी था। उनके अनुसार, शालिभद्र सूरि से ही हिंदी साहित्य की एक 'परिपक्व' शुरुआत होती है।
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