डॉ. गणपति चन्द्र गुप्त के 'हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास' की कुछ ऐसी महत्वपूर्ण पंक्तियाँ और स्थापनाएँ हैं, जो अक्सर परीक्षाओं और साहित्यानुरागियों के बीच चर्चा का विषय रहती हैं। ये पंक्तियाँ उनके वैज्ञानिक और तर्कपूर्ण दृष्टिकोण को स्पष्ट करती हैं:
1. साहित्य के इतिहास की परिभाषा पर
"साहित्य का इतिहास वस्तुतः साहित्य की विकासमान चेतना का इतिहास है।"
(अर्थात् साहित्य स्थिर नहीं है, वह निरंतर बदलती हुई मानवीय चेतना का परिणाम है।)
2. कार्य-कारण संबंध (Causality) पर
"इतिहास का अर्थ केवल अतीत के तथ्यों का संकलन मात्र नहीं है, बल्कि उन तथ्यों के पीछे कार्य-कारण संबंध की खोज करना है।"
(यहाँ वे स्पष्ट करते हैं कि कोई भी साहित्यिक घटना अचानक नहीं होती, उसके पीछे सामाजिक या मनोवैज्ञानिक कारण होते हैं।)
3. प्रथम कवि (शालिभद्र सूरि) के संबंध में
"यदि किसी एक कवि को हिंदी का प्रथम कवि होने का गौरव प्राप्त हो सकता है, तो वे शालिभद्र सूरि ही हैं, क्योंकि उनकी रचना 'भरतेश्वर बाहुबली रास' में भाषा, काव्य-रूप और संवेदना का वह परिपक्व रूप मिलता है जो प्रारंभिक रचनाओं में दुर्लभ है।"
4. भक्ति काल के उदय पर (शुक्ल जी के विरोध में)
"हिंदी भक्ति काव्य का उदय केवल पराजित हिंदू जाति की निराशा का परिणाम नहीं था, बल्कि यह भारतीय साधना पद्धति और सांस्कृतिक परंपरा का एक स्वाभाविक विकास था।"
(यह पंक्ति बहुत प्रसिद्ध है क्योंकि यहाँ वे आचार्य शुक्ल के 'निराशावाद' वाले तर्क को चुनौती देते हैं।)
5. काल-विभाजन की वैज्ञानिकता पर
"साहित्यिक प्रवृत्तियों का वर्गीकरण उनके आश्रय (Patronage) के आधार पर किया जाना अधिक तर्कसंगत है—धर्माश्रय, राज्याश्रय और लोकांश्रय।"
(इन्होंने पहली बार साहित्य को दरबार, धर्म और लोक के त्रिकोण पर रखकर देखा।)
6. आधुनिक काल के संबंध में
"1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम हिंदी साहित्य के आधुनिक काल की वास्तविक विभाजक रेखा है, जिसने साहित्य को जन-जीवन और राष्ट्रीयता के नए धरातल पर खड़ा किया।"
डॉ. गुप्त की मान्यताओं का सार:
उनकी सबसे प्रमुख स्थापना यह रही है कि "साहित्य शास्त्र और इतिहास के सिद्धांतों को वैज्ञानिक कसौटी पर कसा जाना चाहिए।" उन्होंने पुराने पूर्वाग्रहों को त्याग कर साक्ष्य (Evidence) और तर्क (Logic) को प्रधानता दी।
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