UPHESC (इकाई-9) के पाठ्यक्रम में निर्धारित हिंदी साहित्य के इन प्रसिद्ध नाटकों के लेखक, प्रकाशन वर्ष और उनसे संबंधित विवरण नीचे दिए गए चार्ट में हैं:
प्रमुख हिंदी नाटक: लेखक और प्रकाशन वर्ष
| नाटक का नाम | लेखक | प्रकाशन वर्ष | विशेष विवरण/संग्रह |
| अंधेर नगरी | भारतेंदु हरिश्चंद्र | 1881 | यह एक प्रहसन (व्यंग्य नाटक) है। |
| चंद्रगुप्त | जयशंकर प्रसाद | 1931 | ऐतिहासिक नाटक (मौर्य काल पर आधारित)। |
| अंधा युग | धर्मवीर भारती | 1954 | यह एक 'गीति-नाट्य' (Verse Play) है। |
| सिंदूर की होली | लक्ष्मीनारायण मिश्र | 1934 | समस्या प्रधान नाटक (विधवा विवाह/नैतिकता)। |
| आषाढ़ का एक दिन | मोहन राकेश | 1958 | महाकवि कालिदास के जीवन पर आधारित। |
| अंजो दीदी | उपेंद्रनाथ 'अश्क' | 1955 | अनुशासन और कठोर नियंत्रण पर आधारित सामाजिक नाटक। |
कुछ महत्वपूर्ण तथ्य:
अंधेर नगरी: भारतेंदु जी ने इस नाटक की रचना केवल एक रात में की थी ताकि इसे नेशनल थिएटर में खेला जा सके।
अंधा युग: यह महाभारत के 18वें दिन के बाद की कथा पर आधारित है और आधुनिक युग की विभीषिका को दर्शाता है।
आषाढ़ का एक दिन: इसे हिंदी का पहला 'आधुनिक नाटक' माना जाता है। इसे संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार भी प्राप्त हुआ था।
सिंदूर की होली: यह नाटक समाज में प्रचलित सिंदूर (विवाह) की पवित्रता और प्रेम के द्वंद्व को तीन अंकों में प्रस्तुत करता है।
प्रमुख नाटक और उनके पात्र
| नाटक का नाम | प्रमुख पात्र (Characters) |
| अंधेर नगरी | महंत, नारायण दास, गोवर्धन दास, राजा (चौपट राजा), कुजड़िन, घासीराम |
| चंद्रगुप्त | चंद्रगुप्त, चाणक्य, कार्नेलिया, सुआसिनी, राक्षस, अलका, पर्वतेश्वर |
| अंधा युग | अश्वत्थामा, गांधारी, धृतराष्ट्र, युयुत्सु, संजय, विदुर, कृष्ण, वृद्ध याचक |
| आषाढ़ का एक दिन | कालिदास, मल्लिका, अंबिका, विलोम, मातुल, दंतुल, प्रियंगुमंजरी |
| सिंदूर की होली | मुरारीलाल, मनोरमा, चंद्रकला, भगवंत सिंह, रजनीकांत |
| अंजो दीदी | अंजो (अंजली), श्रीपत (भाई), इंद्रनारायण (पति), अनीम, ओमी |
पात्रों का संक्षिप्त विश्लेषण:
चाणक्य (चंद्रगुप्त): यह पात्र राजनीति, कूटनीति और दृढ़ संकल्प का प्रतीक है।
अश्वत्थामा (अंधा युग): महाभारत युद्ध के अंत में अश्वत्थामा की कुंठा और प्रतिशोध की भावना को 'अंधे युग' की मानवीय विकृति के रूप में दिखाया गया है।
मल्लिका (आषाढ़ का एक दिन): यह त्याग और निस्वार्थ प्रेम की प्रतिमूर्ति है, जो कालिदास की सफलता के लिए स्वयं का बलिदान कर देती है।
अंजो दीदी (अंजो दीदी): यह पात्र यांत्रिक अनुशासन और हद से ज्यादा नियंत्रण (Over-discipline) की सनक को दर्शाता है, जो अंततः त्रासदी का कारण बनता है।
गोवर्धन दास (अंधेर नगरी): यह लोभी स्वभाव का पात्र है जो 'टके सेर भाजी, टके सेर खाजा' के लालच में फाँसी के फंदे तक पहुँच जाता है।
नाटकों की संरचना:
इन नाटकों की संरचना को समझने के लिए यह तालिका देखें:
| नाटक | विधा/अंक | मूल संवेदना |
| अंधेर नगरी | प्रहसन (6 दृश्य) | विवेकहीन शासन की आलोचना |
| अंधा युग | गीति-नाट्य (5 अंक) | युद्धोपरांत विनाश और नैतिक पतन |
| आषाढ़ का एक दिन | नाटक (3 अंक) | रचनाकार का सत्ता और प्रेम के बीच द्वंद्व |
हिंदी नाटक: मूल विषय (Themes) का चार्ट
| नाटक का नाम | मुख्य विषय (Theme) | संदेश और उद्देश्य |
| अंधेर नगरी | विवेकहीन शासन पर व्यंग्य | यह दर्शाता है कि जहाँ राजा मूर्ख और न्याय-अन्याय में भेद न करने वाला होता है, वहाँ निर्दोष भी फँस जाते हैं। |
| चंद्रगुप्त | राष्ट्रीयता और राजनीति | विदेशी आक्रमणकारियों के विरुद्ध भारत की एकता, चाणक्य की कूटनीति और राष्ट्र-प्रेम का चित्रण। |
| अंधा युग | युद्ध की विभीषिका और नैतिक पतन | महाभारत के बाद की स्थिति के माध्यम से आधुनिक युग के वैचारिक अंधेरे, कुंठा और युद्ध की व्यर्थता को दिखाना। |
| सिंदूर की होली | सामाजिक और मनोवैज्ञानिक समस्या | विधवा-विवाह की समस्या, समाज की दोहरी नैतिकता और कानून बनाम भावना के बीच का द्वंद्व। |
| आषाढ़ का एक दिन | सत्ता और सृजनात्मकता का संघर्ष | एक रचनाकार (कालिदास) का राज्याश्रय (पावर) और अपने मूल परिवेश व प्रेम (मल्लिका) के बीच भटकने की त्रासदी। |
| अंजो दीदी | यांत्रिक अनुशासन (मशीनी अनुशासन) | अत्यधिक कठोर नियंत्रण और अनुशासन की सनक कैसे मानवीय संवेदनाओं को कुचल देती है और रिश्तों को खत्म करती है। |
विशेष विश्लेषण:
अंधेर नगरी: 'टके सेर भाजी, टके सेर खाजा' के माध्यम से यह दिखाया गया है कि जहाँ गुण और अवगुण का मूल्य समान हो, वहाँ विनाश निश्चित है।
अंधा युग: धर्मवीर भारती ने इसमें कृष्ण के मानवीय रूप और अश्वत्थामा की कुंठा को केंद्र में रखकर आधुनिक मानव की समस्याओं को उभारा है।
आषाढ़ का एक दिन: यह नाटक सिखाता है कि सत्ता की चमक के पीछे भागने वाला कलाकार अपनी मौलिकता और प्रेम दोनों खो बैठता है।
अंजो दीदी: यह मध्यमवर्गीय परिवार के उन घरों की कहानी है जहाँ 'घड़ी' और 'नियम' इंसान की खुशियों से ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
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