UPHESC (इकाई-9) के पाठ्यक्रम में निर्धारित इन निबंधों का सही विवरण, उनके लेखक, प्रकाशन वर्ष और उनके संग्रह के साथ नीचे दिया गया है:
UPHESC हिंदी पाठ्यक्रम: निर्धारित निबंधों का प्रामाणिक चार्ट
| निबंध का नाम | लेखक | प्रकाशन वर्ष | मूल संग्रह / पत्रिका |
| भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है? | भारतेंदु हरिश्चंद्र | 1884 | 'भारतेंदु ग्रंथावली' (बलिया व्याख्यान) |
| वैष्णवता और भारतवर्ष | भारतेंदु हरिश्चंद्र | 1884 | 'भारतेंदु ग्रंथावली' |
| आप | प्रताप नारायण मिश्र | - | 'प्रताप पीयूष' / 'ब्राह्मण' पत्रिका |
| धोखा | प्रताप नारायण मिश्र | - | 'प्रताप पीयूष' / 'ब्राह्मण' पत्रिका |
| साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है | बालकृष्ण भट्ट | 1881 | 'हिंदी प्रदीप' / 'भट्ट निबंधावली' |
| शिवशंभु के चिट्ठे | बालमुकुंद गुप्त | 1904-05 | 'भारत मित्र' (संग्रह रूप में 1905) |
| धर्म और समाज | बालमुकुंद गुप्त | - | 'बालमुकुंद गुप्त निबंधावली' |
| कवि कर्त्तव्य | महावीर प्रसाद द्विवेदी | 1901 | 'सरस्वती' / 'द्विवेदी निबंधावली' |
| आचरण की सभ्यता | सरदार पूर्ण सिंह | 1912 | 'सरस्वती' |
| श्रद्धा और भक्ति | रामचंद्र शुक्ल | 1919 (प्रथम) | 'चिंतामणि' (भाग-1, 1939) |
| नाखून क्यों बढ़ते हैं? | हजारी प्रसाद द्विवेदी | 1951 | 'कल्पलता' |
| महाकवि की तर्जनी | कुबेरनाथ राय | 1979 | 'महाकवि की तर्जनी' |
| अस्ति की पुकार हिमालय | विद्यानिवास मिश्र | - | 'अंगद की नियति' |
| विकलांग श्रद्धा का दौर | हरिशंकर परसाई | 1980 | 'विकलांग श्रद्धा का दौर' |
इन निबंधों के बारे में मुख्य बिंदु:
भारतेंदु हरिश्चंद्र: 'भारतवर्षोन्नति' वास्तव में बलिया के ददरी मेले में दिया गया एक भाषण है, जिसमें उन्होंने देश के पिछड़ेपन के कारणों पर प्रहार किया है।
प्रताप नारायण मिश्र: इन्होंने 'आप' और 'धोखा' जैसे साधारण शब्दों पर अत्यंत गंभीर और विनोदी निबंध लिखे हैं।
बालकृष्ण भट्ट: इनका निबंध 'साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है' साहित्य की सामाजिक भूमिका को स्पष्ट करने वाला सबसे महत्वपूर्ण निबंध माना जाता है।
रामचंद्र शुक्ल: 'श्रद्धा और भक्ति' एक मनोवैज्ञानिक (मनोविकार संबंधी) निबंध है, जिसमें इन दोनों भावों के बीच के सूक्ष्म अंतर को स्पष्ट किया गया है।
कुबेरनाथ राय: 'महाकवि की तर्जनी' में उन्होंने भारतीय संस्कृति और वाल्मीकि के महाकाव्यत्व पर गंभीर विमर्श किया है।
विद्यानिवास मिश्र: 'अस्ति की पुकार हिमालय' में हिमालय को भारतीय संस्कृति और चेतना के प्रतीक के रूप में देखा गया है।
महत्वपूर्ण निबंध: प्रमुख पंक्तियाँ और विचार
| निबंध | महत्वपूर्ण उद्धरण / मुख्य तर्क |
| भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है? | "हमारे हिंदुस्तानी लोग तो रेल की गाड़ी हैं... अगर इंजन लग जाए तो ये क्या नहीं कर सकते?" |
| वैष्णवता और भारतवर्ष | "सब मतों का फल एक ही है, केवल मार्ग भिन्न-भिन्न हैं।" (इसमें भारत की एकता का आधार वैष्णव धर्म को माना गया है।) |
| साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है | "जैसे मनुष्य की मूर्ति से उसके भीतर के भावों का अनुभव होता है, वैसे ही साहित्य से उस जाति के मानसिक विकास का बोध होता है।" |
| शिवशंभु के चिट्ठे | "आशा का अंत! महाराज, इस देश में आशा की बड़ी महिमा है। पर इस समय यहाँ के लोगों की आशा का अंत हो गया है।" (लॉर्ड कर्जन को संबोधित) |
| आचरण की सभ्यता | "सभ्य आचरण की भाषा मौन है।" और "आचरण की सभ्यता का दर्शन किसी मंदिर या गिरजाघर में नहीं, मनुष्य के अंतःकरण में होता है।" |
| श्रद्धा और भक्ति | "श्रद्धा का व्यापार स्थल विस्तृत है, भक्ति का एकांत।" तथा "श्रद्धा और प्रेम के योग का नाम भक्ति है।" |
| नाखून क्यों बढ़ते हैं? | "नाखून का बढ़ना मनुष्य की अंध-सहजात वृत्ति का परिणाम है, जो उसके भीतर की पशुता का प्रतीक है।" |
| विकलांग श्रद्धा का दौर | "श्रद्धा भी आजकल विकलांग हो गई है, वह बैसाखियों के सहारे चलती है।" (सामाजिक ढोंग पर प्रहार) |
| कवि कर्त्तव्य | "कविता का मुख्य उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि उपदेश और ज्ञान-प्रसार भी होना चाहिए।" |
| धोखा | "धोखा खाए बिना किसी का काम नहीं चलता... क्योंकि संसार ही धोखे की टट्टी है।" |
तैयारी के लिए कुछ 'स्मार्ट टिप्स':
प्रताप नारायण मिश्र के निबंध: इनके निबंधों (आप, धोखा) में कानपुर की स्थानीय भाषा और मुहावरों का पुट मिलता है। 'धोखा' निबंध में वे कहते हैं कि ईश्वर भी 'माया' के रूप में सबसे बड़ा धोखेबाज है।
विद्यानिवास मिश्र और कुबेरनाथ राय: ये दोनों ललित निबंधकार हैं। इनकी भाषा संस्कृतनिष्ठ है। 'अस्ति की पुकार हिमालय' में 'अस्ति' का अर्थ 'होना' या 'अस्तित्व' से है।
बालमुकुंद गुप्त: इनके यहाँ व्यंग्य के साथ-साथ 'करुणा' भी है। 'शिवशंभु' एक काल्पनिक पात्र है जो नशे में सच बोलता है।
बालकृष्ण भट्ट: इन्हें 'हिंदी का मॉन्टेन' कहा जाता है। 'साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है' में वे बताते हैं कि वेदों से लेकर आधुनिक साहित्य तक कैसे जनता की रुचि बदली है।
परीक्षा उपयोगी संक्षिप्त तालिका (Match the following हेतु):
ललित निबंधकार: हजारी प्रसाद द्विवेदी, विद्यानिवास मिश्र, कुबेरनाथ राय।
विचारात्मक निबंधकार: रामचंद्र शुक्ल, महावीर प्रसाद द्विवेदी।
व्यंग्य निबंधकार: हरिशंकर परसाई, बालमुकुंद गुप्त।
भावनात्मक/प्रेरणात्मक: सरदार पूर्ण सिंह।
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