नाख़ून क्यों बढ़ते है
UPHESC (इकाई-9) के पाठ्यक्रम में निर्धारित हजारीप्रसाद द्विवेदी जी द्वारा रचित "नाखून क्यों बढ़ते हैं" हिंदी साहित्य का एक बहुत ही गहरा और वैचारिक ललित निबंध है। यह निबंध केवल नाखूनों के बढ़ने जैसी एक साधारण जैविक क्रिया पर आधारित नहीं है, बल्कि यह मनुष्य की पाशविक वृत्ति (animal instinct) और उसकी मानवता के बीच के संघर्ष को दर्शाता है।
इस निबंध के मुख्य बिंदुओं का विस्तार से विवरण यहाँ दिया गया है:
1. निबंध की शुरुआत और जिज्ञासा
निबंध की शुरुआत लेखक की छोटी बेटी के एक सरल से सवाल से होती है— "नाखून क्यों बढ़ते हैं?" लेखक इस प्रश्न पर सोच में पड़ जाते हैं और इसे मानव सभ्यता के इतिहास से जोड़कर देखते हैं। वे इसे एक "निर्लज्ज अपराधी" की उपमा देते हैं, जिसे चाहे जितनी बार काटो, वह फिर से बढ़ आता है।
2. नाखूनों का ऐतिहासिक महत्त्व
लेखक बताते हैं कि लाखों वर्ष पहले, जब मनुष्य जंगली था (वानर जैसा), तब नाखून उसके अस्त्र थे। जीवन की रक्षा और प्रतिद्वंद्वियों से लड़ने के लिए नाखून और दाँत ही उसके हथियार थे। लेकिन जैसे-जैसे सभ्यता विकसित हुई, मनुष्य ने पत्थर, हड्डी, लकड़ी और फिर धातु के हथियार बना लिए, जिससे नाखूनों की ज़रूरत खत्म हो गई।
3. पशुता बनाम मनुष्यता
यह निबंध का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है:
पशुता का प्रतीक: नाखून का बढ़ना मनुष्य के भीतर की उस 'पशुता' या आदिम वृत्ति का प्रतीक है जो आज भी उसके भीतर मौजूद है।
मनुष्यता का प्रतीक: नाखूनों को काटना मनुष्य की 'स्व-चेतना' और विवेक का प्रतीक है। मनुष्य पशु से इसलिए भिन्न है क्योंकि उसमें संयम, दूसरे के प्रति सहानुभूति और तप है।
4. स्वाधीनता और स्वराज्य
द्विवेदी जी 'इंडिपेंडेंस' (Independence) और 'स्वाधीनता' के अंतर को समझाते हैं। वे कहते हैं कि भारतीय परंपरा में हमने अपने आप को किसी बाहरी बंधन में नहीं, बल्कि "स्व" के बंधन (self-restraint) में बांधा है। नाखून का बढ़ना 'अंध-सहज वृत्ति' है, जबकि उन्हें काटना अपनी गरिमा बनाए रखना है।
5. विनाशकारी हथियारों पर प्रहार
लेखक इस बात पर चिंता व्यक्त करते हैं कि आज के युग में मनुष्य नाखूनों को तो काट रहा है, लेकिन उसने बड़े-बड़े परमाणु बम और विनाशकारी अस्त्र बना लिए हैं। यह इस बात का संकेत है कि मनुष्य की पशुता मरी नहीं है, बल्कि उसने और भी भयानक रूप ले लिया है।
निष्कर्ष
निबंध का निष्कर्ष यह है कि सफलता और चरितार्थता में अंतर होता है। अस्त्र-शस्त्रों को बढ़ाना और उनका प्रयोग करना 'सफलता' हो सकती है, लेकिन प्रेम, मैत्री और त्याग ही मनुष्य की वास्तविक 'चरितार्थता' है।
"नाखून बढ़ते हैं तो बढ़ें, मनुष्य उन्हें बढ़ने नहीं देगा।" > (यह पंक्ति मनुष्य की अदम्य इच्छाशक्ति और सभ्यता की ओर बढ़ने के संकल्प को दिखाती है।)
यह एक ललित निबंध है जो विचारों के प्रवाह के साथ आगे बढ़ता है। अध्ययन की दृष्टि से हम इसे चार प्रमुख वैचारिक खंडों में बाँट सकते हैं।
यहाँ हर भाग की विशेषता विस्तार से दी गई है:
1. जिज्ञासा और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (प्रारंभिक भाग)
यह भाग एक पारिवारिक प्रसंग से शुरू होता है, जहाँ लेखक की पुत्री उनसे सवाल पूछती है।
विशेषता: यहाँ लेखक नाखूनों के आदिम इतिहास की चर्चा करते हैं। वे बताते हैं कि नाखून कभी मनुष्य के 'अस्त्र' थे। यह भाग हमें मानव विकास की उस यात्रा की याद दिलाता है जब हम जंगलों में रहते थे।
2. पशुता और मनुष्यता का द्वंद्व (तुलनात्मक भाग)
यहाँ लेखक नाखूनों के बढ़ने को 'पाशविक वृत्ति' (Animal Instinct) का प्रतीक बताते हैं।
विशेषता: लेखक तर्क देते हैं कि नाखूनों का बढ़ना प्रकृति की याद दिलाना है कि तुम भीतर से अब भी वही पुराने हिंसक प्राणी हो। वहीं, नाखूनों को काटना मनुष्य की 'सांस्कृतिक पहचान' है। यह भाग मनुष्य के विवेक, संयम और आत्म-नियंत्रण पर जोर देता है।
3. भाषा और स्वाधीनता का दर्शन (दार्शनिक भाग)
इस भाग में द्विवेदी जी शब्दों के अर्थों की गहराई में जाते हैं, विशेषकर 'इंडिपेंडेंस' और 'स्वाधीनता' के अंतर पर।
विशेषता: लेखक बताते हैं कि भारतीय संस्कृति में हमने 'स्व' (Self) के बंधन को महत्व दिया है। उनके अनुसार, अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखना ही वास्तविक मनुष्यता है। यह भाग निबंध को एक ऊँचा दार्शनिक धरातल प्रदान करता है।
4. आधुनिक सभ्यता और अस्त्र-शस्त्र (चेतावनी भरा अंत)
निबंध के अंतिम भाग में लेखक वर्तमान समय की हिंसा और परमाणु युग पर कटाक्ष करते हैं।
विशेषता: लेखक एक विरोधाभास (Paradox) दिखाते हैं—एक तरफ मनुष्य नाखूनों जैसे छोटे जैविक हथियार काट रहा है, दूसरी तरफ वह बड़े-बड़े बम बना रहा है। यह भाग पाठक को सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम सच में सभ्य हो गए हैं या हमारी पशुता ने बस नया रूप ले लिया है?
निबंध की प्रमुख विशेषताएँ (Table)
| विशेषता | विवरण |
| भाषा शैली | तत्सम प्रधान हिंदी, लेकिन अत्यंत सरल और प्रवाहपूर्ण। |
| दृष्टिकोण | मानवतावादी और आशावादी। |
| प्रतीकात्मकता | नाखून 'बुराई' और 'पशुता' के प्रतीक हैं, जबकि काटना 'संस्कृति' का। |
| व्यंग्य | आधुनिक हथियारों की होड़ पर तीखा प्रहार। |
यह निबंध हमें यह भरोसा दिलाता है कि भले ही बुराई (नाखून) बार-बार बढ़े, लेकिन मनुष्य का संस्कार उसे बार-बार काटता रहेगा।
हजारीप्रसाद द्विवेदी जी के इस निबंध में जीवन, संस्कृति और मानवता से जुड़े कई गहरे विचार हैं। यहाँ इस निबंध की 20 सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावशाली पंक्तियाँ दी गई हैं:
मनुष्य और पशुता का द्वंद्व
"बच्चे कभी-कभी चक्कर में डाल देने वाले प्रश्न कर बैठते हैं।"
"नाखून क्यों बढ़ते हैं, यह प्रश्न मनुष्य की ओर से है।"
"नाखून बढ़ना मनुष्य के भीतर की पशुता की निशानी है और उसे काटना उसकी मनुष्यता की।"
"प्राणी शास्त्रियों का ऐसा अनुमान है कि मनुष्य का अनावश्यक अंग उसी प्रकार झड़ जाएगा, जिस प्रकार उसकी पूँछ झड़ गई है।"
"अभागा है वह मनुष्य जो अपने भीतर की इस पशुता को पहचान नहीं पाता।"
सभ्यता और विकास
"मनुष्य को नाखून की अब ज़रूरत नहीं है, यह उसके भयंकर पाशविक अस्त्र के अवशेष हैं।"
"आज मनुष्य नाखूनों को तो काटता है, पर वह अपनी पाशविक वृत्ति को नहीं त्याग पाया।"
"सभ्यता की दौड़ में मनुष्य ने पुराने अस्त्रों को छोड़कर नए और घातक अस्त्र अपना लिए हैं।"
"इतिहास साक्षी है कि जिस देश ने अस्त्रों को बढ़ाने की होड़ की, वह अंततः विनाश की ओर बढ़ा।"
"नाखूनों का बढ़ना प्रकृति का संदेश है कि तुम अभी भी वही लाखों वर्ष पुराने नख-दंतावलम्बी जीव हो।"
दर्शन और स्वाधीनता
"अंग्रेजी का 'इंडिपेंडेंस' शब्द अनधीनता का द्योतक है, पर भारतीय 'स्वाधीनता' का अर्थ है अपने ही अधीन रहना।"
"मनुष्य की चरितार्थता प्रेम में है, मैत्री में है, त्याग में है।"
"सब पुराने अच्छे नहीं होते और सब नए खराब नहीं होते।"
"अपने आप पर अपने द्वारा लगाया हुआ बंधन ही मनुष्य को मनुष्य बनाता है।"
"गौतम बुद्ध ने कहा था—मनुष्य की मनुष्यता यही है कि वह सबके दुख-सुख को सहानुभूति के साथ देखे।"
व्यंग्य और निष्कर्ष
"कमबख्त नाखून बढ़ते हैं तो बढ़ें, मनुष्य उन्हें बढ़ने नहीं देगा।"
"सफलता और चरितार्थता में अंतर है; अस्त्रों के संचयन से सफलता मिल सकती है, पर चरितार्थता प्रेम से ही मिलती है।"
"हृदय की वह वृत्ति जो दूसरों के दुख में दुखी होती है, वही सच्ची संस्कृति है।"
"मारना और मरना पशुता का काम है, क्षमा और तपस्या मनुष्यता का।"
"मनुष्य की वह अंतिम विजय होगी जब वह अपने भीतर के पशु को पूरी तरह जीत लेगा।"
यह पंक्तियाँ न केवल परीक्षा की दृष्टि से उपयोगी हैं, बल्कि यह निबंध के मूल संदेश को समझने के लिए भी पर्याप्त हैं।
यहाँ 10 और महत्वपूर्ण पंक्तियाँ हैं जो पहले वाली सूची में शामिल नहीं थीं:
सांस्कृतिक और वैचारिक गहराई वाली पंक्तियाँ
"अल्पज्ञ पिता बड़ा दयनीय जीव होता है।"
(यह निबंध की बिल्कुल शुरुआती पंक्ति है, जो पिता की उस लाचारी को दिखाती है जब वह बच्चों के मासूम सवालों का जवाब नहीं दे पाता।)
"मनुष्य की पशुता को जितनी बार भी काट दो, वह मरना नहीं जानती।"
(यह मनुष्य के भीतर दबे क्रोध, हिंसा और वासनाओं के बार-बार उभरने पर एक तीखा प्रहार है।)
"चित्त का अपने ही बंधनों से बंधा होना उसकी अपनी विशेषता है।"
(यहाँ लेखक समझाते हैं कि मनुष्य को बाहरी कानून से ज्यादा उसके अपने संस्कार नियंत्रित करते हैं।)
"अस्त्र बढ़ाने की प्रवृत्ति मनुष्यता की विरोधिनी है।"
(यह आधुनिक युद्धों और हथियारों की दौड़ पर लेखक की सबसे स्पष्ट चेतावनी है।)
"मनुष्य पशु से किस बात में भिन्न है? आहार, निद्रा, भय आदि तो पशु के समान ही हैं।"
(यह प्रसिद्ध संस्कृत श्लोक का भाव है जो याद दिलाता है कि बिना धर्म और विवेक के मनुष्य पशु ही है।)
"नाखूनों का बढ़ना उस आदिम वृत्त का परिणाम है जो हमारे जीवन में 'अंध-सहज' भाव से विद्यमान है।"
(यहाँ 'अंध-सहज' शब्द बहुत महत्वपूर्ण है, जो बताता है कि बुराई के लिए प्रयास नहीं करना पड़ता, वह अपने आप (instinctively) बढ़ती है।)
"सच्ची स्वाधीनता अपने आपको अपने ही नियमों के अधीन रखने में है।"
(यह पंक्ति अनुशासन और स्वतंत्रता के बीच का सही संतुलन बताती है।)
"हज़ारों वर्षों का इतिहास हमें यही सिखाता है कि वैर से वैर शांत नहीं होता।"
(लेखक यहाँ गांधीवादी और बुद्ध के विचारों को नाखून काटने की क्रिया के माध्यम से पुष्ट करते हैं।)
"मनुष्य की चरितार्थता शस्त्रास्त्रों के संचयन में नहीं, अपने को सबके कल्याण के लिए नि:शेष भाव से दे देने में है।"
(यह निस्वार्थ सेवा और परोपकार को मनुष्य का अंतिम लक्ष्य बताती है।)
"नाखून तो बढ़ेंगे ही, क्योंकि वे अंधे हैं, वे नहीं जानते कि आधुनिक युग में उनकी अब कोई आवश्यकता नहीं है।"
(यह मनुष्य की उस मूर्खता पर कटाक्ष है जब वह पुरानी हिंसक आदतों को छोड़ नहीं पाता।)
इन पंक्तियों का महत्व
ये पंक्तियाँ निबंध को केवल "नाखूनों" की कहानी से ऊपर उठाकर "मानव सभ्यता का घोषणापत्र" बना देती हैं। द्विवेदी जी का मूल उद्देश्य यही है कि हम यह पहचानें कि हम 'सभ्य' कहलाने के बावजूद कितने 'आदिम' बने हुए हैं।
हजारीप्रसाद द्विवेदी जी के निबंध "नाखून क्यों बढ़ते हैं" पर आधारित ये 30 महत्वपूर्ण बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs) आपकी तैयारी में बहुत मददगार साबित होंगे:
भाग 1: सामान्य परिचय और पृष्ठभूमि
'नाखून क्यों बढ़ते हैं' निबंध के लेखक कौन हैं?
(क) रामचंद्र शुक्ल (ख) हजारीप्रसाद द्विवेदी (ग) प्रेमचंद (घ) निराला
उत्तर: (ख)
लेखक से यह प्रश्न किसने पूछा था कि नाखून क्यों बढ़ते हैं?
(क) उनके पुत्र ने (ख) उनकी पत्नी ने (ग) उनकी छोटी लड़की ने (घ) उनके शिष्य ने
उत्तर: (ग)
यह निबंध हिंदी साहित्य की किस विधा के अंतर्गत आता है?
(क) कहानी (ख) ललित निबंध (ग) नाटक (घ) संस्मरण
उत्तर: (ख)
लेखक के अनुसार नाखून किसका प्रतीक हैं?
(क) मानवता का (ख) पाशविक वृत्ति का (ग) सौंदर्य का (घ) आधुनिकता का
उत्तर: (ख)
नाखूनों को बार-बार काटना मनुष्य की किस प्रवृत्ति को दर्शाता है?
(क) हिंसक प्रवृत्ति (ख) सांस्कृतिक चेतना (ग) आलस्य (घ) अज्ञानता
उत्तर: (ख)
भाग 2: ऐतिहासिक और दार्शनिक संदर्भ
लाखों वर्ष पहले नाखून मनुष्य के लिए क्या थे?
(क) गहने (ख) अस्त्र (ग) अनुपयोगी अंग (घ) खेल की वस्तु
उत्तर: (ख)
द्विवेदी जी ने नाखूनों को क्या कहकर संबोधित किया है?
(क) मासूम बालक (ख) निर्लज्ज अपराधी (ग) बुद्धिमान जीव (घ) रक्षक
उत्तर: (ख)
मनुष्य की पूँछ किस प्रकार झड़ गई थी?
(क) चोट लगने से (ख) विकासवाद के कारण (ग) बीमारी से (घ) जानबूझकर काटने से
उत्तर: (ख)
'इंडिपेंडेंस' का भारतीय अर्थ लेखक ने क्या बताया है?
(क) स्वतंत्रता (ख) स्वाधीनता (ग) पराधीनता (घ) उच्छृंखलता
उत्तर: (ख)
लेखक के अनुसार मनुष्य पशु से किस आधार पर भिन्न है?
(क) खान-पान (ख) संयम और संवेदना (ग) सोने की आदत (घ) शारीरिक शक्ति
उत्तर: (ख)
भाग 3: वैचारिक प्रश्न
दधीचि की हड्डी से क्या बना था?
(क) धनुष (ख) तलवार (ग) इंद्र का वज्र (घ) त्रिशूल
उत्तर: (ग)
लेखक के अनुसार मनुष्य को अब नाखूनों की ज़रूरत क्यों नहीं है?
(क) क्योंकि वे गंदे दिखते हैं (ख) क्योंकि उसने धातु के हथियार बना लिए हैं (ग) क्योंकि उसे डर लगता है (घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर: (ख)
"सब पुराने अच्छे नहीं होते और सब नए खराब नहीं होते"—यह कथन किसका है?
(क) कालिदास (ख) कबीर (ग) तुलसीदास (घ) हजारीप्रसाद द्विवेदी (कालिदास के संदर्भ में)
उत्तर: (क)
नाखून क्यों बढ़ते हैं, यह कैसी वृत्ति है?
(क) ऐच्छिक (ख) अंध-सहज वृत्ति (ग) कृत्रिम (घ) सामाजिक
उत्तर: (ख)
लेखक ने समाज के किस वर्ग पर कटाक्ष किया है जो अस्त्रों को बढ़ा रहे हैं?
(क) किसानों पर (ख) हिंसक मानसिकता वाले देशों पर (ग) बच्चों पर (घ) कवियों पर
उत्तर: (ख)
भाग 4: भाषा और संदेश
'स्व' का बंधन मनुष्य की क्या है?
(क) कमजोरी (ख) विशेषता (ग) मजबूरी (घ) अज्ञानता
उत्तर: (ख)
गौतम बुद्ध के अनुसार मनुष्यता क्या है?
(क) दूसरों के दुख-सुख में सहानुभूति रखना (ख) केवल अपना भला सोचना (ग) युद्ध करना (घ) संन्यास लेना
उत्तर: (क)
सफलता और चरितार्थता में क्या अंतर है?
(क) सफलता प्रेम से मिलती है (ख) चरितार्थता अस्त्रों से मिलती है (ग) चरितार्थता प्रेम और त्याग से मिलती है (घ) दोनों एक ही हैं
उत्तर: (ग)
लेखक के अनुसार 'अल्पज्ञ पिता' कैसा जीव होता है?
(क) सुखी (ख) दयनीय (ग) क्रोधी (घ) महान
उत्तर: (ख)
कामसूत्र के रचयिता कौन हैं जिनका जिक्र निबंध में आया है?
(क) वात्स्यायन (ख) पतंजलि (ग) पाणिनि (घ) व्यास
उत्तर: (क)
भाग 5: अंतिम प्रहार (मिश्रित)
शिखथक (Sikthak) का अर्थ निबंध में क्या बताया गया है?
(क) साबुन (ख) मोम (ग) तेल (घ) कंघी
उत्तर: (ख)
महाभारत में निर्वैर भाव और सत्य को क्या कहा गया है?
(क) पशुता (ख) सब वर्णों का सामान्य धर्म (ग) राजनीति (घ) अज्ञानता
उत्तर: (ख)
नाखूनों का बढ़ना किसका परिणाम है?
(क) इच्छाशक्ति का (ख) शरीर की अनैच्छिक क्रिया का (ग) बीमारी का (घ) फैशन का
उत्तर: (ख)
सिकथक और अलक्तक (आलता) का प्रयोग प्राचीन भारत में किसलिए होता था?
(क) नाखूनों को सजाने के लिए (ख) खाना बनाने के लिए (ग) दवा के लिए (घ) लिखने के लिए
उत्तर: (क)
"नाखून बढ़ते हैं तो बढ़ें, मनुष्य उन्हें बढ़ने नहीं देगा" यह वाक्य क्या दिखाता है?
(क) निराशा (ख) आशा और दृढ़ संकल्प (ग) क्रोध (घ) घृणा
उत्तर: (ख)
हजारीप्रसाद द्विवेदी का जन्म कब हुआ था?
(क) 1905 (ख) 1907 (ग) 1910 (घ) 1915
उत्तर: (ख)
द्विवेदी जी को किस ग्रंथ के लिए 'साहित्य अकादमी' पुरस्कार मिला था?
(क) अशोक के फूल (ख) आलोक पर्व (ग) बाणभट्ट की आत्मकथा (घ) कबीर
उत्तर: (ख)
निबंध में 'हृदय की वह वृत्ति जो दूसरों के दुख में दुखी होती है' क्या कहलाती है?
(क) सहानुभूति (ख) ईर्ष्या (ग) अहंकार (घ) मोह
उत्तर: (क)
अस्त्र बढ़ाने की प्रवृत्ति क्या है?
(क) मनुष्यता की विरोधी (ख) राष्ट्र का गौरव (ग) प्रगति का चिह्न (घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर: (क)
नाखून क्यों बढ़ते हैं, इसमें 'अंधे' शब्द का प्रयोग किसके लिए हुआ है?
(क) आँखों से न देखने वालों के लिए (ख) विवेकहीन नाखूनों के लिए (ग) बच्चों के लिए (घ) समाज के लिए
उत्तर: (ख)
इन उत्तरों के पीछे का तर्क (Logic) समझना निबंध के मूल भाव को और गहरा कर देता है। यहाँ कुछ प्रमुख MCQs के पीछे के तार्किक कारण दिए गए हैं:
1. नाखूनों को "निर्लज्ज अपराधी" क्यों कहा गया? (Q.7)
तर्क: अपराधी को जब सज़ा मिलती है, तो वह कुछ समय शांत रहता है लेकिन फिर से वही अपराध करता है। नाखून भी ऐसे ही हैं; आप उन्हें काटते हैं (सज़ा देते हैं), लेकिन वे फिर से बिना किसी शर्म के बढ़ आते हैं। यह मनुष्य की उन बुराइयों को दिखाता है जो बार-बार दबाने पर भी उभर आती हैं।
2. 'स्वाधीनता' और 'इंडिपेंडेंस' का अंतर (Q.9)
तर्क: द्विवेदी जी कहते हैं कि 'इंडिपेंडेंस' का अर्थ है "किसी के अधीन न होना" (Negative approach), जबकि 'स्वाधीनता' का अर्थ है "अपने ही (स्व) अधीन होना" (Positive approach)। भारतीय संस्कृति में आज़ादी का मतलब उच्छृंखलता (जो मन आए वो करना) नहीं, बल्कि खुद पर नियंत्रण रखना है।
3. कालिदास का कथन: "सब पुराने अच्छे नहीं होते..." (Q.13)
तर्क: लेखक यह समझाना चाहते हैं कि हमें आँख बंद करके परंपराओं का पालन नहीं करना चाहिए। जो पुराना हमारे विकास में बाधक है (जैसे पाशविक प्रवृत्तियाँ), उसे त्याग देना चाहिए, और जो नया विनाशकारी है, उसे अपनाने से बचना चाहिए। विवेक से चुनाव करना ही बुद्धिमानी है।
4. नाखूनों का बढ़ना "अंध-सहज वृत्ति" क्यों है? (Q.14)
तर्क: 'अंध' का अर्थ है जिसे विवेक न हो, और 'सहज' का मतलब जो अपने आप हो जाए। नाखूनों को नहीं पता कि अब हथियारों का युग है और उनकी ज़रूरत नहीं है। वे बस प्रकृति के नियम से बढ़ते रहते हैं। वैसे ही, मनुष्य के भीतर का क्रोध और हिंसा भी अक्सर बिना सोचे-समझे (अंधेपन में) प्रकट हो जाती है।
5. सफलता बनाम चरितार्थता (Q.18)
तर्क:
सफलता (Success): बाहरी साधनों से मिलती है (जैसे मशीनें, बम, धन)।
चरितार्थता (Fulfilment): आंतरिक गुणों से मिलती है (जैसे प्रेम, करुणा, सेवा)।
लेखक कहते हैं कि रावण सफल हो सकता था, लेकिन चरितार्थता राम के त्याग में ही थी।
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