UPHESC (इकाई-9) के पाठ्यक्रम में निर्धारित हरिशंकर परसाई जी का व्यंग्य 'विकलांग श्रद्धा का दौर' भारतीय समाज, राजनीति और धार्मिक पाखंड पर एक तीखा प्रहार है। इस निबंध में उन्होंने दिखाया है कि कैसे लोग अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए 'श्रद्धा' का मुखौटा पहनते हैं और कैसे यह श्रद्धा वास्तव में एक 'विकलांगता' बन चुकी है।
हरिशंकर परसाई जी के प्रसिद्ध निबंध 'विकलांग श्रद्धा का दौर' के प्रकाशन और संकलन से संबंधित जानकारी नीचे दी गई है:
प्रकाशन एवं संग्रह विवरण
यह निबंध परसाई जी के सबसे धारदार व्यंग्य संग्रहों में से एक है। विशेष बात यह है कि इसी नाम के संग्रह के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
| विवरण | जानकारी |
| निबंध का नाम | विकलांग श्रद्धा का दौर |
| संग्रह का नाम | विकलांग श्रद्धा का दौर |
| प्रकाशन वर्ष (संग्रह) | 1980 |
| लेखक | हरिशंकर परसाई |
| विधा | व्यंग्य निबंध (Satirical Essay) |
| पुरस्कार | साहित्य अकादमी पुरस्कार (1982) |
महत्वपूर्ण तथ्य
विषय-वस्तु: इस संग्रह में तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक पाखंडों पर तीखी चोट की गई है।
साहित्यिक योगदान: 'विकलांग श्रद्धा का दौर' ने हिंदी व्यंग्य को एक नई ऊँचाई दी और इसे केवल मनोरंजन से ऊपर उठाकर एक गंभीर आलोचनात्मक विधा के रूप में स्थापित किया।
हरिशंकर परसाई जी के व्यंग्य साहित्य का फलक बहुत विस्तृत है। उनके अन्य प्रमुख निबंध संग्रहों की सूची नीचे दी गई है, जो समाज की विसंगतियों पर करारा प्रहार करते हैं:
हरिशंकर परसाई के प्रमुख निबंध संग्रह
| संग्रह का नाम | मुख्य विशेषता / विषय |
| ठिठुरता हुआ गणतंत्र | भारतीय लोकतंत्र की खामियों और प्रशासनिक ढिलाई पर व्यंग्य। |
| पगडंडियों का जमाना | समाज के टेढ़े-मेढ़े रास्तों और नैतिक पतन का चित्रण। |
| जैसे उनके दिन फिरे | सामाजिक बदलाव और मानवीय स्वभाव पर आधारित कहानियाँ व व्यंग्य। |
| सदाचार का ताबीज | भ्रष्टाचार और व्यवस्था की सड़ांध पर सबसे प्रसिद्ध व्यंग्य। |
| शिकायत मुझे भी है | व्यक्तिगत और सामाजिक असंतोष का तार्किक विश्लेषण। |
| तुलसीदास चंदन घिसें | धार्मिक पाखंड और प्रतीकों के दुरुपयोग पर चोट। |
| वैष्णव की फिसलन | धर्म और व्यापार के अनैतिक गठजोड़ का पर्दाफाश। |
| भूत के पाँव पीछे | रूढ़िवादिता और पिछड़ी सोच पर तीखा प्रहार। |
परसाई जी के लेखन की कुछ खास बातें:
सपाटबयानी: वे बिना किसी लाग-लपेट के कड़वी सच्चाई को हास्य के पुट के साथ पेश करते हैं।
प्रतिबद्धता: उनका लेखन केवल मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक सुधार और चेतना जगाने के लिए है।
भाषा: वे आम बोलचाल की भाषा (हिन्दुस्तानी) का प्रयोग करते हैं, जिसमें तत्सम, तद्भव और उर्दू शब्दों का बेहतरीन तालमेल होता है।
विशेष नोट: 'सदाचार का ताबीज' और 'भोलाराम का जीव' उनके ऐसे कालजयी व्यंग्य हैं जो आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने दशकों पहले थे।
यहाँ इस निबंध का मुख्य सार दिया गया है:
निबंध का मुख्य सार
1. श्रद्धा का बाजारीकरण
परसाई जी कहते हैं कि आज के दौर में श्रद्धा कोई हृदय से निकली भावना नहीं, बल्कि एक सुविधाजनक उपकरण बन गई है। लोग अपनी कमियों को छिपाने या अपना काम निकलवाने के लिए दूसरों के सामने झुकने का नाटक करते हैं। लेखक ने इसे 'विकलांग' इसलिए कहा है क्योंकि इसमें ईमानदारी की कमी है।
2. राजनीति और पाखंड
निबंध में राजनीतिक गलियारों में व्याप्त चापलूसी पर करारा व्यंग्य है। नेता और उनके अनुयायी एक-दूसरे के प्रति झूठी श्रद्धा दिखाते हैं ताकि सत्ता और पद बना रहे। यह श्रद्धा वैचारिक नहीं, बल्कि अवसरवादी है।
3. धार्मिक और सामाजिक विसंगतियां
समाज में फैले अंधविश्वास और ढोंग पर चोट करते हुए लेखक बताते हैं कि लोग बिना सोचे-समझे प्रतीकों और व्यक्तियों की पूजा करते हैं। जब विवेक मर जाता है और केवल अंधभक्ति बचती है, तो वह समाज को मानसिक रूप से विकलांग बना देती है।
4. नैतिकता का पतन
परसाई जी ने रेखांकित किया है कि असली श्रद्धा वह होती है जो इंसान को ऊपर उठाए, लेकिन 'विकलांग श्रद्धा' उसे और नीचे गिराती है। लोग भ्रष्टाचार और गलत कामों को भी 'श्रद्धा' की आड़ में सही ठहराने की कोशिश करते हैं।
मुख्य बिंदु
| पक्ष | विवरण |
| व्यंग्य का केंद्र | समाज की दोहरी मानसिकता और झूठी नैतिकता। |
| शीर्षक की सार्थकता | 'विकलांग' शब्द उस अधूरी और स्वार्थी सोच को दर्शाता है जो समाज को पंगु बना रही है। |
| भाषा शैली | बोलचाल की भाषा के साथ तीखे कटाक्ष और मुहावरों का प्रयोग। |
निष्कर्ष: > हरिशंकर परसाई का यह निबंध हमें आत्म-मंथन के लिए मजबूर करता है। वे चेतावनी देते हैं कि यदि हम विवेकहीन होकर श्रद्धा करते रहेंगे, तो हम एक ऐसे समाज का निर्माण करेंगे जो भीतर से खोखला और नैतिक रूप से अपाहिज होगा।
हरिशंकर परसाई जी का निबंध 'विकलांग श्रद्धा का दौर' अपनी मारक भाषा और तीखे कटाक्षों के लिए जाना जाता है। इस निबंध की कुछ ऐसी प्रमुख पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं जो समाज की नब्ज पर चोट करती हैं:
निबंध की चुनिंदा और प्रभावशाली पंक्तियाँ
1. "श्रद्धा भी एक विकलांगता है, जो बुद्धि को अपाहिज बना देती है।"
भाव: यहाँ लेखक स्पष्ट करते हैं कि जब इंसान बिना सोचे-समझे किसी के पीछे चलता है, तो उसकी अपनी सोचने-समझने की शक्ति (विवेक) खत्म हो जाती है।
2. "यह विकलांग श्रद्धा का दौर है। यहाँ हर आदमी किसी न किसी के चरणों में लोट रहा है, ताकि अपना स्वार्थ सिद्ध कर सके।"
भाव: परसाई जी कहते हैं कि आज की श्रद्धा भक्ति नहीं, बल्कि एक 'बिजनेस' है। लोग झुकते वहीं हैं जहाँ से उन्हें कुछ मिलने की उम्मीद होती है।
3. "झुकने की यह क्रिया सम्मान के लिए नहीं, बल्कि रीढ़ की हड्डी के अभाव के कारण है।"
भाव: यह पंक्ति चाटुकारिता (चापलूसी) पर सबसे बड़ा प्रहार है। लेखक का मानना है कि जिनके पास स्वाभिमान नहीं होता, वही सत्ता या शक्ति के सामने बार-बार झुकते हैं।
4. "श्रद्धा का यह नाटक दरअसल एक सुरक्षा कवच है, जिसके पीछे लोग अपने पाप छिपाते हैं।"
भाव: समाज में कई लोग धार्मिक या सामाजिक श्रद्धा का चोला इसलिए पहनते हैं ताकि उनके गलत कामों पर किसी की नजर न पड़े।
5. "विवेक का मर जाना ही विकलांग श्रद्धा का जन्म लेना है।"
भाव: जब तर्क और बुद्धि का साथ छूट जाता है, तभी अंधभक्ति या विकलांग श्रद्धा पैदा होती है।
इन पंक्तियों का महत्व
ये पंक्तियाँ केवल शब्द नहीं हैं, बल्कि समाज के उस चेहरे को बेनकाब करती हैं जहाँ:
बुद्धिवाद का पतन हो रहा है।
चापलूसी को शिष्टाचार मान लिया गया है।
भ्रष्टाचार को 'श्रद्धा' के लिफाफे में बंद कर दिया गया है।
निबंध 'विकलांग श्रद्धा का दौर' की अन्य महत्वपूर्ण और प्रभावशाली पंक्तियों का विस्तृत चार्ट नीचे दिया गया है:
विकलांग श्रद्धा का दौर: प्रमुख सूक्तियाँ और व्यंग्य बाण
| क्र.सं. | प्रमुख पंक्ति (Quotes) | व्यंग्य का मुख्य भाव |
| 1 | "श्रद्धा की यह विकलांगता दरअसल विवेक की मौत है।" | जब मनुष्य तर्क करना छोड़ देता है, तब अंधभक्ति पैदा होती है। |
| 2 | "लोग अपनी कमियों को ढंकने के लिए श्रद्धा का मोटा पर्दा इस्तेमाल करते हैं।" | पाखंड और अपनी बुराइयों को छिपाने के लिए धर्म या श्रद्धा का सहारा लेना। |
| 3 | "आज श्रद्धा हृदय से नहीं, बल्कि जरूरत से पैदा होती है।" | श्रद्धा का स्वार्थ और अवसरवाद से जुड़ा होना। |
| 4 | "यह वह दौर है जहाँ रीढ़ विहीन लोग सबसे ज्यादा झुकते हुए दिखाई देते हैं।" | चापलूसी और स्वाभिमान की कमी पर तीखा कटाक्ष। |
| 5 | "जब श्रद्धा सत्ता के चरणों में लोटने लगे, तो समझो समाज बीमार है।" | राजनीति और शक्ति के सामने बिकती हुई नैतिकता। |
| 6 | "श्रद्धा का बाजार इतना गरम है कि यहाँ सच की कीमत कौड़ियों में भी नहीं।" | समाज में दिखावे की प्रधानता और सच्चाई की उपेक्षा। |
| 7 | "पैर छूना अब सम्मान नहीं, बल्कि एक सुरक्षित निवेश (Investment) बन गया है।" | बड़ों या ताकतवर लोगों के सामने झुककर अपना काम निकलवाने की प्रवृत्ति। |
| 8 | "अंधभक्त अपनी आँखें खुद फोड़ लेता है ताकि उसे सच का सामना न करना पड़े।" | वैचारिक गुलामी और सत्य से मुँह मोड़ना। |
| 9 | "यहाँ हर आदमी दूसरे के कंधे पर अपनी श्रद्धा की लाश ढो रहा है।" | समाज में फैली बनावटी और बोझिल परंपराओं पर व्यंग्य। |
निष्कर्ष (Analaysis):
परसाई जी की ये पंक्तियाँ यह स्पष्ट करती हैं कि 'विकलांग श्रद्धा' का अर्थ उस भावना से है जिसमें गहराई नहीं है, केवल दिखावा और स्वार्थ है। वे पाठकों को चेतावनी देते हैं कि बिना विवेक की श्रद्धा केवल आत्म-पतन का मार्ग है।
'विकलांग श्रद्धा का दौर' की प्रमुख पंक्तियाँ और उनका भाव
| क्र. सं. | निबंध की प्रमुख पंक्ति (Quotes) | व्यंग्य और अर्थ की व्याख्या |
| 1 | "श्रद्धा भी एक विकलांगता है, जो बुद्धि को अपाहिज बना देती है।" | जब मनुष्य तर्क करना छोड़ देता है, तो उसकी सोचने की शक्ति खत्म हो जाती है। |
| 2 | "झुकने की यह क्रिया सम्मान के लिए नहीं, बल्कि रीढ़ की हड्डी के अभाव के कारण है।" | आज लोग सम्मान देने के लिए नहीं, बल्कि चापलूसी और स्वाभिमान की कमी के कारण झुकते हैं। |
| 3 | "यह विकलांग श्रद्धा का दौर है। यहाँ हर आदमी किसी न किसी के चरणों में लोट रहा है।" | वर्तमान समय में श्रद्धा केवल एक दिखावा और स्वार्थ सिद्ध करने का माध्यम बन गई है। |
| 4 | "विवेक का मर जाना ही विकलांग श्रद्धा का जन्म लेना है।" | जब व्यक्ति सही और गलत का भेद भूल जाता है, तभी अंधभक्ति का जन्म होता है। |
| 5 | "श्रद्धा का यह नाटक दरअसल एक सुरक्षा कवच है, जिसके पीछे लोग अपने पाप छिपाते हैं।" | लोग धार्मिक होने का ढोंग इसलिए करते हैं ताकि उनके अनैतिक कार्यों पर पर्दा पड़ा रहे। |
| 6 | "पैर छूना अब सम्मान नहीं, बल्कि एक सुरक्षित निवेश (Investment) बन गया है।" | ताकतवर लोगों के सामने झुकना उनसे भविष्य में फायदा लेने की एक रणनीति मात्र है। |
| 7 | "अंधभक्त अपनी आँखें खुद फोड़ लेता है ताकि उसे सच का सामना न करना पड़े।" | सच्चाई को अनदेखा करने की जिद ही व्यक्ति को अंधश्रद्धा की ओर ले जाती है। |
| 8 | "जब श्रद्धा सत्ता के चरणों में लोटने लगे, तो समझो समाज बीमार है।" | राजनीति और कुर्सी के लिए दिखाई जाने वाली झूठी श्रद्धा समाज के पतन का संकेत है। |
| 9 | "लोग अपनी कमियों को ढंकने के लिए श्रद्धा का मोटा पर्दा इस्तेमाल करते हैं।" | अपनी असफलताओं और चरित्र की कमजोरियों को छिपाने के लिए 'श्रद्धा' का सहारा लिया जाता है। |
निष्कर्ष:
परसाई जी ने इन पंक्तियों के माध्यम से स्पष्ट किया है कि 'विकलांग श्रद्धा' वह स्थिति है जहाँ व्यक्ति अपनी आत्मा और बुद्धि को बेचकर किसी शक्ति या व्यक्ति के सामने झुक जाता है। यह निबंध हमें सिखाता है कि बिना तर्क और विवेक के की गई श्रद्धा आत्मघाती होती है।
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