आचार्य चतुरसेन शास्त्री (1891–1960)

आचार्य चतुरसेन शास्त्री (1891–1960) हिन्दी साहित्य के उन विरले लेखकों में से हैं, जिन्होंने इतिहास और कल्पना के मेल से 'ऐतिहासिक रोमांस' की एक नई विधा को जन्म दिया। उनके बारे में जानना 'वयम् रक्षामः' को पूरी तरह समझने के लिए बहुत जरूरी है।

1. लेखक का व्यक्तित्व: "साहित्य का महामात्य"

चतुरसेन शास्त्री केवल लेखक नहीं थे, वे एक आयुर्वेदाचार्य (वैद्य) भी थे। शायद इसीलिए उनकी भाषा में एक अजीब सी 'शक्ति' और 'प्राण तत्व' मिलता है। वे बहुत स्वाभिमानी थे और अक्सर स्वयं को 'इतिहास का खोजी' कहते थे।

2. लेखन की विशेषताएँ

  • इतिहास की खुदाई: वे उन विषयों को चुनते थे जो इतिहास की धूल में दब गए थे। उन्होंने पौराणिक कथाओं (Mythology) को 'ऐतिहासिक चश्मे' से देखा।

  • क्लिष्ट किंतु ओजपूर्ण भाषा: उनकी हिन्दी बहुत समृद्ध है। वे संस्कृत के शब्दों का प्रयोग इस तरह करते हैं कि पाठक को उस प्राचीन काल का अनुभव होने लगता है।

  • स्त्री पात्रों की प्रधानता: उनके उपन्यासों में स्त्रियाँ (जैसे मंदोदरी, सीता, आम्रपाली) बहुत सशक्त, तार्किक और निर्णय लेने वाली होती हैं।

3. अन्य प्रमुख कृतियाँ (Must-Reads)

उपन्याससंक्षिप्त परिचय
वैशाली की नगरवधूयह उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति मानी जाती है। यह बुद्ध काल की प्रसिद्ध नर्तकी 'आम्रपाली' के संघर्ष और तत्कालीन गणराज्यों की राजनीति की कहानी है।
सोमनाथगजनवी के आक्रमण और सोमनाथ मंदिर के विनाश व पुनर्निर्माण की एक अत्यंत गौरवशाली और मार्मिक गाथा।
गोलीराजस्थान के राजाओं और उनकी 'दासी' (गोली) प्रथा पर आधारित एक बहुत ही यथार्थवादी और साहसिक उपन्यास।
आलमगीरमुगल सम्राट औरंगजेब के जीवन और उसके समय की जटिल राजनीति का चित्रण।

4. उनका अंतिम संदेश

शास्त्री जी का मानना था कि भारत का असली इतिहास वह नहीं है जो विदेशियों ने लिखा है, बल्कि वह है जो हमारी लोक-कथाओं और प्राचीन ग्रंथों में बिखरा पड़ा है। 'वयम् रक्षामः' लिखकर उन्होंने इसी बिखरे हुए इतिहास को समेटा था।


 

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