आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने 'वयं रक्षामः' में वेद और विज्ञान: रावण का दार्शनिक विश्लेषण

आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने 'वयं रक्षामः' में रावण को एक प्रकांड विद्वान के रूप में चित्रित किया है, जो वेदों के मंत्रों के पीछे छिपे 'भौतिक विज्ञान' (Physical Science) को समझता था। उनके अनुसार, रावण का मानना था कि वेद केवल पूजा-पाठ की वस्तु नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा के सूत्र हैं।

यहाँ रावण के दृष्टिकोण से वेद और विज्ञान के अंतर्संबंधों का चार्ट दिया गया है:


वेद और विज्ञान: रावण का दार्शनिक विश्लेषण

वेद/ज्ञानरावण की व्याख्या (वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य)प्रयोगात्मक रूप (Application)
ऋग्वेदयह प्राकृतिक शक्तियों (अग्नि, वायु, जल) के नियंत्रण का शास्त्र है।रावण ने इसके माध्यम से मौसम और वायु (Climate Control) पर नियंत्रण करने का प्रयास किया।
सामवेदयह ध्वनि तरंगों (Sound Waves) और उनके कंपन (Vibration) का विज्ञान है।विशिष्ट रागों और मंत्रों से मानसिक सम्मोहन और भौतिक पदार्थों में कंपन उत्पन्न करना।
यजुर्वेदयह पदार्थ की आहुति और उसके ऊर्जा में रूपांतरण का विज्ञान है।रसायन विज्ञान (Chemistry) और विभिन्न धातुओं के सम्मिश्रण से विस्फोटक बनाना।
अथर्ववेदयह शरीर विज्ञान, औषधि और सूक्ष्म शक्तियों का उपयोग है।जीव विज्ञान (Biology) और शल्य चिकित्सा (Surgery) में निपुणता।

विशिष्ट प्रसंग: रावण की प्रयोगशाला (यंत्र-भवन)

उपन्यास में कुछ ऐसे प्रसंग हैं जहाँ रावण वेदों के सूत्रों का उपयोग तकनीकी निर्माण में करता है:

  1. ध्वनि का शस्त्र (Sonic Weapons): रावण का मानना था कि यदि शब्द (Sound) को एक निश्चित आवृत्ति (Frequency) पर केंद्रित किया जाए, तो वह पहाड़ों को भी तोड़ सकता है। इसे उसने सामवेद के 'उद्गीथ' से जोड़ा।

  2. सोने की लंका का रहस्य: चतुरसेन जी के अनुसार, लंका पूरी तरह सोने की नहीं थी, बल्कि उस पर 'स्वर्ण-लेपन' (Electroplating) की ऐसी तकनीक का प्रयोग किया गया था जिससे वह सूर्य के प्रकाश में चमकती थी और समुद्री क्षरण (Corrosion) से बची रहती थी।

  3. विमान विद्या: रावण ने वेदों के 'विमान सूक्त' का अध्ययन कर मरुत (वायु) और अग्नि के घर्षण से ऊर्जा पैदा करने का यंत्र बनाया था।


रावण का तर्क: 'देव' बनाम 'रक्ष'

रावण और ऋषियों के बीच एक संवाद में वह कहता है:

"आर्य वेदों को 'स्तुति' (Prayers) मानते हैं, जबकि मैं उन्हें 'शक्ति' (Power) मानता हूँ। वे अग्नि की पूजा करते हैं, मैं अग्नि को दास बनाकर उससे काम लेना चाहता हूँ।"

निष्कर्ष: विज्ञान का दुरुपयोग

चतुरसेन शास्त्री यह भी रेखांकित करते हैं कि रावण की हार इसलिए हुई क्योंकि उसने विज्ञान को 'लोक-कल्याण' के बजाय 'स्वार्थ और दमन' का साधन बना लिया था। उसने वेदों के ज्ञान को तो प्राप्त किया, लेकिन उनके पीछे छिपी 'करुणा' और 'मर्यादा' को छोड़ दिया।

 

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