आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने 'वयं रक्षामः' में भारतवर्ष के उस प्राचीन भूगोल का चित्रण किया है, जहाँ विभिन्न जातियाँ अपने वर्चस्व के लिए संघर्षरत थीं। उन्होंने 'अनार्य' शब्द को किसी नीची जाति के अर्थ में नहीं, बल्कि उन महान संस्कृतियों के लिए प्रयुक्त किया है जो 'आर्यों' की यज्ञ-प्रधान पद्धति से भिन्न थीं।
यहाँ उपन्यास के अनुसार प्रमुख जातियों और उनके निवास स्थानों का विस्तृत चार्ट है:
प्राचीन भारत की प्रमुख जातियाँ और उनके क्षेत्र
| जाति का नाम | प्रमुख नेता/राजा | भौगोलिक क्षेत्र (निवास स्थान) | मुख्य विशेषता/संस्कृति |
| आर्य (Aryans) | इंद्र, दशरथ, राम | सप्तसिंधु और आर्यावर्त (उत्तर भारत/हिमालय की तलहटी) | यज्ञ, वेदों का विस्तार और कृषि प्रधान संस्कृति। |
| रक्ष (Raksh) | रावण, खर-दूषण | लंका और दंडकारण्य (दक्षिण भारत एवं मध्य भारत के वन) | 'वयं रक्षामः' (हम रक्षा करते हैं) का नारा और उच्च तकनीक। |
| यक्ष (Yaksh) | कुबेर | अलकापुरी (कैलाश मानसरोवर के निकट) | व्यापार, धन संचय और कला-कौशल में निपुण। |
| कपि (Kapi) | बाली, सुग्रीव, हनुमान | किष्किंधा (तुंगभद्रा नदी का तट, वर्तमान हम्पी क्षेत्र) | वनवासी योद्धा, जो वृक्षों और पर्वतों की कला में दक्ष थे। |
| नाग (Naga) | वासुकी, तक्षक | पाताल (पाताल-लोक) (समुद्र तटीय क्षेत्र और पाताल भोगी क्षेत्र) | जल और विष विज्ञान (Toxicology) के विशेषज्ञ। |
| वानर (Vanar) | - | ऋष्यमूक पर्वत के आसपास | इन्हें शास्त्री जी ने 'बंदर' नहीं, बल्कि एक मानव उप-जाति माना है जो कपियों से भिन्न थी। |
| दैत्य/दानव | मय दानव, बलि | हिरण्यपुर और रसातल | महान वास्तुशिल्पी (Architects) और धातु विज्ञान के ज्ञाता। |
जातीय संघर्ष का भौगोलिक मानचित्र (Geographical Context)
उपन्यास में भौगोलिक विस्तार को इस प्रकार समझा जा सकता है:
उत्तर का प्रभाव (आर्य): सरयू और गंगा के तटों से होता हुआ दक्षिण की ओर बढ़ता विस्तार।
दक्षिण का दुर्ग (रक्ष): लंका जो कि हिंद महासागर का केंद्र थी और जहाँ से रावण पूरे समुद्री व्यापार को नियंत्रित करता था।
बफर ज़ोन (दंडकारण्य): विंध्याचल और गोदावरी के बीच का विशाल जंगल, जहाँ आर्यों के आश्रम और रावण के सैन्य ठिकाने आपस में टकराते थे।
एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक अंतर
शास्त्री जी ने स्पष्ट किया है कि ये जातियाँ शारीरिक रूप से अलग नहीं थीं, बल्कि उनके रहन-सहन और 'वाद' (Ideology) में अंतर था:
आर्य: 'देव' संस्कृति (देवों की स्तुति और यज्ञ)।
रक्ष: 'असुर' या 'रक्ष' संस्कृति (अपनी शक्ति और भौतिक विज्ञान पर गर्व)।
नाग-यक्ष: व्यापारिक और कूटनीतिक जातियाँ जो अक्सर तटस्थ रहती थीं।
निष्कर्ष
इस उपन्यास को पढ़ते समय पाठक को महसूस होता है कि रामायण कोई काल्पनिक कथा नहीं, बल्कि प्राचीन भारत का एक बड़ा समाजशास्त्रीय दस्तावेज़ है। रावण केवल एक व्यक्ति नहीं था, वह उन सभी 'अनार्य' जातियों का एक शक्तिशाली संघ (Confederation) बनाने वाला नेता था।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें