UPHESC (इकाई-9) के पाठ्यक्रम में निर्धारित 'महाकवि की तर्जनी' कुबेरनाथ राय

UPHESC (इकाई-9) के पाठ्यक्रम में निर्धारित'महाकवि की तर्जनी' हिंदी के सुप्रसिद्ध निबंधकार कुबेरनाथ राय का एक बहुत ही चर्चित ललित निबंध संग्रह और निबंध है। कुबेरनाथ राय अपने निबंधों में भारतीय संस्कृति, मिथक और आधुनिकता का बहुत ही सुंदर समन्वय करते हैं।

इस निबंध और संग्रह के मुख्य बिंदु यहाँ दिए गए हैं:

1. विषय-वस्तु (Core Theme)

यह निबंध मुख्य रूप से वाल्मीकि रामायण और आदि कवि वाल्मीकि की उस 'तर्जनी' (Index Finger) के इर्द-गिर्द घूमता है, जो अन्याय के विरुद्ध उठती है। लेखक ने इसमें 'क्रौंच वध' की घटना का उल्लेख किया है, जहाँ पक्षी के मारे जाने पर वाल्मीकि के मुख से अनायास ही श्लोक फूट पड़ा था।

2. प्रतीकात्मक अर्थ

  • तर्जनी का महत्व: यहाँ 'तर्जनी' केवल एक उंगली नहीं है, बल्कि यह विवेक, न्याय और सृजन का प्रतीक है। यह वह उंगली है जो बुराई की ओर इशारा करती है और समाज को सही मार्ग दिखाती है।

  • सृजन और करुणा: लेखक का मानना है कि महाकवि की तर्जनी करुणा से पैदा होती है। जब हृदय में दया होती है, तभी सही मायने में साहित्य का सृजन होता है।

3. सांस्कृतिक चेतना

कुबेरनाथ राय जी ने इस निबंध में भारतीय संस्कृति के गहरे प्रतीकों को उभारा है। वे बताते हैं कि एक रचनाकार का दायित्व केवल कलाकारी दिखाना नहीं है, बल्कि लोक-कल्याण (Public Welfare) के लिए अपनी आवाज़ उठाना भी है।

4. निबंध की शैली

  • ललित निबंध: यह एक 'ललित निबंध' (Lyrical Essay) है, जिसमें भाषा बहुत ही प्रवाहमयी, तत्सम प्रधान (Sanskritized) और काव्यात्मक है।

  • वैचारिक गहराई: इसमें पांडित्य और मनोरंजन का अनूठा संगम मिलता है। पाठक को ऐसा लगता है जैसे वह प्राचीन भारत और आधुनिक युग के बीच एक सेतु पर चल रहा हो।


निष्कर्ष: 'महाकवि की तर्जनी' हमें यह सिखाती है कि महान साहित्य वही है जो सत्ता या शक्ति के सामने झुके बिना सत्य और न्याय का साथ दे।

 

कुबेरनाथ राय के निबंध 'महाकवि की तर्जनी' अपनी वैचारिक प्रखरता और काव्यात्मक भाषा के लिए जाने जाते हैं। इस निबंध की कुछ ऐसी प्रमुख पंक्तियाँ और विचार यहाँ दिए गए हैं जो इसके मूल भाव को स्पष्ट करते हैं:

1. सृजन और करुणा पर

निबंध की शुरुआत उस क्षण से होती है जब आदि-कवि वाल्मीकि के भीतर का शोक 'श्लोक' बन जाता है।

"शोक: श्लोकत्वमागत:—कवि का शोक ही श्लोक बनकर फूट पड़ा। वह तर्जनी जो क्रौंच के शिकारी की ओर उठी थी, वह केवल उंगली नहीं, वह न्याय का स्वर थी।"

2. तर्जनी का प्रतीक (Symbolism)

लेखक तर्जनी को सत्ता और शक्ति के विरुद्ध खड़ी होने वाली शक्ति के रूप में देखते हैं।

"तर्जनी वह संकल्प है जो अनाचार को चुनौती देती है। अंगूठा यदि संग्रह है, तो तर्जनी त्याग और दिशा-निर्देश है।"

3. कवि का दायित्व

कुबेरनाथ जी का मानना है कि लेखक का काम केवल प्रशंसा करना नहीं, बल्कि सचेत करना भी है।

"महाकवि की तर्जनी सदा उस ओर संकेत करती है जहाँ सत्य खंडित हो रहा हो। वह समाज की सोई हुई चेतना को झकझोरने का अस्त्र है।"

4. मिथक और यथार्थ का मेल

वे रामायण के प्रसंग को आधुनिक संदर्भों से जोड़ते हुए लिखते हैं:

"वाल्मीकि की वह उठी हुई तर्जनी आज के युग में भी उतनी ही प्रासंगिक है, क्योंकि आज भी 'ब्याध' (शिकारी) बदला है, शिकार की तड़प वही है।"

5. कला और क्रांति

कला केवल सुंदर दिखने के लिए नहीं, बल्कि सत्य के रक्षण के लिए होनी चाहिए।

"साहित्य केवल मनोरंजन की सामग्री नहीं है, वह तो महाकवि की वह तर्जनी है जो अधर्म के मस्तक पर प्रहार करती है।"


निबंध का मुख्य सार (Core Message)

इन पंक्तियों के माध्यम से कुबेरनाथ राय यह कहना चाहते हैं कि:

  • तर्जनी विवेक और न्याय का प्रतीक है।

  • सच्चा साहित्य करुणा (Empathy) से उपजता है।

  • एक रचनाकार का धर्म है कि वह अन्याय के विरुद्ध अपनी उंगली उठाए।

 कुबेरनाथ राय का यह निबंध अपनी वैचारिक सघनता (Intellectual Density) के लिए जाना जाता है। इसमें कुछ और भी मर्मस्पर्शी और गंभीर पंक्तियाँ हैं जो लेखक के सांस्कृतिक और साहित्यिक दृष्टिकोण को स्पष्ट करती हैं:

1. तर्जनी और अंगूठे का द्वंद्व (अहंकार बनाम दिशा)

लेखक ने हाथ की उंगलियों के माध्यम से एक दार्शनिक बात कही है:

"अंगूठा 'अहं' का प्रतीक है, जो मुट्ठी बंद करते ही सबको दबा लेता है। पर तर्जनी वह है जो मुट्ठी से बाहर निकलकर सत्य की ओर संकेत करती है। वह 'अहं' से मुक्त होकर 'लोक' की ओर उठती है।"

2. करुणा का 'छंद' में बदलना

वाल्मीकि के शोक के बारे में एक बहुत ही सुंदर पंक्ति है:

"जब शोक अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचता है, तब वह विलाप नहीं बनता, वह 'छंद' बन जाता है। महाकवि की तर्जनी उसी छंद की पहली लय है जो अन्याय को ललकारती है।"

3. सत्ता और कवि का संबंध

कुबेरनाथ जी ने स्पष्ट किया है कि कवि का स्थान कहाँ होना चाहिए:

"कवि की तर्जनी राजसत्ता के वैभव की ओर नहीं, बल्कि उस निषाद (शिकारी) की ओर उठनी चाहिए जो निर्दोष का वध कर रहा है। साहित्य का धर्म ही 'ना' कहना है—अधर्म को 'ना' कहना।"

4. भारतीय संस्कृति का प्रतीकवाद

वे तर्जनी को भारतीय मनीषा (Intellect) से जोड़ते हुए लिखते हैं:

"यह तर्जनी केवल वाल्मीकि की नहीं है, यह उपनिषदों के ऋषियों की वह उंगली है जो 'तत्वमसि' (वह तुम हो) की ओर संकेत करती है। यह मनुष्य को उसकी दिव्यता की याद दिलाती है।"

5. आधुनिक संकट पर कटाक्ष

आज के युग के संदर्भ में वे कहते हैं:

"आज के कवि की तर्जनी शिथिल पड़ गई है। वह उंगली उठाने के बजाय हाथ जोड़ना सीख गया है। जबकि महाकवि की तर्जनी का काम है—भ्रम का परदा फाड़ना और सत्य को अनावृत करना।"


निबंध की वैचारिक विशेषताएँ (Quick Summary)

  • मिथकीय आधार: रामायण के 'मा निषाद' श्लोक को केंद्र में रखकर आधुनिक समस्याओं का विश्लेषण।

  • नैतिक साहस: यह निबंध बौद्धिक और नैतिक साहस (Moral Courage) की वकालत करता है।

  • ललित शैली: गंभीर बात को भी बहुत ही सुंदर और अलंकृत भाषा में कहना।

 

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