आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने 'वयं रक्षामः' में मुख्य ऐतिहासिक/पौराणिक पात्रों के पुनर्परिभाषित स्वरूप का चार्ट

आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने 'वयं रक्षामः' में रामायण के पारंपरिक पात्रों को केवल पौराणिक या दैवीय रूप में न दिखाकर उन्हें ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भों में ढाला है। उन्होंने इन पात्रों को विभिन्न अनार्य और आर्य जातियों के नेताओं के रूप में चित्रित किया है।

यहाँ उपन्यास के मुख्य ऐतिहासिक/पौराणिक पात्रों के पुनर्परिभाषित स्वरूप का चार्ट है:


1. प्रमुख नायक और विरोधी पात्र (Leaders)

पात्रपारंपरिक स्वरूप'वयं रक्षामः' में ऐतिहासिक स्वरूप
श्री रामविष्णु के अवतार, मर्यादा पुरुषोत्तम।आर्य संस्कृति के विस्तारक और एक कुशल रणनीतिकार।
रावणएक अभिमानी राक्षस सम्राट।'रक्ष' संस्कृति का महानायक, जिसने बिखरी हुई अनार्य जातियों को एकजुट किया।
कुंभकर्णकेवल सोने और खाने वाला विशाल राक्षस।एक महान वैज्ञानिक और इंजीनियर, जो युद्ध यंत्रों और स्थापत्य कला में निपुण था।
विभीषणराम का भक्त और घर का भेदी।आर्यों की विस्तारवादी नीति का समर्थक और रावण की 'रक्ष' नीति का विरोधी।

2. सहायक और सहयोगी पात्र (Allies)

पात्रपारंपरिक स्वरूप'वयं रक्षामः' में ऐतिहासिक स्वरूप
हनुमानवानर रूपी देवता और राम के दास।'कपि' जाति (एक वनवासी मानव जाति) के अत्यंत बुद्धिमान दूत और कूटनीतिज्ञ।
सुग्रीव/बालीवानर राजा।दक्षिण भारत की शक्तिशाली कपि-शाखा के राजा, जो आर्यों के प्रभाव में आए।
इंद्रजीत (मेघनाद)जादुई शक्तियों वाला योद्धा।रावण का अत्यंत पराक्रमी पुत्र और उच्च श्रेणी का सैन्य कमांडर
परशुरामक्षत्रियों का विनाश करने वाले ऋषि।एक ऐसे क्रांतिकारी ब्राह्मण जिन्होंने आर्यों की व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन किए।

3. स्त्री पात्र (Women Characters)

पात्रपारंपरिक स्वरूप'वयं रक्षामः' में ऐतिहासिक स्वरूप
सीताजनक की पुत्री, आदर्श पत्नी।आर्यों की पवित्रता और गौरव का प्रतीक, जिनका अपहरण एक राजनीतिक चाल थी।
मंदोदरीरावण की पतिव्रता पत्नी।मय दानव की पुत्री, जो उच्च शिल्प और कला की ज्ञाता थी।
शूर्पणखानाक कटी हुई कुरूप राक्षसी।रावण की बहन और एक स्वतंत्र चेतना वाली नारी, जिसकी कूटनीति ने युद्ध की नींव रखी।
कैकेयीमंथरा के बहकावे में आई ईर्ष्यालु रानी।एक ऐसी रानी जिसने भरत के माध्यम से अपनी पितृसत्ता (केकेय देश) के हितों की रक्षा की।

4. ऋषियों और मुनियों का स्वरूप

पात्रपारंपरिक स्वरूप'वयं रक्षामः' में ऐतिहासिक स्वरूप
अगस्त्य ऋषिसमुद्र पी जाने वाले चमत्कारी मुनि।दक्षिण भारत में आर्य संस्कृति के प्रथम प्रचारक और वैज्ञानिक अन्वेषक।
विश्वामित्रराम को अस्त्र-शस्त्र देने वाले गुरु।एक दूरदर्शी ऋषि जिन्होंने आर्यों और अनार्यों के बीच संतुलन बिठाने का प्रयास किया।

निष्कर्ष: चतुरसेन का दृष्टिकोण

चतुरसेन शास्त्री ने इन सभी पात्रों को हाड़-मांस के इंसानों के रूप में दिखाया है। उन्होंने दिखाया है कि कैसे यक्ष, रक्ष, कपि, और आर्य जातियां अपने वर्चस्व के लिए संघर्ष कर रही थीं। यहाँ 'जादू' या 'वरदान' नहीं, बल्कि युद्ध-कौशल और राजनीति मुख्य आधार है।

 

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