आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने 'वयं रक्षामः' में देवताओं का ऐतिहासिक स्वरूप (चतुरसेन का दृष्टिकोण)

 आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने 'वयं रक्षामः' में इंद्र, वरुण और अन्य देवताओं को 'आकाश में रहने वाले अलौकिक देवों' के बजाय धरती के शक्तिशाली शासकों और जातियों के रूप में चित्रित किया है। उन्होंने 'देव' शब्द को एक विशेष आर्य-संस्कृति के पद (Title) के रूप में परिभाषित किया है।

यहाँ उपन्यास के अनुसार इन 'देव' पात्रों का वास्तविक और ऐतिहासिक स्वरूप दिया गया है:


देवताओं का ऐतिहासिक स्वरूप (चतुरसेन का दृष्टिकोण)

पात्र (पद)पारंपरिक पौराणिक स्वरूप'वयं रक्षामः' में ऐतिहासिक स्वरूप
इंद्रस्वर्ग के राजा, वर्षा के देवता।आर्यों का सेनापति/राजा। 'इंद्र' एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक पद (Title) था। यह एक अत्यंत विलासी और साम्राज्यवादी शासक था।
वरुणजल और समुद्र के देवता।समुद्री मार्गों और नौसेना (Navy) का अधिपति। वह पश्चिमी सागर के तटों पर शासन करने वाली एक उन्नत जाति का नेता था।
यममृत्यु के देवता।दक्षिण दिशा की एक शक्तिशाली यौधेय जाति का क्रूर और अनुशासित शासक।
कुबेरधन के देवता और यक्षों के राजा।रावण का सौतेला भाई और 'यक्ष' संस्कृति का प्रमुख। वह अंतरराष्ट्रीय व्यापार और धन (Gold) का स्वामी था।
अग्निआग के देवता।अग्नि-होत्र (Havan/Science of Fire) के ज्ञाता और रसायनों (Chemicals) के प्रयोग में निपुण ऋषि या वैज्ञानिक।

प्रमुख अंतर और व्याख्या

  1. स्वर्ग का स्थान: शास्त्री जी के अनुसार 'स्वर्ग' कोई बादलों के ऊपर की जगह नहीं थी, बल्कि हिमालय (मेरु पर्वत) के आसपास का वह क्षेत्र था जहाँ आर्यों की सत्ता थी और जहाँ सुख-सुविधाएँ बहुत अधिक थीं।

  2. देव-असुर संग्राम: यह कोई 'अच्छाई बनाम बुराई' की जादुई लड़ाई नहीं थी, बल्कि संसाधनों (Resources), उपजाऊ भूमि और व्यापारिक मार्गों पर कब्ज़े के लिए लड़ा गया जातीय संघर्ष (Racial Conflict) था।

  3. इंद्र और रावण का संघर्ष: रावण ने 'स्वर्ग' पर आक्रमण करके इंद्र को हराया था। उपन्यास में इसे 'रक्ष' संस्कृति की श्रेष्ठता सिद्ध करने और आर्यों के अहंकार को तोड़ने के रूप में दिखाया गया है।


'यक्ष' और 'रक्ष' का संबंध

चतुरसेन जी ने एक बहुत ही सूक्ष्म अंतर स्पष्ट किया है:

  • यक्ष (कुबेर): ये केवल धन संचय और शांतिपूर्ण व्यापार में विश्वास रखते थे।

  • रक्ष (रावण): इन्होंने यक्षों की कायरता को त्यागकर 'रक्षा' करने का व्रत लिया और सशस्त्र क्रांति के माध्यम से अपनी सत्ता बनाई।

निष्कर्ष: लेखक ने सिद्ध किया है कि जिन्हें हम आज 'भगवान' मानकर पूजते हैं, वे अपने समय के कुशल राजनीतिज्ञ, योद्धा और वैज्ञानिक थे।

 

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