'वयम् रक्षामः' उपन्यास में राम-रावण युद्ध के अंतिम क्षणों और सीता-रावण संवाद

'वयम् रक्षामः' उपन्यास में  राम-रावण युद्ध के अंतिम क्षणों और सीता-रावण संवाद । आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने यहाँ शब्दों को शस्त्रों की तरह चलाया है।

आइए, उन दो दृश्यों को देखते हैं जहाँ इन संवादों की गहराई सबसे स्पष्ट होकर उभरती है:

1. अशोक वाटिका: वैचारिक युद्ध का दृश्य

जब रावण सीता को प्रलोभन देने आता है, तो वहाँ कोई "राक्षस" और "अबला" नहीं, बल्कि दो संस्कृतियों के प्रतिनिधि खड़े होते हैं।

  • रावण का तर्क: "सीता, राम तुम्हें क्या देगा? वह वनों में भटकने वाला एक निर्वासित राजकुमार है। मेरी लंका में आओ, यहाँ ज्ञान, वैभव और 'रक्ष' संस्कृति की सर्वोच्चता है।" (यहाँ रावण की शक्ति और भौतिकवाद की पंक्ति— "शक्ति ही सत्य है"—झलकती है।)

  • सीता का प्रहार: "रावण, तुम वैभव दे सकते हो, लेकिन 'चरित्र' और 'मर्यादा' नहीं। तुम्हारे पास स्वर्ण है, पर शांति नहीं। पिंजरे में बंद पक्षी का शरीर तुम्हारा हो सकता है, पर उसका संगीत नहीं।" (यहाँ सीता की आत्मिक शक्ति वाली पंक्ति का प्रभाव दिखता है।)

2. रणभूमि: मृत्यु के द्वार पर 'महासत्य'

यह इस उपन्यास का सबसे प्रभावशाली दृश्य है। जब रावण धराशायी है, तब कोई शोर नहीं है, केवल दो महामानवों के बीच का गंभीर वातावरण है।

  • राम का सम्मान: राम लक्ष्मण से कहते हैं— "शत्रु के प्रति घृणा समाप्त हो चुकी है, अब केवल विद्वत्ता शेष है।" यह पंक्ति दर्शाती है कि राम का युद्ध व्यक्ति से नहीं, बल्कि अधर्म से था।

  • रावण का अंतिम स्वीकार: रावण अपनी उन पंक्तियों को सार्थक करता है जो उसने राजनीति के बारे में कही थीं। वह स्वीकार करता है— "मैंने सोचा था कि मैं प्रकृति को बदल दूँगा, पर मैं खुद को नहीं बदल पाया।"

इन दृश्यों का प्रभाव:

  1. राजनैतिक यथार्थ: पाठक को यह समझ आता है कि रावण की हार का कारण उसकी 'अशक्ति' नहीं, बल्कि उसकी 'अनीति' थी।

  2. मानवीय गरिमा: चतुरसेन शास्त्री ने दिखाया कि युद्ध के मैदान में भी मर्यादा का पालन कैसे किया जाता है। राम द्वारा रावण से शिक्षा लेना इस बात की पुष्टि करता है कि "ज्ञान जहाँ से भी मिले, वह वंदनीय है।"

  3. संस्कृति का समन्वय: रावण की मृत्यु के बाद, राम का विभीषण को गले लगाना 'आर्य-अनार्य' संघर्ष के अंत और एक नई 'भारतीय पहचान' के जन्म का प्रतीक है।


 

आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने 'वयम् रक्षामः' में युद्ध का वर्णन किसी चमत्कारिक पौराणिक कथा की तरह नहीं, बल्कि एक भयानक ऐतिहासिक महासंग्राम के रूप में किया है। यहाँ युद्ध केवल अस्त्र-शस्त्रों का नहीं, बल्कि रणनीतियों (Strategies) और दो विभिन्न संस्कृतियों की सैन्य शक्ति का टकराव है।

उपन्यास के युद्ध वर्णन की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

1. आधुनिक और वैज्ञानिक युद्ध-कला

शास्त्री जी ने रावण की सेना को अत्यंत आधुनिक दिखाया है। यहाँ 'मायावी युद्ध' का अर्थ जादू-टोना नहीं, बल्कि 'छापामार युद्ध' (Guerrilla Warfare) और 'छद्म रणनीति' है।

  • लंकाई सेना: रावण की सेना के पास उन्नत दुर्ग-रक्षा प्रणाली, यंत्र-चालित अस्त्र और समुद्र में लड़ने के लिए शक्तिशाली नौसेना (Navy) थी।

  • यंत्रों का प्रयोग: उपन्यास में 'शतघ्नी' (सौ लोगों को एक साथ मारने वाला यंत्र) और अन्य प्राचीन प्रक्षेपास्त्रों का वर्णन है जो उस काल के 'मिसाइल' या 'तोपों' की तरह प्रतीत होते हैं।

2. वानर सेना की युद्ध-नीति

राम की सेना (वानर और ऋक्ष जातियाँ) के पास लंका जैसी तकनीक नहीं थी, लेकिन उनके पास अतुलनीय शारीरिक साहस और भौगोलिक ज्ञान था।

  • पर्वतीय और वन युद्ध: वानरों ने पेड़ों, पत्थरों और अपनी चपलता का उपयोग एक रणनीति के तहत किया।

  • सेतु निर्माण: सेतु (पुल) का निर्माण एक इंजीनियरिंग चमत्कार के रूप में वर्णित है, जिसने लंका की अभेद्य समुद्री सुरक्षा को भेद दिया।

3. प्रमुख युद्ध प्रसंग

  • कुंभकर्ण का रण-कौशल: कुंभकर्ण को यहाँ एक विशालकाय मांस के लोथड़े के रूप में नहीं, बल्कि एक अजेय योद्धा के रूप में दिखाया गया है। जब वह रणभूमि में उतरता है, तो वानर सेना में हाहाकार मच जाता है। उसका युद्ध वर्णन अत्यंत ओजपूर्ण है, जहाँ वह अपनी संस्कृति के प्रति वफादारी दिखाते हुए वीरगति प्राप्त करता है।

  • इंद्रजीत (मेघनाद) की रणनीति: मेघनाद को 'अदृश्य होकर लड़ने वाला' कहा गया है, जिसे लेखक ने 'गुप्त स्थानों से प्रहार करने' और 'धुआं पैदा करने वाले अस्त्रों' (Smoke screens) के उपयोग के रूप में समझाया है।

  • लक्ष्मण और मेघनाद का द्वंद्व: यह युद्ध का सबसे तकनीकी हिस्सा है, जहाँ दोनों योद्धा एक-दूसरे की सैन्य चालों को काटते हैं।

4. राम-रावण का अंतिम महासंग्राम

उपन्यास के अंत में राम और रावण का युद्ध व्यक्तिगत द्वेष से ऊपर उठकर दो विचारधाराओं का चरम बिंदु बन जाता है।

  • शास्त्री जी ने इसका वर्णन करते हुए लिखा है कि जब दोनों सेनापति आमने-सामने आए, तो प्रकृति भी स्थिर हो गई।

  • रावण का रथ और राम की पैदल स्थिति (शुरुआत में) के माध्यम से 'साधन' बनाम 'साधना' का द्वंद्व दिखाया गया है।

  • अंत में, रावण की मृत्यु उसकी शारीरिक कमजोरी से नहीं, बल्कि उसकी मानसिक थकान और विभीषण द्वारा बताए गए सामरिक रहस्यों के कारण होती है।

5. युद्ध की विभीषिका

लेखक ने युद्ध के ग्लैमर के बजाय उसकी त्रासदी (Tragedy) पर अधिक जोर दिया है। युद्ध के बाद लंका की गलियों में बहता रक्त, विधवाओं का विलाप और जलती हुई स्वर्ण नगरी के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि "युद्ध कभी भी अंतिम समाधान नहीं होता, वह केवल विनाश लाता है।"


निष्कर्ष:

'वयम् रक्षामः' का युद्ध वर्णन पढ़ते समय ऐसा लगता है जैसे पाठक स्वयं रणभूमि में खड़ा हो। शास्त्री जी की भाषा में वह 'नाद' है जो तलवारों की खनखनाहट और शंखनाद का अहसास कराता है।


उपन्यास 'वयम् रक्षामः' में विभीषण का राम के पक्ष में जाना केवल एक भाई का दूसरे भाई को छोड़ना नहीं था, बल्कि यह लंका की अभेद सुरक्षा व्यवस्था (Security Protocol) का पूरी तरह ध्वस्त हो जाना था। आचार्य चतुरसेन ने इसे एक बहुत बड़े 'सामरिक विश्वासघात' (Strategic Betrayal) के रूप में चित्रित किया है।

विभीषण के इस कदम का युद्ध पर जो निर्णायक प्रभाव पड़ा, उसे इन बिंदुओं में समझा जा सकता है:

1. लंका के दुर्ग का 'ब्लूप्रिंट' लीक होना

लंका को 'अभेद' माना जाता था क्योंकि उसके चारों ओर समुद्र था और दुर्ग के भीतर प्रवेश के गुप्त मार्ग थे। विभीषण लंका के रक्षा सचिव की तरह थे। उन्होंने राम को बताया कि:

  • लंका के कौन से द्वार (East, West, North, South) सबसे कमजोर हैं।

  • कहाँ पर 'शतघ्नी' (यंत्र) तैनात हैं और उनसे कैसे बचा जा सकता है।

  • दुर्ग की रसद (Supply chain) कहाँ से आती है और उसे कैसे काटा जा सकता है।

2. मेघनाद की 'निकुंभिला' शक्ति का विनाश

इंद्रजीत (मेघनाद) को हराना लगभग असंभव था क्योंकि वह एक गुप्त स्थान 'निकुंभिला' में बैठकर विशेष युद्ध-यंत्रों और व्यूह रचना का प्रयोग करता था। विभीषण ने ही लक्ष्मण को उस अत्यंत गुप्त स्थान तक पहुँचाया। यदि विभीषण न होते, तो मेघनाद को ढूंढना और मारना राम की सेना के लिए असंभव होता।

3. मनोवैज्ञानिक युद्ध (Psychological Warfare)

जब लंका के सैनिकों ने देखा कि उनका अपना राजकुमार (विभीषण) शत्रु के साथ खड़ा है, तो उनका मनोबल (Morale) टूट गया। विभीषण ने लंका के भीतर उन लोगों की सूची भी राम को दी जो रावण की तानाशाही से असंतुष्ट थे, जिससे रावण के भीतर आंतरिक विद्रोह का डर पैदा हो गया।

4. रावण की मृत्यु का 'मर्म' (The Fatal Point)

पारंपरिक कथा में इसे 'नाभि में अमृत' कहा गया है, लेकिन चतुरसेन शास्त्री ने इसे सामरिक रहस्य की तरह दिखाया है। विभीषण जानते थे कि रावण के पास कौन सा ऐसा कवच या युद्ध-कौशल है जिसे केवल एक विशेष तरीके से ही भेदा जा सकता है। विभीषण ने राम को वह 'क्रिटिकल पॉइंट' बताया जहाँ प्रहार करने से रावण की रक्षा प्रणाली (Defense system) विफल हो गई।

5. लेखक का दृष्टिकोण: 'धर्म' या 'द्रोह'?

यहीं पर आचार्य चतुरसेन शास्त्री पाठकों को सोचने पर मजबूर करते हैं। वे विभीषण के चरित्र के माध्यम से एक बड़ा प्रश्न खड़ा करते हैं:

  • क्या विभीषण धर्मात्मा थे क्योंकि उन्होंने सत्य (राम) का साथ दिया?

  • या वे कुलद्रोही थे क्योंकि उन्होंने अपनी ही संस्कृति (रक्ष) के विनाश का मार्ग प्रशस्त किया?

    उपन्यास में रावण विभीषण को कोसता नहीं है, बल्कि उस पर तरस खाता है कि उसने एक विदेशी संस्कृति (आर्य) के लिए अपनी जड़ों को काट दिया।


निष्कर्ष:

विभीषण के बिना राम युद्ध जीत तो सकते थे, लेकिन वह युद्ध सालों तक चलता और शायद पूरी वानर सेना समाप्त हो जाती। विभीषण ने उस युद्ध को 'सर्जिकल स्ट्राइक' में बदल दिया।

'वयम् रक्षामः' का यह सामरिक पक्ष ही इसे एक पॉलिटिकल थ्रिलर जैसा बना देता है।

 

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