UPHESC (इकाई-8) के पाठ्यक्रम में निर्धारित सुमित्रानंदन पंत जी की इन महत्वपूर्ण कविताओं का विवरण नीचे दिए गए चार्ट में है। पंत जी को 'प्रकृति का सुकुमार कवि' कहा जाता है और उनकी इन रचनाओं में प्रकृति, दर्शन और समाज का अद्भुत संगम मिलता है:
| कविता का नाम | प्रकाशन वर्ष | काव्य संग्रह | मुख्य विषय (Central Theme) |
| प्रथम रश्मि | 1919 | 'वीणा' | यह कविता सूर्य की पहली किरण के आगमन पर प्रकृति में होने वाले परिवर्तनों और कौतूहल का चित्रण करती है। इसमें चिड़िया के चहकने को रहस्यवादी ढंग से दिखाया गया है। |
| नौका विहार | 1932 | 'गुंजन' | चाँदनी रात में गंगा में नौका विहार का वर्णन। यह कविता प्रकृति के सौंदर्य के साथ-साथ जीवन की शाश्वत धारा (दर्शन) को भी दर्शाती है। |
| संध्या | 1932 के आसपास | 'गुंजन' | शाम के समय प्रकृति के शांत और ढलते स्वरूप का मानवीकरण। इसमें संध्या को एक सुंदरी के रूप में चित्रित किया गया है। |
| एक तारा | 1932 | 'गुंजन' | रात के आकाश में अकेले तारे को देखकर कवि के मन में उठने वाले दार्शनिक विचार और अकेलेपन की अनुभूति का चित्रण। |
| भारत माता | 1940 | 'ग्राम्या' | इसमें भारत माता का यथार्थवादी चित्रण है। कवि ने उसे "ग्रामवासिनी" कहा है जो खेतों में काम करने वाली और अभावों में जीने वाली दुखी माँ के रूप में दिखाई गई है। |
| द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्र | 1934 | 'युगांत' | यह प्रगतिवादी विचारधारा की कविता है। इसमें कवि पुरानी और जर्जर परंपराओं (सूखे पत्तों) को त्यागकर नए युग के आगमन का आह्वान करता है। |
पंत जी की काव्य यात्रा के कुछ मुख्य बिंदु:
प्रकृति चित्रण: 'प्रथम रश्मि' और 'नौका विहार' जैसी रचनाओं में उनकी कल्पनाशीलता और प्रकृति के प्रति प्रेम साफ झलकता है।
दार्शनिक और प्रगतिवादी बदलाव: 'द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्र' और 'भारत माता' में पंत जी प्रकृति से हटकर सामाजिक यथार्थ और बदलाव की बात करने लगे थे।
रहस्यवाद: उनकी शुरुआती कविताओं में यह जिज्ञासा दिखती है कि प्रकृति के इन कार्यों के पीछे कौन सी अनजान शक्ति है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें