आचार्य शुक्ल के इतिहास के महत्वपूर्ण आलोचनात्मक कथन

आचार्य शुक्ल के इतिहास में कुछ और भी ऐसी गूढ़ पंक्तियाँ हैं जो गहरी आलोचनात्मक समझ को दर्शाती हैं। ये अक्सर परीक्षाओं के कठिन स्तर (जैसे NET/JRF या असिस्टेंट प्रोफेसर) में पूछी जाती हैं:


आचार्य शुक्ल के अन्य महत्वपूर्ण आलोचनात्मक कथन

1. वीरगाथा काल (आदिकाल) पर

"जब तक भाषा साहित्यक रही तब तक वह 'अपभ्रंश' ही कहलाती रही, जब वह लोकभाषा के साथ मिलकर साहित्यिक रूप में आई तब वह 'प्राकृताभास हिंदी' कहलाई।"

2. विद्यापति के प्रति दृष्टिकोण

"विद्यापति के पद अधिकतर श्रृंगार के ही हैं जिनमें नायिका और नायक राधा-कृष्ण हैं। इन पदों को आध्यात्मिक कहना वैसी ही है जैसे खजुराहो के मंदिरों को आध्यात्मिक कहना।" (संकेत: उन्होंने विद्यापति को शुद्ध श्रृंगारी माना था)।

3. केशवदास और 'रामचंद्रिका'

"केशव की रचना में वह सहृदयता और भावुकता न थी जो एक कवि में होनी चाहिए। वे केवल पांडित्य प्रदर्शन के फेर में रहे।"

4. पद्माकर और उनकी भाषा

"पद्माकर की भाषा में वह अनेकरूपता है जो एक बड़े कवि में होनी चाहिए। उनकी भाषा में कहीं-कहीं अनुप्रास की वैसी ही छटा है जैसी सेनापति में।"

5. देव (कवि) के बारे में

"देव ने विरह वर्णन में कहीं-कहीं ऊहात्मकता (Atishayokti) की वह सीमा पार कर दी है जो पाठकों को विरक्त करने लगती है।"

6. द्विवेदी युग का महत्व

"पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी गद्य को परिमार्जित और व्याकरण-सम्मत बनाकर उसे एक निश्चित रूप दिया।"

7. छायावाद पर सूक्ष्म कटाक्ष

"छायावाद की कविता का मुख्य उद्देश्य 'अभिव्यक्ति की निराली पद्धति' मात्र था, उसमें विषय की प्रधानता कम और शैली की प्रधानता अधिक थी।"

8. जयशंकर प्रसाद की 'कामायनी' पर

"कामायनी में प्रसाद ने मानवता का मनोवैज्ञानिक इतिहास प्रस्तुत किया है, जो समरसतावाद के दर्शन पर आधारित है।"


शुक्ल जी की आलोचना पद्धति का 'ग्राफ'

आचार्य शुक्ल की आलोचना के तीन मुख्य स्तंभ थे:

  1. लोक-मंगल (Social Welfare): क्या काव्य समाज का कल्याण करता है? (इसीलिए तुलसी उनके प्रिय थे)।

  2. रस-मीमांसा (Aesthetics): क्या काव्य पाठक के हृदय को रससिक्त करता है?

  3. बिंब-विधायिनी प्रतिभा: क्या कवि शब्दों के माध्यम से चित्र उकेर सकता है?


परीक्षा के लिए 'Quick Tips'

  • अगर किसी पंक्ति में "चित्तवृत्ति", "लोक-मंगल", "प्रबंध काव्य"  जैसे भारी शब्दों का प्रयोग हो, तो 90% संभावना है कि वह कथन आचार्य रामचंद्र शुक्ल का ही है।

  • शुक्ल जी ने कबीर की अपेक्षा तुलसी को और केशव की अपेक्षा बिहारी (कला के मामले में) को अधिक महत्व दिया।


 

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