📌 आचार्य रामचंद्र शुक्ल: हिंदी साहित्य का इतिहास
1. इतिहास लेखन की पद्धति
शुक्ल जी ने 'विधेयवादी पद्धति' का प्रयोग किया। उनके अनुसार साहित्य का इतिहास समझने के लिए तीन तत्व अनिवार्य हैं:
जाति: उस समय की जातीय विशेषताएँ।
वातावरण: तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियाँ।
क्षण: वह विशेष समय जिसमें रचना हुई।
मूल मंत्र: "प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है।"
2. काल-विभाजन और नामकरण
शुक्ल जी ने दोहरा नामकरण किया और 'विक्रम संवत्' (V.S.) का प्रयोग किया।
| काल | शुक्ल जी का नामकरण | समय सीमा (संवत्) |
| आदिकाल | वीरगाथा काल | 1050 – 1375 |
| पूर्व-मध्यकाल | भक्तिकाल | 1375 – 1700 |
| उत्तर-मध्यकाल | रीतिकाल | 1700 – 1900 |
| आधुनिक काल | गद्यकाल | 1900 – अब तक |
3. शुक्ल जी की आलोचना का रेखाचित्र (Framework)
आचार्य शुक्ल किसी भी कवि को 'लोक-मंगल' और 'रस' की कसौटी पर कसते थे:
लोक-मंगल: क्या काव्य समाज का भला करता है? (जैसे: तुलसीदास)
रस-मीमांसा: क्या काव्य पाठक को आनंद की उच्च अवस्था में ले जाता है? (जैसे: सूरदास)
बिंब-योजना: क्या कवि शब्दों से चित्र बना सकता है?
4. शुक्ल जी की 'त्रिवेणी' (तीन सर्वश्रेष्ठ कवि)
उन्होंने इन तीन कवियों को हिंदी साहित्य का स्तंभ माना:
तुलसीदास: लोक-मंगल के कवि (शुक्ल जी के सबसे प्रिय)।
सूरदास: वात्सल्य और जीवनोत्सव के कवि।
जायसी: प्रेम की पीर और हृदय की गहराई के कवि।
5. प्रसिद्ध तुलनाएँ और सिद्धांत
प्रबंध बनाम मुक्तक: "यदि प्रबंध काव्य एक विस्तृत वनस्थली है, तो मुक्तक एक चुना हुआ गुलदस्ता है।" (बिहारी के संदर्भ में)।
कबीर पर मत: शुक्ल जी ने कबीर की प्रतिभा को तो माना, लेकिन उनकी भाषा को 'सधुक्कड़ी' और उनके ज्ञान को 'बाहरी' कहा।
केशवदास: इन्हें "कठिन काव्य का प्रेत" कहा क्योंकि इनमें सहृदयता की कमी थी।
6. आधुनिक काल (गद्यकाल) का विकास
शुक्ल जी ने आधुनिक काल को 'उत्थानों' में बाँटा है:
प्रथम उत्थान (संवत् 1925-1950): भारतेंदु युग।
द्वितीय उत्थान (संवत् 1950-1975): द्विवेदी युग (इसे 'इतिवृत्तात्मकता' का युग कहा)।
तृतीय उत्थान (संवत् 1975 से): छायावाद का काल।
7. उपनाम और विशेष टिप्पणियाँ (Quick Table)
| कवि / कृति | शुक्ल जी की टिप्पणी |
| घनानंद | साक्षात् रसमूर्ति, जबाँदानी का दावा |
| विद्यापति | शुद्ध श्रृंगारी कवि (आध्यात्मिक रंग के चश्मे वाली टिप्पणी) |
| निराला | नाद-सौंदर्य के प्रेमी |
| परीक्षा गुरु | हिंदी का प्रथम 'मौलिक' उपन्यास |
| पद्माकर | मूर्तिविधायिनी प्रतिभा वाला कवि |
💡 परीक्षा के लिए अंतिम सुझाव (Checklist):
वर्ष परिवर्तन: संवत् में से 57 वर्ष घटाकर ईस्वी सन् प्राप्त करें।
प्रकाशन: यह इतिहास सर्वप्रथम 1929 में 'हिंदी शब्दसागर' की भूमिका के रूप में छपा था।
प्रिय विधा: शुक्ल जी प्रबंध काव्य (महाकाव्य) को मुक्तक से ऊँचा स्थान देते थे।
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