आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने 'वयं रक्षामः' में रावण की अंतिम शिक्षा

आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने उपन्यास के अंत में रावण की मृत्यु के प्रसंग को एक बहुत ही गंभीर और दार्शनिक मोड़ दिया है। जब रावण अंतिम सांसें ले रहा होता है, तब राम लक्ष्मण को उसके पास राजनीति और जीवन का ज्ञान लेने भेजते हैं। शास्त्री जी के अनुसार, यह एक 'महामानव' का दूसरे 'महामानव' को सत्ता का हस्तांतरण था।

यहाँ रावण द्वारा लक्ष्मण को दी गई अंतिम शिक्षाओं का चार्ट है:


रावण की अंतिम शिक्षा: राजनीति और जीवन के सूत्र

विषयरावण की सीख (अंतिम उपदेश)दार्शनिक अर्थ
शुभ और अशुभ"शुभ कार्य को जितनी जल्दी हो सके कर डालो, और अशुभ को जितना टाल सको, टालो।"टालमटोल (Procrastination) केवल अच्छे कामों में नहीं, बल्कि बुरे फैसलों में भी होनी चाहिए।
शत्रु का आंकलन"अपने शत्रु को कभी छोटा या तुच्छ मत समझो।"रावण ने स्वीकार किया कि उसने राम की 'वनवासी' छवि और वानरों की शक्ति को कम आँकने की भूल की।
सारथी और रक्षक"अपने सारथी, रक्षक, रसोइया और भाई से कभी शत्रुता मत करो।"ये वे लोग हैं जो आपके जीवन की सबसे गुप्त कड़ियाँ जानते हैं; इनसे शत्रुता मृत्यु को निमंत्रण है।
शक्ति का मद"अजेय होने का अहंकार ही अजेयता को समाप्त कर देता है।"जब व्यक्ति को लगता है कि उसे कोई नहीं हरा सकता, वहीं से उसके पतन की वैज्ञानिक प्रक्रिया शुरू हो जाती है।
सत्ता का आधार"राजा को अपनी प्रजा के भय से नहीं, बल्कि प्रेम से शासन करना चाहिए।"रावण ने अंत में माना कि उसने 'रक्ष' संस्कृति को भय के बल पर खड़ा किया था।

प्रसंग की अनूठी व्याख्या

चतुरसेन जी ने इस दृश्य में रावण के भीतर के 'ब्राह्मणत्व' (ज्ञान) और 'राजपुत्र' (योद्धा) के मिलन को दिखाया है:

  1. मर्यादा का पाठ: जब लक्ष्मण रावण के सिर की ओर खड़े हुए, तो रावण ने कुछ नहीं कहा। जब वे चरणों की ओर खड़े हुए, तब रावण ने बात शुरू की। यह 'ज्ञान प्राप्त करने की विनम्रता' का पाठ था।

  2. वैज्ञानिक हार: रावण ने लक्ष्मण को बताया कि उसकी हार किसी दैवीय चमत्कार से नहीं, बल्कि 'समय' और 'रणनीति' के सही तालमेल न होने से हुई।

  3. विरासत: रावण चाहता था कि उसकी मृत्यु के बाद उसकी 'रक्ष' संस्कृति की अच्छी बातें (जैसे विज्ञान और अनुशासन) लुप्त न हों, बल्कि उन्हें नई व्यवस्था में जगह मिले।


निष्कर्ष

उपन्यास का यह अंत रावण को एक 'खलनायक' से ऊपर उठाकर एक 'पराजित महानता' का दर्जा देता है। चतुरसेन शास्त्री लिखते हैं कि रावण की मृत्यु के साथ एक ऐसा 'पुस्तकालय' जलकर राख हो गया, जिसकी भरपाई आने वाली कई सदियाँ नहीं कर पाईं।


 

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