हिंदी उपन्यास में नारी चेतना:मृदुला गर्ग एवं उषा प्रियंवदा
अध्ययन की प्रासंगिकता
नारी चेतना का अभिप्राय नारी के अपने अस्तित्व बोध से है। चेतना सम्पन्न होने पर नारी अपने विरुद्ध रचे गए मिथको का विरोध करती है। वर्तमान समय में नारी पुरुष वर्ग से प्रतिस्पर्धा न कर केवल उसके समक्ष एक मनुष्य होने के नाते प्राप्त होने वाले अधिकारों की मांग कर रही है। जैसे -प्रजनन में अपनी मर्जी ,आर्थिक निर्भरता और सत्ता में हिस्सेदारी आदि।
मृदुला गर्ग एवं उषा प्रियंवदा के उपन्यासों में नारी चेतना शीर्षक मेरा यह शोध कार्य साहित्य के जरिये हिंदी में नारी चेतना की सैद्धांतिकी को समझने का प्रयास करेगा। नारी चेतना को लेकर बात कम ही की जाती है की नारी के लिए अपने अस्तित्व बोध होना कितना जरुरी है ?एक नारी कहाँ स्थान रखती है ?इसकी चेतना करवाना अत्यधिक आवश्यक है।
हिंदी में नारी चेतना सम्बंधित साहित्य पर बहुत ही कम शोधकार्य हुए है या हो रहे है। क्योंकि अधिकतर शोधकार्य नारी चेतना को लेकर है इन समस्याओं से कैसे निपटा जाये ऐसे विषय पर चर्चा नहीं की गई है। जो की आज के समाज में नारी को अपने लिए जागरूक करना अत्यंत आवश्यक हो गया है मेरे शोध कार्य द्वारा नारी चेतना सम्पन्न बनेगी उसे पता चलेगा उसका दायित्व सिर्फ मर्यादा पति सेवा ,घर और बच्चों का पालन पोषण नहीं है वह अपने विरुद्ध रचे गए मिथकों को तोड़ेगी।
प्रेमचंद का 'कर्मभूमि' उपन्यास में स्त्रियों को लेकर प्रेमचंद के विचार अपने समकालीन की तुलना में अत्यधिक प्रगतिशील है। प्रेमचंद ने नारी के प्रति संवेदना मिश्रित सुधारवादी दृष्टिकोण अपनाया है। प्रेमचंद अंत तक यह निर्णय नहीं कर पाए थे की नारी को पूर्ण स्वतंत्रता मिलनी चाहिए या नहीं। इनका दूसरा उपन्यास 'गोदान'की धनिया भी विद्रोहणी स्त्री है। वह अन्याय और अत्याचार को सहती नहीं है।
उषा प्रियंवदा के प्रसिद्ध उपन्यास 'पचपन खम्बे लाल दिवार' ,'रुकोगी नहीं राधिका' ,'शेष यात्रा' स्त्री केंद्रित उपन्यास है। अमेरिका परिवेश में भारतीय नारी की नियति उसके साहस व् विवेकपूर्ण विकल्प को चुना है। 'पचपन खम्बे लाल दीवार' में सुषमा मध्यवर्गीय नारी को केंद्र में रखकर आधुनिक नारी के यंत्रणा का सजीव अंकन किया है। इस उपन्यास में नारी की संकीर्ण मानसिकता की समस्या ,नारी दुर्बलता समस्या तथा अकेलेपन की समस्या को बताया है।'रुकोगी नहीं राधिका' अपने अस्तित्व और स्वतंत्रता की खोज में वह न जाने कहाँ -कहाँ भटकता है। 'भय कबीर दास' में लिली के माध्यम से हर न मानने वाली स्त्री को चित्रित किया गया है।
मृदुला गर्ग अपने उपन्यास के माध्यम से नारी को अस्तित्व के प्रति सचेत करने की बात करती है। वह चाहती है की उनकी स्त्री पात्र चाहे नौकरी पेशा हो या घरेलु ,अशिक्षित हो या अनपढ़, पर हो वो स्वालम्बी। इनका उपन्यास 'कठगुलाब' में स्त्रियों की समस्याओं पर आधारित उपन्यास है। स्मिता ,असीमा ,नर्मदा आदि अनेक नारियों के व्यक्तिगत जीवन की समस्या को उभारा गया है। सम्पूर्ण समस्या और घटनाएं इन्ही स्त्री पात्रों के इर्द -गिर्द घूमती है। 'चितकोबरा' में विवाहित स्त्री के द्वन्द ,भावात्मक टकराहट और उसके निर्णय न लेने की स्थिति को दर्शाता है। 'उसके हिस्से की धूप' उपन्यास में नायिका मनीषा द्वारा लेखिका नारी को अस्तित्व बोध कराती है की नारी को अपना रास्ता स्वयं तलाशना है न की पुरुष द्वारा।
वृन्दावन लाल वर्मा का कथा साहित्य में महत्व अपने ऐतिहासिक उपन्यासों के कारण है इन्होने अपने उपन्यास में 'झांसी की रानी' में भारतीय इतिहास की वीरांगना लक्ष्मीबाई ,रामगढ़ की रानी अवंतीबाई ,महारानी दुर्गावती आदि के माध्यम से भारतीय स्त्रियों के वीरतापूर्ण चरित्र को सच्ची श्रद्धांजली अर्पित की है। रानी लक्ष्मीबाई किसी से डरती नहीं किसी से दबती नहीं वह गलत बातों का जमकर विरोध करती है। वह हठी है परन्तु बेवजह की हठ नहीं करती। इस से हम स्त्री के चरित्र को देख सकते है की स्त्री को दबकर नहीं रहना चाहिए अपितु अपने लिए आवाज उतनी चाहिए न सिर्फ घर में बल्कि घर के बाहर भी क्योंकि उस समय स्त्रियों को उतनी बोलने की स्वतंत्रता नहीं थी ,पर वह डरी नहीं घबराई नहीं और अपने पर पूर्ण विश्वास के साथ गलत बातों का ,गलत नीतियों का ,अंधविश्वासों का विरोध करती चली गई तो आज के समाज और समय में भी स्त्री को ऐसा आचरण ही रखना चाहिए ,आदम्य ,निडर भाव के साथ।
नारी चेतना का प्रश्न साहित्यिक से ज्यादा सामाजिक है। क्योंकि आज भी पितृसतात्मक समाज में नारी दोयम दर्जे की नागरिक है चाहे वह आत्मनिर्भर हो या दूसरे पर निर्भर। ऐसी सामाजिक संरचना में नारी को चेतना सम्पन्न करना अत्यंत आवश्यक है। इस तरह शोध में नारी चेतना की बात मृदुला गर्ग एवं उषा प्रियंवदा के उपन्यासों के माध्यम से की जाएगी।
मृदुला गर्ग अपने उपन्यास के माध्यम से नारी को अस्तित्व के प्रति सचेत करने की बात करती है। वह चाहती है की उनकी स्त्री पात्र चाहे नौकरी पेशा हो या घरेलु ,अशिक्षित हो या अनपढ़, पर हो वो स्वालम्बी। इनका उपन्यास 'कठगुलाब' में स्त्रियों की समस्याओं पर आधारित उपन्यास है। स्मिता ,असीमा ,नर्मदा आदि अनेक नारियों के व्यक्तिगत जीवन की समस्या को उभारा गया है। सम्पूर्ण समस्या और घटनाएं इन्ही स्त्री पात्रों के इर्द -गिर्द घूमती है। 'चितकोबरा' में विवाहित स्त्री के द्वन्द ,भावात्मक टकराहट और उसके निर्णय न लेने की स्थिति को दर्शाता है। 'उसके हिस्से की धूप' उपन्यास में नायिका मनीषा द्वारा लेखिका नारी को अस्तित्व बोध कराती है की नारी को अपना रास्ता स्वयं तलाशना है न की पुरुष द्वारा।
वृन्दावन लाल वर्मा का कथा साहित्य में महत्व अपने ऐतिहासिक उपन्यासों के कारण है इन्होने अपने उपन्यास में 'झांसी की रानी' में भारतीय इतिहास की वीरांगना लक्ष्मीबाई ,रामगढ़ की रानी अवंतीबाई ,महारानी दुर्गावती आदि के माध्यम से भारतीय स्त्रियों के वीरतापूर्ण चरित्र को सच्ची श्रद्धांजली अर्पित की है। रानी लक्ष्मीबाई किसी से डरती नहीं किसी से दबती नहीं वह गलत बातों का जमकर विरोध करती है। वह हठी है परन्तु बेवजह की हठ नहीं करती। इस से हम स्त्री के चरित्र को देख सकते है की स्त्री को दबकर नहीं रहना चाहिए अपितु अपने लिए आवाज उतनी चाहिए न सिर्फ घर में बल्कि घर के बाहर भी क्योंकि उस समय स्त्रियों को उतनी बोलने की स्वतंत्रता नहीं थी ,पर वह डरी नहीं घबराई नहीं और अपने पर पूर्ण विश्वास के साथ गलत बातों का ,गलत नीतियों का ,अंधविश्वासों का विरोध करती चली गई तो आज के समाज और समय में भी स्त्री को ऐसा आचरण ही रखना चाहिए ,आदम्य ,निडर भाव के साथ।
नारी चेतना का प्रश्न साहित्यिक से ज्यादा सामाजिक है। क्योंकि आज भी पितृसतात्मक समाज में नारी दोयम दर्जे की नागरिक है चाहे वह आत्मनिर्भर हो या दूसरे पर निर्भर। ऐसी सामाजिक संरचना में नारी को चेतना सम्पन्न करना अत्यंत आवश्यक है। इस तरह शोध में नारी चेतना की बात मृदुला गर्ग एवं उषा प्रियंवदा के उपन्यासों के माध्यम से की जाएगी।
शोध प्रविधि
नारी चेतना का प्रश्न साहित्यिक तो है ही साथ में समाज में नारी जीवन का भी महत्वपूर्ण प्रश्न है इसलिए नारी से जुड़े प्रश्न के शोध कार्य को गंभीरता से लेना अत्यंत आवश्यक है। मेरे शोध कार्य में नारी चेतना से सम्बंधित साहित्यिक ,सामाजिक ,राजनितिक ,आर्थिक माध्यमों का भरपूर प्रयोग किया जायेगा मानव अधिकारों के रूप में महिलाओ को अधिकार दिया गया है। इसके माध्यम से मेरे शोधकार्य में नारी में चेतना जागृत की जाएगी।
हिंदी उपन्यासों में नारी चेतना की बात प्रमुख रूप से है। इन उपन्यासों में नारी की समस्या को बताया गया है। नारी चेतना जागृत की गई है। परन्तु उपन्यास के माध्यम से नारी अपने अस्तित्व को लेकर कितनी जागृत हुई है ?इसकी चर्चा करना भी अत्यंत आवश्यक है
उषा प्रियंवदा के उपन्यास में सुषमा के चरित्र को देखकर नारी अपने अधिकारों की माँग कर सकेगी। 'रुकोगी नहीं राधिका' उपन्यास में राधिका की तरह कोई स्त्री स्वतंत्र होकर अपने लिए फैसला ले सकेगी कानून द्वारा दिए गए महिलाओ के अधिकार को उपन्यास के माध्यम से बता पाएंगे। उपन्यास में नारी चेतना की बात किन संदर्भो में की गई है।
सदियों से महिलाओं का दमन एवं उत्पीड़न होता आ रहा है। ,महिलाओं को इस दमन और उत्पीड़न से बाहर कर चेतना जागृत करना यही इस शोध की उपलब्धि होगी।
शोध विषय का चयन
हिंदी साहित्य में नारी चेतना को लेकर अनेको लेखकों ,लेखिकाओं पर शोध किया गया है परन्तु मैंने अपने शोध कार्य में मृदुला गर्ग और उषा प्रियंवदा को इस कारण स्थान दिया है क्योंकि उनका साहित्य नारी केंद्रित है। ऐसा साहित्य जो नारी में चेतना जागृत करता है तथा नारियों की परिस्थिति का वर्णन करता है कि किस प्रकार नारी रूप रंग व्यवहार व् काल बदलता रहता है किन्तु नारी पितृसत्तात्मकता को इतने गहनता से ग्रहण कर चुकी है की हर काल में एक कारण के वजह से अपने अस्तित्व की चेतना से भ्रमित है कहीं न कहीं उषा प्रियंवदा और मृदुला गर्ग अपने साहित्य में इस बात को बहुत सटीक माध्यम से वर्णित करती है। यही कारण है कि उनका साहित्य और लेखनी मुझे यह शोध करने को उत्साहित करता है।
मृदुला गर्ग अपने छः उपन्यास उसके' हिस्से की धूप' ,,'वंशज' ,'चित्तकोबरा' ,'अनित्य' ,'मैं और मैं' ,तथा 'कठगुलाब' नारी की चेतना जागृत करते है। इन उपन्यासों में विवाहेतर सम्बन्ध नारी का स्वरुप तथा नारी का आधुनिक युग में बदलता हुआ स्वरुप दिखाई देता है। इनका साहित्य सशक्त है। उषा प्रियंवदा और मृदुला गर्ग का साहित्य आज की बुद्धिजीवी नारी की सही तस्वीर उजागर करता है।
कही न कही नारी चेतना का सटीक अर्थ यही है की स्त्री अपने अस्तित्व को समझकर तथा अपने विरुद्ध रचे गए षडयंत्रो के खिलाफ संघर्षरत हो।
मृदुला गर्ग अपने छः उपन्यास उसके' हिस्से की धूप' ,,'वंशज' ,'चित्तकोबरा' ,'अनित्य' ,'मैं और मैं' ,तथा 'कठगुलाब' नारी की चेतना जागृत करते है। इन उपन्यासों में विवाहेतर सम्बन्ध नारी का स्वरुप तथा नारी का आधुनिक युग में बदलता हुआ स्वरुप दिखाई देता है। इनका साहित्य सशक्त है। उषा प्रियंवदा और मृदुला गर्ग का साहित्य आज की बुद्धिजीवी नारी की सही तस्वीर उजागर करता है।
कही न कही नारी चेतना का सटीक अर्थ यही है की स्त्री अपने अस्तित्व को समझकर तथा अपने विरुद्ध रचे गए षडयंत्रो के खिलाफ संघर्षरत हो।
शोध का उद्देश्य
हिंदी में अन्य विषयो पर शोध कार्य किया जा रहा है। मैंने अपने शोधकार्य का विषय नारी चेतना को चुना है। हालांकि नारीवाद पर भी शोध कार्य किया जा रहा है फिर भी मैंने नारी चेतना को चुना क्योंकि नारीवाद एक मिथक बनकर रह गया है। जहाँ नारी को मनुष्य न मानकर एक वस्तु के रूप में देखा जाता है। जिसका शारीरिक और मानसिक दोनों रूपों से शोषण किया जाता है। मेरे शोधकार्य का उद्देश्य नारी और पुरुष दोनों में साम्यता लाना है। जो कार्य पुरुष कर सकता है वह कार्य नारी भी कर सकती है। लेकिन उसके ऊपर प्रतिबंधों का बोझ बांधकर ,कड़े नियमो द्वारा उसे प्रताड़ित किया जाता है। आज भी नारी अपने विरुद्ध रचे गए मिथको का विरोध न कर उन्ही मिथको में फँस कर रह जाती है। स्त्री अगर चाहती है की शादी न करे समाज के दबाव में आकर करनी पड़ती है। नारी के अंदर गृहस्ती इतनी गहनता से डाली जाती है की वह उस से निकल ही नहीं पाती है कि वह स्वयं के बारे में सोच सके। यदि नारी समाज के दबाव में आकर शादी कर भी लेती है तो उसके इच्छा न रहने पर भी बच्चा करने को मजबूर किया जाता है। भले ही वह कुछ साल का ही समय माँग रही हो लेकिन घर वालो को एक -दो साल के अंदर बच्चा चाहिए वो भी लड़का। लड़का न हुआ तो उसकी प्रताड़ना अलग से। छोटे कपडे पहनने वाली स्त्री को हीन समझा जाता है उसी पर लांछन लगाए जाते है। यदि पुरुष पहनता है तो उसे कुछ नहीं कहा जाता समाज को वह सराहनीय लगता है। हमारा समाज शुरू से ही पितृसत्तात्मक रहा है। इसी पितृसत्तात्मक समाज के कारण नारी कभी उठ नहीं पाई क्योंकि जैसे ही वह अपना अस्तित्व समझने की कोशिश करती है तभी पितृसत्ता उसे दैहिक अपराध द्वारा कुंठा के गुफा में डाल देता है जैसे बलत्कार। समाज में ऐसी नारी भी है जो देह की स्वतंत्रता में अपनी मुक्ति देखती है उसी के लिए सघर्षशील भी है।
सम्बंधित क्षेत्र में पूर्व में किये गए कार्य
प्रस्तावित विषय पर मेरी जानकारी में कोई शोधकार्य नहीं हुआ है। हिंदी सहिया में नारी और उससे जुड़े कई प्रश्नो से सम्बंधित कई शोधकार्य हुए है कुछ महत्वपूर्ण शोधकार्य की सूचि -
- मैत्रीय पुष्पा के उपन्यास ;नारी की अवधारणा -सरिता कश्यप 2004
- वृंदावनलाल वर्मा के उपन्यासों का स्त्री दृस्टि से अध्ययन -पूनम मीणा 2014
- हिंदी के प्रमुख उपनिहासो में स्त्री अस्मिता का अध्ययन (सन्दर्भ :आचार्य चतुरसेन शास्त्री ,वृंदावनलाल वर्मा ,हजारी प्रसाद दिवेदी ,अमृतलाल नागर )-शीतल कुमारी 2016
- हिंदी के नारीवादी उपन्यासों में स्त्री मुक्ति की अवधारणा :मैत्रीय पुष्पा के उपन्यासों के सन्दर्भ में -प्रीति 2018
- कृष्णा सोबती के कथा साहित्य में स्त्री विमर्श -शिवलिनी द्विवेदी ,2017
- नासिरा शर्मा के कथा साहित्य में स्त्री विमर्श -अमरीश सिन्हा ,2018
संभावित अध्याय योजना
प्रथम अध्याय
नारी चेतना
- नारी चेतना का अर्थ
- उपन्यासों में नारी चेतना
- निष्कर्ष
द्वितीय अध्याय
उषा प्रियंवदा के उपन्यासों में नारी चेतना
- उषा प्रियंवदा ;संक्षिप्त साहित्यिक परिचय
- उषा प्रियंवदा ;नारी दृष्टिकोण
- पचपन खम्बे लाल दीवार
- रुकोगी नहीं राधिका
- नायिकाओ की विशेषताएं
तृतीय अध्याय
मृदुला गर्ग के उपन्यासों में नारी चेतना
- मृदुला गर्ग ;संक्षिप्त साहित्यिक परिचय
- उपन्यासों में नारी चेतना के प्रश्न
- नायिकाओ की नारी विशेषताएं
- देह मुक्ति बनाम स्त्री मुक्ति और मृदुला गर्ग के उपन्यास
चतुर्थ अध्याय
उषा प्रियंवदा और मृदुला गर्ग
- उषा प्रियंवदा और मृदुला गर्ग की साहित्यिक पृष्ट्भूमि
- उषा प्रियंवदा और मृदुला गर्ग ;नारी चेतना की विशेषताएं
- उषा प्रियंवदा और मृदुला गर्ग ;सामाजिक मूल्य की अवधरणा
- उषा प्रियंवदा और मृदुला गर्ग ;उपन्यासों में पारिवारिक द्वन्द
निष्कर्ष
आधार सामग्री
मृदुला गर्ग
- अनित्य ,राजकमल प्रकाशन ,1980
- मैं और मैं ,राजकमल प्रकाशन ,1984
- उसके हिस्से की धुप ,नेशनल पब्लिशिंग हाउस ,2002
- वंशज ,1976
- कठगुलाब ,भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन ,1993
- चित्तकोबरा ,राजकमल प्रकाशन ,1979
- मिलजुल मन ,2012
उषा प्रियंवदा
- रुकोगी नहीं राधिका ,राजकमल प्रकाशन ,1968
- शेष यात्रा ,राजकमल पेपर बेक्स ,1984
- पचपन खम्बे लाल दीवार ,राजकमल पेपरबैक्स 1961
- अंतर्वशी ,2000
- भयाकबीर उदास, राजकमल पेपरबैक्स ,2007
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें