डॉ. गणपति चन्द्र गुप्त ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ "हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास" (1965) के माध्यम से हिंदी साहित्य लेखन की परंपरा में एक क्रांतिकारी बदलाव किया था। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने शुक्ल जी के काल-विभाजन और मान्यताओं को केवल स्वीकार नहीं किया, बल्कि तर्क और वैज्ञानिकता के आधार पर उन्हें चुनौती दी।
उनकी इतिहास दृष्टि की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
1. वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Approach)
डॉ. गुप्त का मानना था कि साहित्य का इतिहास केवल कवियों का विवरण नहीं है। उन्होंने कार्य-कारण संबंध (Cause and Effect) पर जोर दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि साहित्य की व्याख्या केवल 'परंपरा' या 'प्रवृत्ति' के आधार पर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक विश्लेषण के आधार पर होनी चाहिए।
2. रामचंद्र शुक्ल के काल-विभाजन का खंडन
आचार्य शुक्ल ने वीरगाथा काल, भक्ति काल और रीति काल का जो विभाजन किया था, गुप्त जी ने उसे पूरी तरह स्वीकार नहीं किया।
उन्होंने शुक्ल जी के 'वीरगाथा काल' नाम को अनुचित माना क्योंकि उस काल में धार्मिक और श्रृंगारिक रचनाएँ भी प्रचुर मात्रा में थीं।
उन्होंने पूरे साहित्य को तीन मुख्य चरणों में बाँटने का प्रयास किया: प्रारम्भिक काल, मध्य काल और आधुनिक काल।
3. विकासवादी सिद्धांत (Evolutionary Theory)
उन्होंने साहित्य के विकास को तीन श्रेणियों में विभाजित किया:
धर्मश्रित काव्य: जो धर्म के आधार पर लिखा गया।
राजश्रित काव्य: जो राजाओं के संरक्षण में लिखा गया (दरबारी साहित्य)।
लोकाश्रित काव्य: जो आम जनता की भावनाओं और लोक जीवन पर आधारित था।
4. 'शालिभद्र सूरि' को प्रथम कवि मानना
जहाँ अन्य विद्वान सरहपा या चंदबरदाई को हिंदी का पहला कवि मानते हैं, वहीं डॉ. गणपति चन्द्र गुप्त ने अपने वैज्ञानिक तर्क देते हुए शालिभद्र सूरि (भरतेश्वर बाहुबली रास के रचयिता) को हिंदी का प्रथम कवि स्वीकार किया है।
5. काल-विभाजन का नया ढांचा
उन्होंने हिंदी साहित्य के इतिहास को निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत किया:
प्रारम्भिक काल (1184 ई. - 1350 ई.)
मध्य काल (1350 ई. - 1857 ई.) – इसे पुनः उत्कर्ष काल और चरमोत्कर्ष काल में बाँटा।
आधुनिक काल (1857 ई. से अब तक)
निष्कर्ष
डॉ. गणपति चन्द्र गुप्त के इतिहास की सबसे बड़ी ताकत उसकी तर्कशीलता है। उन्होंने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि साहित्य का विकास आकस्मिक नहीं होता, बल्कि उसके पीछे निश्चित सामाजिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक कारण होते हैं।
डॉ. गणपति चन्द्र गुप्त द्वारा 'हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास' में प्रस्तुत काल-विभाजन काफी विस्तृत और तर्कसंगत है। उन्होंने साहित्य की विकासमान प्रवृत्तियों के आधार पर इसे निम्नलिखित रूप में वर्गीकृत किया है:
डॉ. गणपति चन्द्र गुप्त का काल-विभाजन
| कालखंड | समय सीमा | मुख्य विभाजन / उप-विभाजन |
| 1. प्रारम्भिक काल | 1184 ई. से 1350 ई. | इसमें धर्मश्रित, राजश्रित और लोकाश्रित तीनों प्रकार का काव्य शामिल है। |
| 2. मध्य काल | 1350 ई. से 1857 ई. | इसे दो मुख्य भागों में बाँटा गया है: |
| (i) पूर्व मध्यकाल | 1350 ई. से 1500 ई. | इसे 'उत्कर्ष काल' भी कहा जाता है। |
| (ii) उत्तर मध्यकाल | 1500 ई. से 1857 ई. | इसे 'चरमोत्कर्ष काल' कहा जाता है। |
| 3. आधुनिक काल | 1857 ई. से अब तक | इसे विभिन्न साहित्यिक आंदोलनों के आधार पर बाँटा गया है। |
मध्य काल का सूक्ष्म वर्गीकरण
गुप्त जी ने मध्य काल (विशेषकर उत्तर मध्यकाल) को प्रवृत्तियों के आधार पर तीन श्रेणियों में विभाजित किया है, जो उनकी मौलिक सोच को दर्शाता है:
धर्माश्रित काव्य: इसके अंतर्गत संत काव्य, सूफी काव्य, कृष्ण भक्ति और राम भक्ति धाराएँ आती हैं।
राज्याश्रित काव्य: इसमें रीतिबद्ध और रीतिसिद्ध कवियों को रखा गया है जो दरबारों से जुड़े थे।
लोकाश्रित काव्य: इसमें वह साहित्य आता है जो न धर्म से बँधा था और न दरबार से (जैसे रीतिमुक्त काव्य या लोक गाथाएँ)।
आधुनिक काल का वर्गीकरण
आधुनिक काल को उन्होंने विकास क्रम के अनुसार इन चरणों में देखा:
पुनर्जागरण काल (भारतेंदु युग)
जागरण-सुधार काल (द्विवेदी युग)
छायावाद काल
प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और नई कविता
एक रोचक तथ्य: गुप्त जी ने 1184 ई. को हिंदी साहित्य की शुरुआत इसलिए माना क्योंकि इसी वर्ष शालिभद्र सूरि ने 'भरतेश्वर बाहुबली रास' की रचना की थी, जिसे वे हिंदी की पहली प्रामाणिक रचना मानते हैं।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल और डॉ. गणपति चन्द्र गुप्त के इतिहास दर्शन में बुनियादी अंतर है। शुक्ल जी जहाँ 'युगीन परिस्थितियों' (Public Sentiment) को प्रधानता देते हैं, वहीं गुप्त जी 'वैज्ञानिक और विकासवादी' सिद्धांतों को आधार मानते हैं।
इन दोनों के बीच के मुख्य अंतरों को आप इस तालिका से समझ सकते हैं:
शुक्ल जी बनाम डॉ. गुप्त: एक तुलनात्मक विश्लेषण
| विषय | आचार्य रामचंद्र शुक्ल | डॉ. गणपति चन्द्र गुप्त |
| मुख्य ग्रंथ | हिंदी साहित्य का इतिहास (1929) | हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास (1965) |
| प्रथम कवि | मुंज या भोज को माना। | शालिभद्र सूरि को माना। |
| काल-विभाजन का आधार | प्रधान प्रवृत्ति (Major Trend) | वैज्ञानिक विकासक्रम (Evolutionary Theory) |
| आदिकाल का नाम | 'वीरगाथा काल' (रासो ग्रंथों के आधार पर) | 'प्रारम्भिक काल' (तर्क दिया कि केवल वीरता प्रधान नहीं थी) |
| साहित्यिक दृष्टि | जनता की चित्तवृत्ति का प्रतिबिंब। | कार्य-कारण संबंध और परंपरा का विकास। |
| रीतिकाल का वर्गीकरण | रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त। | राज्याश्रित, धर्माश्रित और लोकाश्रित। |
इन अंतरों का मुख्य कारण:
शुक्ल जी का मानना था कि मुसलमान शासकों के आने के बाद हताश हिंदू जाति के पास भक्ति के अलावा कोई मार्ग नहीं था (परिस्थितिवाद)।
डॉ. गुप्त ने इस धारणा का खंडन किया। उन्होंने कहा कि हिंदी साहित्य का विकास भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं का स्वाभाविक विस्तार है, न कि केवल बाहरी परिस्थितियों की प्रतिक्रिया।
कुछ अन्य महत्वपूर्ण बिंदु:
डॉ. गुप्त ने शुक्ल जी द्वारा उपेक्षित अपभ्रंश साहित्य को हिंदी के प्रारंभिक विकास के लिए अनिवार्य माना।
उन्होंने 'वीरगाथा काल' की कई रचनाओं (जैसे पृथ्वीराज रासो) की प्रामाणिकता पर वैज्ञानिक संदेह प्रकट किया, जो शुक्ल जी के समय उतने स्पष्ट नहीं थे।
डॉ. गणपति चन्द्र गुप्त ने शालिभद्र सूरि को हिंदी का प्रथम कवि घोषित करके इतिहास जगत में एक नई बहस छेड़ दी थी। उन्होंने इसके पीछे जो तर्क दिए, वे पूरी तरह वैज्ञानिक और भाषाई विश्लेषण पर आधारित थे।
उनके प्रमुख तर्क निम्नलिखित हैं:
1. रचना की प्रामाणिकता
जहाँ राहुल सांकृत्यायन 'सरहपा' को प्रथम कवि मानते हैं, उनकी रचनाएँ फुटकर (छिटपुट) रूप में मिलती हैं। इसके विपरीत, शालिभद्र सूरि की रचना 'भरतेश्वर बाहुबली रास' (1184 ई.) एक पूर्ण, व्यवस्थित और प्रामाणिक काव्य ग्रंथ है। गुप्त जी का तर्क था कि प्रथम कवि वही हो सकता है जिसकी एक ठोस और संपूर्ण कृति उपलब्ध हो।
2. भाषाई स्वरूप (अपभ्रंश से हिंदी की ओर)
गुप्त जी के अनुसार, शालिभद्र सूरि की भाषा में अपभ्रंश के तत्व कम होने लगे थे और पुरानी हिंदी (हिंदी के अंकुर) स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे थे। उन्होंने इसे हिंदी की 'विकासवादी प्रक्रिया' का शुरुआती बिंदु माना।
3. 'रास' परंपरा का प्रभाव
हिंदी साहित्य के आदिकाल में 'रास' काव्य परंपरा बहुत समृद्ध रही है। चूँकि 'भरतेश्वर बाहुबली रास' इस परंपरा की सबसे पहली और सशक्त रचना है, इसलिए इसके रचयिता को आदि-कवि का सम्मान मिलना चाहिए।
4. काव्यगत उत्कृष्टता
गुप्त जी का मानना था कि शालिभद्र सूरि की कविता में भाव, रस (विशेषकर वीर और शांत रस) और शिल्प की जो परिपक्वता मिलती है, वह किसी शुरुआती कवि में नहीं, बल्कि एक स्थापित परंपरा के प्रथम महान कवि में ही संभव है।
निष्कर्ष (गणपति चन्द्र गुप्त के शब्दों में):
"यदि हम भाषा, भाव, शैली और परंपरा की दृष्टि से देखें, तो शालिभद्र सूरि ही वे प्रथम व्यक्ति हैं जिन्हें 'हिंदी का प्रथम कवि' कहा जाना तर्कसंगत है।"
हालांकि, आज भी सर्वसम्मति से सरहपा को ही अधिकांश विद्वान (जैसे राहुल सांकृत्यायन और डॉ. नगेंद्र) प्रथम कवि मानते हैं, लेकिन डॉ. गुप्त के तर्कों ने शोधार्थियों को एक नया नजरिया दिया।
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